बौद्ध दर्शन

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बौद्ध दर्शन / Boudh Philosophy

विषय सूची

भगवान बुद्ध द्वारा प्रवर्तित होने पर भी बौद्ध दर्शन कोई एक दर्शन नहीं, अपितु दर्शनों का समूह है। कुछ बातों में विचार साम्य होने पर भी परस्पर अत्यन्त मतभेद हैं। शब्द साम्य होने पर भी अर्थ भेद अधिक हैं। अनेक शाखोपशाखाओं में विभक्त होने पर भी दार्शनिक मान्यताओं में साम्य की दृष्टि से बौद्ध विचारों का चार विभागों में वर्गीकरण किया गया है, यथा-

  1. वैभाषिक,
  2. सौत्रान्तिक,
  3. योगाचार एवं
  4. माध्यमिक।
  1. सूत्र,
  2. विनय और
  3. अभिधर्म- ये तीन पिटक हैं।
  4. श्रावकयान,
  5. प्रत्येक बुद्धयान और
  6. बोधिसत्त्वयान- ये तीन यान हैं।

श्रावकयान

जो विनेय जन दु:खमय संसार-सागर को देखकर तथा उससे उद्विग्न होकर तत्काल उससे मुक्ति की अभिलाषा तो रखते हैं, किन्तु तात्कालिक रूप से सम्पूर्ण प्राणियों के हित और सुख के लिए सम्यक सम्बुद्धत्व की प्राप्ति का अध्याशय (इच्छा) नहीं रखते- ऐसे विनेय जन श्रावकयानी कहलाते हैं। उनके लिए प्रथम धर्मचक्र का प्रवर्तन करते हुए भगवान ने चार आर्यसत्व और उनके अनित्यता आदि सोलह आकारों की देशना की और इनकी भावना करने से पुद्गलनैरात्म्य का साक्षात्कार करके क्लेशावरण का समूल प्रहाण करते हुए अर्हत्त्व की और निर्वाण की प्राप्ति का मार्ग उपदिष्ट किया।

प्रत्येकबुद्धयान

श्रावक और प्रत्येकबुद्ध के लक्ष्य में भेद नहीं होता। प्रत्येक बुद्ध भी स्वमुक्ति के ही अभिलाषी होते हैं। श्रावक और प्रत्येकबुद्ध के ज्ञान में और पुण्य संचय में थोड़ा फ़र्क़ अवश्य होता है। प्रत्येकबुद्ध केवल ग्रह्यशून्यता का बोध होता है, ग्राहकशून्यता का नहीं। पुण्य भी श्रावक की अपेक्षा उनमें अधिक होता है। प्रत्येकबुद्ध उस काल में उत्पन्न होते हैं, जिस समय बुद्ध का नाम भी लोक में प्रचलित नहीं होता। वे बिना आचार्य या गुरु के ही, पूर्वजन्मों की स्मृति के आधार पर अपनी साधना प्रारम्भ करते हैं और प्रत्येकबुद्ध-अर्हत्त्व और निर्वाण पद प्राप्त करते हैं। इनकी यह भी विशेषता है कि ये वाणी के द्वारा धर्मोपदेश नहीं करते तथा संघ बनाकर नहीं रहते अर्थात एकाकी विचरण करते हैं।

बोधिसत्त्वयान

जो विनेय जन सम्पूर्ण सत्त्वों के हित और सुख के लिए सम्यक सम्बुद्धत्व प्राप्त करना चाहते हैं, ऐसे विनेय जन बोधिसत्त्वयानी कहलाते हैं। उन लोगों के लिए भगवान ने बोधिचित्त का उत्पाद कर छह या दस पारमिताओं की साधना का उपदेश दिया तथा पुद्गलनैरात्म्य के साथ धर्मनैरात्म्य का भी विभिन्न युक्तियों से प्रतिवेध कर क्लेशावरण और ज्ञेयावरण दोनों के प्रहाण द्वारा सम्यक सम्बुद्धत्व की प्राप्ति के मार्ग का उपदेश किया। इसे महायान भी कहते हैं।

