चौंसठ कलाएँ

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चौंसठ कलाऐं / 64 Ancient Arts

(लेखक— पं॰ श्रीदुर्गादत्तजी त्रिपाठी)

  1. इतिहास,
  2. आगम,
  3. काव्य,
  4. अलंकार,
  5. नाटक,
  6. गायकत्व,
  7. कवित्व,
  8. कामशास्त्र,
  9. दुरोदर (द्यूत),
  10. देशभाषालिपिज्ञान,
  11. लिपिकर्प,
  12. वाचन,
  13. गणक,
  14. व्यवहार,
  15. स्वरशास्त्र,
  16. शाकुन,
  17. सामुद्रिक,
  18. रत्नशास्त्र,
  19. गज-अश्व-रथकौशल,
  20. मल्लशास्त्र,
  21. सूपकर्म (रसोई पकाना),
  22. भूरूहदोहद (बागवानी),
  23. गन्धवाद,
  24. धातुवाद,
  25. रससम्बन्धी खनिवाद,
  26. बिलवाद,
  27. अग्निसंस्तम्भ,
  28. जलसंस्तम्भ,
  29. वाच:स्तम्भन,
  30. वय:स्तम्भन,
  31. वशीकरण,
  32. आकर्षण,
  33. मोहन,
  34. विद्वेषण,
  35. उच्चाटन,
  36. मारण,
  37. कालवंचन,
  38. स्वर्णकार
  39. परकायप्रवेश,
  40. पादुका सिद्धि,
  41. वाकसिद्धि,
  42. गुटिकासिद्धि,
  43. ऐन्द्रजालिक,
  44. अंजन,
  45. परदृष्टिवंचन,
  46. स्वरवंचन,
  47. मणि-मन्त्र औषधादिकी सिद्धि,
  48. चोरकर्म,
  49. चित्रक्रिया,
  50. लोहक्रिया,
  51. अश्मक्रिया,
  52. मृत्क्रिया,
  53. दारूक्रिया,
  54. वेणुक्रिया,
  55. चर्मक्रिया,
  56. अम्बरक्रिया,
  57. अदृश्यकरण,
  58. दन्तिकरण,
  59. मृगयाविधि,
  60. वाणिज्य,
  61. पाशुपाल्य,
  62. कृषि,
  63. आसवकर्म और
  64. लावकुक्कुट मेषादियुद्धकारक कौशल।
  1. पहली 'काम शास्त्रांगभूता' और
  2. दूसरी 'तन्त्रावापौपयिकी'।

कर्माश्रया 24 कलाओं के नाम इस प्रकार हैं-

  1. गीत,
  2. नृत्य,
  3. वाद्य,
  4. कौशल-लिपिज्ञान,
  5. उदारवचन,
  6. चित्रविधि,
  7. पुस्तकर्म,
  8. पत्रच्छेद्य,
  9. माल्यविधि,
  10. गन्धयुत्स्यास्वाद्यविधान,
  11. रत्नपरीक्षा,
  12. सीवन,
  13. रंगपरिज्ञान,
  14. उपकरणक्रिया,
  15. मानविधि,
  16. आजीवज्ञान,
  17. तिर्यग्योनिचिकित्सित,
  18. मायाकृतपाषण्डपरिज्ञान,
  19. क्रीड़ाकौशल,
  20. लोकज्ञान,
  21. वैचक्षण्य,
  22. संवाहन,
  23. शरीरसंस्कार और
  24. विशेष कौशल।

द्यूताश्रया 20 कलाओं में 15 निर्जीव और 5 सजीव हैं। निर्जीव कलाएँ ये हैं-

  1. आयु:प्राप्ति,
  2. अक्षविधान,
  3. रूप-संख्या,
  4. क्रियामार्गण,
  5. बीजग्रहण,
  6. नयज्ञान,
  7. करणादान,
  8. चित्राचित्रविधि,
  9. गूढ़राशि,
  10. तुल्याभिहार,
  11. क्षिप्रग्रहण,
  12. अनुप्राप्तिलेखस्मृति,
  13. अग्निक्रम,
  14. छलव्यामोहन और
  15. ग्रहदान।

