गांधारी

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गांधारी / Gandhari

महाभारत से

गांधार राज सुबल की पुत्री का नाम गांधारी था। उसने शिव को प्रसन्न करके सौ पुत्र पाने का वरदान प्राप्त किया था। भीष्म की प्रेरणा से धृतराष्ट्र का विवाह उसके साथ किया गया। गांधारी ने जब सुना कि उसका भावी पति अंधा है तो उसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली जिससे कि पतिव्रत धर्म का पालन कर पाये। महर्षि व्यास अत्यंत थके हुए तथा भूखे थे। गांधारी ने उनका सत्कार किया। प्रसन्न होकर उन्होंने गांधारी को अपने पति के अनुरूप सौ पुत्र प्राप्त करने का वरदान दिया। गर्भाधान के उपरांत दो वर्ष बीत गये। कुंती ने एक पुत्र प्राप्त भी कर लिया किंतु गांधारी ने संतान को जन्म नहीं दिया अत: क्रोध और ईर्ष्या के वशीभूत उसने अपने उदर पर प्रहार किया जिससे लोहे के समान कठोर मांसपिंड निकला। व्यास जी के प्रकट होने पर गांधारी ने उन्हें सब कुछ कह सुनाया। व्यास ने गुप्त स्थान पर घी से भरे हुए एक सौ एक मटके रखवा दिये। मांस-पिंड को शीतल जल से धोने पर उसके एक सौ एक खंड हो गये। प्रत्येक खंड एक-एक मटके में दो वर्ष के लिए रख दिया गया। उसके बाद ढक्कन खोलने पर प्रत्येक मटके से एक-एक बालक प्रकट हुआं अंतिम मटके से एक कन्या हुई जिसका नाम दु:शला रखा गया तथा उसका विवाह जयद्रथ से हुआ।


पहला मटका खोलने पर जो बालक प्रकट हुआ उसका नाम दुर्योधन हुआ। उसने जन्म लेते ही गदहे की तरह बोलना प्रारंभ किया तथा प्रकृति में अपशकुन प्रकट हुए। पंडितों ने कहा कि इस बालक का परित्याग कर देने से कौरव-वंश की रक्षा हो सकती है अन्यथा अनर्थ होगा, किंतु मोह वश गांधारी तथा धृतराष्ट्र ने उसका परित्याग नहीं किया। उसी दिन कुंती के घर में भीम ने जन्म लिया। धृतराष्ट्र की एक वैश्य जाति की सेविका थी जिससे धृतराष्ट्र को युयुत्सुकरण नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।


महाभारत में विजय प्राप्त करने के उपरांत पांडव पुत्रविहीना गांधारी के सम्मुख जाने का साहस नहीं कर पा रहे थे। वह उन्हें देखते ही कोई शाप न दे दें, इस बात का भी भय था। अत: उन लोगों ने श्रीकृष्ण को तैयार करके उनके पास भेजा। कृष्ण गांधारी के क्रोध का शमन कर आये। तदुपरांत पांडव धृतराष्ट्र की आज्ञा लेकर गांधारी के दर्शन करने गये। गांधारी उन्हें शाप देने के लिए उद्यत हुईं किंतु महर्षि व्यास ने उनकी मन:स्थिति जानकर उन्हें समझाया कि कौरवों के प्रतिदिन प्रणाम करने पर वह आशीष देती थीं कि जहां धर्म वहीं जय है फिर धर्म के जीतने पर उन्हें इस प्रकार क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। गांधारी ने कहा कि भीम ने दुर्योधन के साथ अधर्म युद्ध किया था। उसने नाभि के नीचे गदा से प्रहार किया जो कि नियम-विरुद्ध था, अत: उस संदर्भ में वह उन्हें कैसे क्षमा कर दे? भीम ने अपने इस अपराध के लिए क्षमा-याचना की, साथ ही याद दिलाया कि उसने भी द्यूत क्रीड़ा, चीर हरण आदि में अधर्म का प्रयोग किया था। गांधारी ने पुन: कहा- 'तुमने दु:शासन का रक्तपान किया।' भीम ने कहा- 'सूर्य पुत्र यम जानते हैं कि रक्त मेरे दांत के अंदर नहीं गया, मेरे हाथ रक्तरंजित थे। वह कर्म केवल त्रास उत्पन्न करने के लिए किया था। द्रौपदी के केश खींचे जाने पर मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की थी।' गांधारी ने कहा- 'तुम मेरे किसी भी एक कम अपराधी पुत्र को जीवित छोड़ देते तो हम दोनों के बुढ़ापे का सहारा रहता।' गांधारी ने युधिष्ठिर को पुकारा, वह कौरवों का वध करने का अपराध स्वीकारते हुए गांधारी के चरण-स्पर्श करने लगे। गांधारी ने आंख पर बंधी पट्टी से ही उनके पैर की कोर देखी और उनके नाख़ून काले पड़ गये। यह देखकर अर्जुन भयभीत होकर कृष्ण के पीछे छिप गया। उसके छिपने की चेष्टा जानकर गांधारी का क्रोध ठंडा पड़ गया। तदुपरांत कुंती के दर्शन किये। कुंती पांडवों के क्षत-विक्षत शरीरों पर हाथ फेरती और देखती ही रह गयी। द्रौपदी अभिमन्यु इत्यादि वीरगति को प्राप्त हुए अपने बेटों को याद कर रोती रही। उन सबके बिना राज्य भला किस काम का। गांधारी ने दोनों को धीरज बंधाया। जो होना था, हो गया। उसके लिए शोक करने से क्या लाभ? तदनंतर वेदव्यास जी के वरदान से गांधारी को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई जिससे वह कौरवों का संपूर्ण विनाश-स्थल देखने में समर्थ हो गयीं। गांधारी युद्ध-क्षेत्र में पड़े कौरव-पांडव बंधुओं, सैनिकों के शव तथा उनसे चिपटकर रोती उनकी पत्नियों और माताओं का विलाप देख-देखकर श्रीकृष्ण को संबोधित कर रोने लगीं। उन दु:खिताओं में उत्तरा भी थी, कौरवों की पत्नियां भी थीं, दु:शला भी थी, जो अपने पति जयद्रथ का सिर खोजने के लिए इधर-उधर भटक रही थी। भूरिश्रवा की पत्नियां विलाप कर रही थीं। शल्य, भगदत्त, भीष्म, द्रोण को देख गांधारी सिसकती रहीं, विलाप करती रहीं।


द्रुपद की रानियां और पुत्र वधुएं उसकी जलती चिता की परिक्रमा ले रही थीं। रोते-रोते गांधारी अचानक क्रुद्ध हो उठीं। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा-'मेरे पतिव्रत में बल है तो शाप देती हूं कि यादव वंशी समस्त लोग परस्पर लड़कर मर जायेंगे। तुम्हारा वंश नष्ट हो जायेगा, तुम अकेले जंगल में अशोभनीय मृत्यु प्राप्त करोगे क्योंकि कौरव-पांडवों का युद्ध रोक लेने में एकमात्र तुम ही समर्थ थे और तुमने उन्हें रोका नहीं। तुम्हारे देखते-देखते कुरु वंश का नाश हो गया।' श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर कहा,'जो कुछ आप कह रही हैं, यथार्थ है- यह सब तो पूर्व निश्चित है, ऐसा ही होगा।' [1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 109, 114 115, स्त्रीपर्व 21-25, शल्यपर्व 63


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