महायान की व्युत्पत्ति

'यायते अनेनेति यानम्' अर्थात जिससे जाया जाता है, यह 'यान' है। इस विग्रह के अनुसार मार्ग, जिससे गन्तव्य स्थान तक जाया जाता है, 'यान' है। अर्थात यान-शब्द मार्ग का वाचक है। 'यायते अस्मिन्निति यानम्' अर्थात जिसमें जाया जाता है, यह भी 'यान' है। इस दूसरे विग्रह के अनुसार 'फल' भी यान कहलाता है। फल ही गन्तव्य स्थान होता है। इस तरह यान-शब्द फलवाचक भी होता है। 'महच्च तद् यानं महायानम्' अर्थात वह यान भी है और बड़ा भी है, इसलिए महायान कहलाता है।

हीनयान और महायान

वैभाषिक और सौत्रान्तिक दर्शन हीनयानी तथा योगाचार और माध्यमिक महायान दर्शन हैं इसमें कुछ सत्यांश होने पर भी दर्शन-भेद यान-भेद का नियामक कतई नहीं होता, अपितु उद्देश्य-भेद या जीवनलक्ष्य का भेद ही यानभेद का नियामक होता है। उद्देश्य की अधिक व्यापकता और अल्प व्यापकता ही महायान और हीनयान के भेद का अधार है। यहाँ 'हीन' शब्द का अर्थ 'अल्प' है, न कि तुच्छ, नीच या अधम आदि, जैसा कि आजकल हिन्दी में प्रचलित है। महायान का साधक समस्त प्राणियों को दु:ख से मुक्त करके उन्हें निर्वाण या बुद्धत्व प्राप्त कराना चाहता है। वह केवल अपनी ही दु:खों से मुक्ति नहीं चाहता, बल्कि सभी की मुक्ति के लिए व्यक्तिगत निर्वाण से निरपेक्ष रहते हुए अप्रतिष्ठित निर्वाण में स्थित होता है। जो व्यक्ति व्यक्तिगत निर्वाण प्राप्त करता हे, वह भी कोई छोटा नहीं, अपितु महापुरुष होता है। इतना सौभाग्य भी कम लोगों को प्राप्त होता है। बड़े पुण्यों का फल है यह। प्राय: सभी बौद्धेतर दर्शनों का भी अन्तिम लक्ष्य स्वमुक्ति ही है। अत: यह लक्ष्य श्रेष्ठ नहीं है, फिर भी अपने निर्वाण को स्थगित करके सभी प्राणि-मात्र को दु:खों से मुक्ति को लक्ष्य बनाना और उसके लिए प्रयास और साधना करना, अवश्य ही अधिक श्रेष्ठ है।

महाकरुणा

दु:ख करुणा का आलम्बन होता है तथा दु:ख को सहन नहीं कर पाना इसका आकार होता है। विविध प्रकार की शिरोवेदना आदि शारीरिक वेदनाएं दु:ख-दु:ख हैं। वर्तमान में सुखवत् प्रतीत होने पर भी परिणाम में दु:खदायी धर्म विपरिणाम दु:ख कहलाते हैं। सभी अनित्यों से वियोग दु:खप्रद होता है, इसलिए सभी अनित्य धर्म संस्कार-दु:ख हें। करुणा भी प्रारम्भ में 'सत्वालम्बना' होती है। अर्थात प्राणियों को और उनके दु:खों को आलम्बन बनाती है। किन्तु भावना के बल से विकसित होकर बाद में 'धर्मालम्बना' हो जाती है। बौद्ध दर्शन के अनुसार पुद्गल की सत्ता नहीं होती, वह जड़ और चेतना का पुंजमात्र होता है, फिर भी दु:खों से मुक्त करने की अभिलाषा 'धर्मालम्बना' करुणा होती है। वस्तुत: प्रज्ञा द्वारा विचार करने पर सभी धर्म नि:स्वभाव (शून्य) होते हैं। वस्तुत: सभी सत्त्व और उनके दु:ख भी नि:स्वभाव ही हैं, फिर भी अर्थात् शून्यता का अवबोध रखते हुए भी करुणावश बुद्ध एवं बोधिसत्त्व दु:खी प्राणियों के दु:ख को दूर करने का प्रयास करते हैं। उनकी ऐसी करुणा 'निरालम्ब' करुणा कहलाती है।