सजीव 5 कलाएँ ये हैं-

  1. उपस्थानविधि,
  2. युद्ध,
  3. रूत,
  4. गत और
  5. नृत्त।

शयनोपचारिका 16 कलाएँ ये हैं-

  1. पुरुष का भावग्रहण,
  2. स्वरागप्रकाशन,
  3. प्रत्यंगदान,
  4. नख-दन्तविचार,
  5. नीविस्त्रंसन,
  6. गुह्यांगका संस्पर्शनानुलोम्य,
  7. परमार्थ कौशल,
  8. हर्षण,
  9. समानार्थताकृतार्थता,
  10. अनुप्रोत्साहन,
  11. मृदुक्रोधप्रवर्तन,
  12. सम्यक्क्रोधनिवर्तन,
  13. क्रुद्धप्रसादन,
  14. सुप्तपरित्याग,
  15. चरमस्वापविधि और
  16. गुह्यगूहन।

4 उत्तरकलाएँ ये हैं-

  1. साश्रुपात रमण को शापदान,
  2. स्वशपथक्रिया,
  3. प्रस्थितानुगमन और
  4. पुन:पुनर्निरीक्षण। इस प्रकार दूसरे प्रकार की भी सर्वसाधारण के लिये उपयोगिनी 64 कलाएँ हैं।
  1. गीत,
  2. वाद्य,
  3. नृत्य,
  4. आलेख्य,
  5. विशेषकच्छेद्य (मस्तक पर तिलक लगाने के लिये कागज, पत्ती आदि काटकर आकार या साँचे बनाना),
  6. तण्डुल-कुसुमबलिविकार (देव-पूजनादि के अवसर पर तरह-तरह के रँगे हुए चावल, जौ आदि वस्तुओ तथा रंगविरंगे फूलों को विविध प्रकार से सजाना),
  7. पुष्पास्तरण,
  8. दशनवसनांगराग (दाँत, वस्त्र तथा शरीर के अवयवों को रँगना),
  9. मणिभूमिका-कर्म (घर के फर्श के कुछ भागों को मोती, मणि आदि रत्नों से जड़ना),
  10. शयनरचन (पलंग लगाना),
  11. उदकवाद्य (जलतरंग),
  12. उदकाघात (दूसरों पर हाथों या पिचकारी से जल की चोट मारना),
  13. चित्राश्च योगा: (जड़ी-बूटियों के योग से विविध वस्तुएँ ऐसी तैयार करना या ऐसी औषधें तैयार करना अथवा ऐसे मन्त्रों का प्रयोग करना जिनसे शत्रु निर्बल हो या उसकी हानि हो), #माल्यग्रंथनविकल्प (माला गूँथना),
  14. शेखरकापीड़योजन (स्त्रियों की चोटी पर पहनने के विविध अलंकारों के रूप में पुष्पों को गूँथना),
  15. नेपथ्यप्रयोग (शरीर को वस्त्र, आभूषण, पुष्प आदि से सुसज्जित करना),
  16. कर्णपत्रभंग (शंक्ख, हाथीदाँत आदि के अनेक तरह के कान के आभूषण बनाना),
  17. गन्धयुक्ति (सुगन्धित धूप बनाना),
  18. भूषणयोजन,
  19. ऐन्द्रजाल (जादू के खेल),
  20. कौचुमारयोग (बल-वीर्य बढ़ाने वाली औषधियाँ बनाना),
  21. हस्तलाघव (हाथों की काम करने में फुर्ती और सफ़ाई),
  22. विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकार-क्रिया (तरह-तरह के शाक, कढ़ी, रस, मिठाई आदि बनाने की क्रिया),
  23. पानकरस-रागासव-योजन (विविध प्रकार के शर्बत, आसव आदि बनाना),
  24. सूचीवान कर्म (सुई का काम, जैसे सीना, रफू करना, कसीदा काढ़ना, मोजे-गंजी बुनना),
  25. सूत्रक्रीड़ा (तागे या डोरियों से खेलना, जैसे कठपुतली का खेल),
  26. वीणाडमरूकवाद्य,
  27. प्रहेलिका (पहेलियाँ बूझना),
  28. प्रतिमाला (श्लोक आदि कविता पढ़ने की मनोरंजक रीति),