बोधिचित्त

बोधिचित्त ही महायान में प्रवेश कर द्वार होता है। बोधिचित्त के उत्पाद के साथ व्यक्ति महायानों और बोधिसत्त्व कहलाने लगता है तथा बोधिचित्त से भ्रष्ट होने पर महायान से च्युत हो जाता है। 'बुद्धो भवेयं जगतो हिताय*' अर्थात सभी प्राणियों को दु:खों से मुक्त करने के लिए मैं बुद्धत्व प्राप्त करूँगा-ऐसी अकृत्रिम अभिलाषा 'बोधिचित्त' कहलाती है। इस प्रकार बुद्धत्व महायान के अनुसार साध्य नहीं, अपितु साधनमात्र है। साध्य तो समस्त प्राणियों की दु:खों से मुक्ति ही है। बोधिचित्त भी प्रणिधि और प्रस्थान के भेद से द्विविध होता है। ऊपर जो बुद्धत्व प्राप्ति की अकृत्रिम अभिलाषा को बोधिचित्त कहा गया है, वह 'प्रणिधि-बोधिचित्त' है। इसके उत्पन्न हो जाने पर साधक महायान-संवर ग्रहण करके ब्रह्मविहार, संग्रहवस्तु एवं पारमिता आदि की साधना में प्रवृत्त होता है, यह 'प्रस्थान-बोधिचित्त' कहलाता है। शास्त्रों में प्रणिधि-बोधिचित्त का भी विपुल फल और महती अनुशंसा वर्णित है।

पारमिताओं की साधना

पारमिताएं दस होती हैं, किन्तु उनका छह में भी अन्तर्भाव किया जाता है। दान, शील, क्षान्ति, वीर्य, ध्यान एवं प्रज्ञा-ये छह पारमिताएं हैं। उपाय कौशल पारमिता, प्रणिधान पारमिता, बल पारमिता एवं ज्ञान पारमिता-इन चार को मिलाकर पारमिताएं दस भी होती हैं। शास्त्रों में अधिकतर छह पारमिताओं की चर्चा की उपलब्ध होती है। इन छह पारमिताओं में छठवीं प्रज्ञापारमिता ही 'प्रज्ञा' है तथा शेष पांच पारमिताएं 'पुण्य' कहलाती हैं। इन पांचों को एक शब्द द्वारा 'करुणा' भी कहते हैं। प्रज्ञा और करुणा ये दोनों बुद्धत्व प्राप्ति के उत्तम उपाय हैं। अभ्यास या भावना के द्वारा विकास की पराकाष्ठा को प्राप्त कर ये दोनों बुद्धत्व अवस्था में समरस होकर स्थित होती हैं। प्रज्ञा और करुणा की यह सामरस्यावस्था ही बुद्धत्व है। त्रिकायात्मक बुद्धत्व की प्राप्ति, बिना इन पारमिताओं के, सम्भव नहीं है।

  1. धर्मकाय,
  2. सम्भोगकाय और
  3. निर्माणकाय- ये तीन कार्य हैं। बुद्धत्व की प्राप्ति के साथ इन तीन कार्यों की प्राप्ति होती है।

वस्तुसत्ता
वैभाषिक बाह्यार्थवादी हैं। वे आन्तरिक एवं बाह्य सभी पदार्थों की वस्तुसत्ता स्वीकार करते हैं। सौत्रान्तिक भी बाह्यार्थवादी है और स्वभावसत्तावादी भी। सौत्रान्तिक आचार्य शुभगुप्त ने 'बाह्यार्थसिद्धकारिका' नामक अपने ग्रन्थ में बड़े विस्तार से युक्तिपूर्वक विज्ञानवादियों का खण्डन करके बाह्यार्थ की सत्ता सिद्ध की है। बाह्यार्थ को सिद्ध करने में सौत्रान्तिकों ने अभूतपूर्व एवं स्तुत्य प्रयास किया है। विज्ञानवादी निर्बाह्यार्थवादी हैं। इनके मत में बाह्यार्थ परिकल्पित मात्र हैं अर्थात बाह्यार्थ खपुष्पवत अलीक है। वे केवल विज्ञान-परिणाम की ही द्रव्यत: सत्ता स्वीकार करते हैं। चित्त-चैतसिकों के बाहर कोई धर्म नहीं है। परमाणु की सत्ता का उन्होंने बड़े जोरदार ढंग से निषेध किया है। फलत: परमाणुओं से संचित स्थूल बाह्यार्थ का निषेध अपने-आप हो जाता है।
परमाणु

आलयविज्ञान

निर्वाण

बुद्धवचन
वैभाषिक महायानसूत्रों को बुद्धवचन नहीं मानते, क्योंकि उनमें वर्णित विषय उन्हें अभीष्ट नहीं हैं। वे केवल हीनयानी त्रिपिटक को ही बुद्धवचन मानते हैं। प्राचीन या आगमानुयायी सौत्रान्तिक महायानसूत्रों को बुद्धवचन नहीं मानते थे, किन्तु धर्मकीर्ति के बाद के अर्वाचीन या युक्त्यनुयायी सौत्रान्तिक महायानी आचार्यों के प्रभाव से महायानसूत्रों को बुद्धवचन मानने लगे, फिर भी वे उनका अर्थ प्रकारान्तर से लेते थे। महायानी आचार्य हीनयानी और महायानी सभी सूत्रों को बुद्धवचन मानते हैं।
धर्मचक्र

द्विविज नैरात्म्य

विज्ञानवाद के अनुसार पुद्गलनैरात्म्य का स्वरूप पञ्च स्कन्धों से द्रव्यत: भिन्न, नित्य, शाश्वत आत्मा का निषेधमात्र है, वैभाषिक, सौत्रान्तिक आदि हीनयानी और स्वातन्त्रिक माध्यमिक भी ऐसा ही मानते हैं। विज्ञानवाद के अनुसार बाह्यार्थ से शून्यता या ग्राह्य-ग्राहकद्वय से शून्यता धर्मनैरात्म्य है तथा स्वातन्त्रिक माध्यमिकों के अनुसार धर्मों की परमार्थत: नि:स्वभावता धर्मनैरात्म्य है। प्रसंगिक ऐसा नहीं मानते। उनके मत में यद्यपि उक्त प्रकार की आत्मा का अस्तित्व मान्य नहीं है, तथापि उक्त प्रकार के पुद्गलनैरात्म्य के ज्ञान से सर्वविध आत्मदृष्टि का निषेध नहीं होता। उक्त ज्ञान केवल परिकल्पित आत्मृष्टि का ही प्रतिपक्ष है, जो (आत्मा) केवल सिद्धान्तविशेष से प्रेरित लोगों में ही होती है। सहज आत्मदृष्टि की इससे कुछ भी हानि नहीं होती। इसके मतानुसार नैरात्म्य की स्थापना पुद्गल तथा धर्म के भेद से की जाती हैं पुद्गलनि:स्वभावनता पुद्गलनैरात्म्य तथा घटादि नि:स्वभावता धर्मनैरात्म्य है।

द्विविध आवरण

सभी महायानी दर्शनों में द्विविधि आवरणों की व्यवस्था है, यथा –

  1. ज्ञेयावरण।

विज्ञानवाद के अनुसार पुद्गलात्मदृष्टि तथा उससे सम्बद्ध क्लेश 'क्लेशावरण' है। बाह्यार्थदृष्टि तथा उसकी वासनाएं 'ज्ञेयावरण' हैं स्वातान्त्रिक माध्यमिकमता में क्लेशावरण का स्वरूप विज्ञानवादियों से भिन्न नहीं है, किन्तु उनके मतानुसार धर्मों की सत्यत: सत्तादृष्टि ज्ञेयावरण है। प्रासंगिक माध्यमिक मतानुसार पुद्गलात्मदृष्टि तथा धर्मात्मदृष्टि सभी क्लेशावरण हैं, क्योंकि सभी स्वभावसद्-दृष्टि क्लेश होती है। स्वभावसद्-दृष्टि मुक्ति की प्राप्ति में मुख्य बाधक है। अत: मोक्षप्राप्ति के लिए नि:स्वभावता का ज्ञान अनिवार्य है। अत: श्रावक तथा प्रत्येकबुद्ध आर्यों के लिए नि:स्वभावता का ज्ञाता होना निश्चित होता है। स्वभावसद्-दृष्टि की वासना ज्ञेयावरण है। यही सर्वज्ञज्ञान की प्राप्ति में मुख्य बाधक है। उसके प्रहाण के लिए महाकरुणा से संगृहीत सम्भारों तथा पारिमताओं की आवश्यकता होती है। यह प्रासङ्गिकों की विशिष्ट मान्यता है।

द्विविध सत्य

प्रासङ्गिक माध्यमों के मतानुसार नि:स्वभावता ही 'परमार्थसत्य' है। उनके अनुसार 'परमार्थत:' यह विशेषण निरर्थक है।

प्रमाण विचार

  1. इन्द्रियप्रत्यक्ष,
  2. मानसप्रत्यक्ष और
  3. योगिप्रत्यक्ष।

त्रिकाय व्यवस्था

बुद्धत्व महायान का अन्तिम प्राप्तव्य पद है। महायान के अनुसार निरुपधिशेष निर्वाण प्राप्त होने पर भी व्यक्ति की रूपसन्तति एवं चित्तसन्तति का निरोध नहीं होता, जैसे कि हीनयानी दर्शनों के अनुसार होता है। महायानियों का कहना है कि निरुपधिशेष निर्वाण होने पर व्यक्ति की केवल क्लिष्ट सन्तति का ही निरोध होता है। अनास्त्रव पञ्चस्कन्ध सन्तति तो सवर्दा प्रवहमान होती ही रहती है।

  1. धर्मकाय,
  2. सम्भोग काय एवं
  3. निर्माण काय।

धर्मकाय

  1. ज्ञानधर्मकाय एवं
  2. आगन्तुक विशुद्ध स्वभावधर्मकाय।

सम्भोग काय

सांसारिक अवस्था में बोधिसत्त्व का जो सास्त्रव शरीर होता है, वह दश भूमियों की अवस्था में क्रमश: शुद्ध होता जाता है। आखिरी जन्म में बोधिसत्त्व 'चरमभविक बोधिसत्त्व' कहलाता है। वह चरमभविक बोधिसत्त्व अपने आखिरी जन्म में कामधातु और रूपधातु के स्थानों में उत्पन्न नहीं होता, अपितु केवल अकनिष्ठ घनक्षेत्र में ही जन्मग्रहण करता है। वहाँ उसका शरीर अत्यन्त दिव्य होता है और कर्म-क्लेशों का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। उसी दिव्य जन्म में वह बुद्ध हो जाता है। बुद्ध होते ही व्यक्ति सम्भोगकाय हो जाता है और उसका शरीर 32 महापुरुष लक्षणों और 80 अनुव्यजंनों से विभूषित हो जाता है। वह सम्भोगकाय निम्न पाँच विनियतों से युक्त होता है।

  1. स्थानविनियत- वह सर्वदा केवल अकनिष्ठ घनक्षेत्र में ही स्थित रहता है।
  2. कायविनियत-उसका शरीर 32 महापुरुषलक्षण और 80 अनुव्यञ्जनों से सर्वदा युक्त रहता हे।
  3. परिवारविनियत- उनके परिवार में केवल महायानी आर्य बोधिसत्त्व ही रहते हैं।
  4. वाग्-विनियत- यह सदा महायान धर्म का ही उपदेश देते हैं।
  5. कालविनियत- वह यावत्-संसार अर्थात जब तक संसार है, तब तक उसी रूप में स्थित रहते हैं।
  6. निर्माण काय
  1. तुषित लोक से च्युति,
  2. मातृकुक्षि में प्रवेश,
  3. लुम्बिनी उद्यान में अवतरण,
  4. शिल्प कला में निपुणता एवं कौमार्योचित ललित क्रीडाएं,
  5. रानियों के परिवार के साथ राज्यग्रहण,
  6. चार निमित्तों (वृद्ध, रोगी, मृत आदि) को देखकर ससंवेग प्रव्रज्या,
  7. नेरजंना नदी के तट पर छह वर्षों तक कठोर तपश्चरण,
  8. बोधिवृक्ष के मूल में उपस्थिति,
  9. मान की सम्पूर्ण सेना का दमन,
  10. वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधि की प्राप्ति,
  11. ऋषिपतन मृगदाव (सारनाथ) में धर्मचक्र-प्रवर्तन एवं
  12. कुशीनगर में महापरिनिर्वाण।

शैल्पिक निर्माणकाय

उत्तम निर्माणकाय को आधार बनाकर उत्तम कलाकार के रूप में प्रकट होना 'शैल्पिक निर्माणकाय' कहलाता है। एक समय शाक्यमुनि ने अपनी कला के अभिमानी गन्धर्वराज प्रमुदित का दमन करने के लिए स्वयं को वीणावादक के रूप में प्रकट किया था। यह 'शैल्पिक निर्माणकाय' का उदाहरण है।

नैर्याणिक निर्माणकाय

उत्तम निर्माणकाय एवं शैल्पिक निर्माणकाय के अतिरिक्त बुद्ध का अन्य सत्त्व के रूप में जन्म लेना 'नैर्याणिक निर्माणकाय' कहलाता है। उत्तम निर्माणकाय के रूप में राजा शुद्धोदन के पुत्र होने के पहले बुद्ध तुषित क्षेत्र में देवपुत्र सच्छ्वेतकेतु के रूप में उत्पन्न हुए थें उनका यह जन्म नैर्याणिक निर्माणकाय का उदाहरण है।

एकयानवाद

संसार में कोई भी ऐसा प्राणी नहीं है, जो किसी न किसी दिन बुद्धत्व प्राप्त न कर लेगा। श्रावक और प्रत्येकबुद्ध भी, जिन्होंने निरुपधिशेष निर्वाण भी प्राप्त कर लिया है, यह सम्भव है कि अनेक कल्पों तक वे निर्वाणधातु में लीन रहें, फिर भी उनका एक न एक दिन महायान में प्रवेश होगा और वे अवश्य बुद्धत्व प्राप्त करेंगे। आचार्य धर्मकीर्ति ने प्रमाणवार्तिक में जीवों की चित्तसन्तति को अनादि एवं अनन्त सिद्ध किया है*। इससे सिद्ध होता है कि निरुपधिशेषनिर्वाण की अवस्था में भी चित्तसन्तति विद्यमान होती है। जब चित्तसन्तति का उच्छेद नहीं होता, तब कोई कारण नहीं कि बुद्धत्व प्राप्त न किया जा सके। दोनों प्रकार के विज्ञानवादियों में आलयविज्ञान का मानना या न मानना ही सबसे बड़ा अन्तर है। किन्तु आलयविज्ञान मानने वाले विज्ञानवादी एकयानवादी ने होकर त्रियानवादी होते हैं, यह भी बड़ा अन्तर है। विज्ञानवाद की स्थापना या विज्ञप्तिमात्रता सिद्ध करने में भी यद्यपि दोनों के युक्तियों में भेद है, तथापि यह शैलीगत भेद है, मान्यताओं में नहीं।

तथागतगुह्यक

दशभूमीश्वर

वैभाषिक दर्शन

  1. ज्ञानप्रस्थान,
  2. प्रकरणपाद,
  3. विज्ञानकाय,
  4. धर्मस्कन्ध,
  5. प्रज्ञप्तिशास्त्र,
  6. धातुकाय एवं
  7. संगीतिपर्याय।


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