  29. दुर्वाचकयोग (ऐसे श्लोक आदि पढ़ना, जिनका अर्थ और उच्चारण दोनों कठिन हों),
  30. पुस्तक-वाचन,
  31. नाटकाख्यायिका-दर्शन,
  32. काव्य समस्यापूरण,
  33. पट्टिकावेत्रवानविकल्प (पीढ़ा, आसन, कुर्सी, पलंग, मोढ़े आदि चीजें बेंत बगेरे वस्तुओं से बनाना),
  34. तक्षकर्म (लकड़ी, धातु आदि को अभष्टि विभिन्न आकारों में काटना),
  35. तक्षण (बढ़ई का काम),
  36. वास्तुविद्या,
  37. रूप्यरत्नपरीक्षा (सिक्के, रत्न आदि की परीक्षा करना),
  38. धातुवाद (पीतल आदि धातुओं को मिलाना, शुद्ध करना आदि),
  39. मणिरागाकर ज्ञान (मणि आदि का रँगना, खान आदि के विषय का ज्ञान),
  40. वृक्षायुर्वेदयोग,
  41. मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधि (मेंढे, मुर्गे, तीतर आदि को लड़ाना),
  42. शुकसारिका प्रलापन (तोता-मैना आदि को बोली सिखाना),
  43. उत्सादन संवाहन, केशमर्दनकौशल (हाथ-पैरों से शरीर दबाना, केशों का मलना, उनका मैल दूर करना आदि),
  44. अक्षरमुष्टि का कथन (अक्षरों को ऐसी युक्ति से कहना कि उस संकेत का जानने वाला ही उनका अर्थ समझे, दूसरा नहीं; मुष्टिसकेंत द्वारा वातचीत करना, जैसे दलाल आदि कर लेते हैं), #म्लेच्छित विकल्प (ऐसे संकेत से लिखना, जिसे उस संकेत को जानने वाला ही समझे),
  45. देशभाषा-विज्ञान,
  46. पुष्पशकटिका,
  47. निमित्तज्ञान (शकुन जानना),
  48. यन्त्र मातृका (विविध प्रकार के मशीन, कल, पुर्जे आदि बनाना),
  49. धारणमातृका (सुनी हुई बातों का स्मरण रखना),
  50. संपाठय,
  51. मानसी काव्य-क्रिया (किसी श्लोक में छोड़े हुए पद को मन से पूरा करना),
  52. अभिधानकोष,
  53. छन्दोज्ञान,
  54. क्रियाकल्प (काव्यालंकारों का ज्ञान),
  55. छलितक योग (रूप और बोली छिपाना),
  56. वस्त्रगोपन (शरीर के अंगों को छोटे या बड़े वस्त्रों से यथायोग्य ढँकना),
  57. द्यूतविशेष,
  58. आकर्ष-क्रीडा (पासों से खेलना),
  59. बालक्रीडनक,
  60. वैनयिकी ज्ञान (अपने और पराये से विनयपूर्वक शिष्टाचार करना),
  61. वैजयिकी-ज्ञान (विजय प्राप्त करने की विद्या अर्थात् शस्त्रविद्या) और
  62. व्यायामविद्या। इनका विशेष विवरण जयमंगल ने कामसूत्र की व्याख्या में किया है।
  1. तत-तार अथवा ताँत का जिसमें उपयोग होता है, वे वाद्य 'तत' कहे जाते हैं- जैसे वीणा, तम्बूरा, सारगीं, बेला, सरोद आदि।
  2. सुषिर- जिसका भीतरी भाग सच्छिद्र (पोला) हो और जिसमें वायु का उपयोग होता हो, उसको 'सुषिर' कहते हैं- जैसे बांसुरी, अलगोजा, शहनाई, बैण्ड, हारमोनियम, शंख आदि।
  3. अवनद्ध -चमड़े से मढ़ा हुआ वाद्य 'अवनद्ध' कहा जाता है- जैसे ढोल, नगारा, तबला, मृदंग, डफ, खँजड़ी आदि।
  4. घन- परस्पर आघात से बजाने योग्य वाद्य 'घन' कहलाता है- जैसे झांझ, मंझीरा, करताल आदि। यह कला गाने से सम्बन्ध रखती हैं बिना वाद्य के गान में मधुरता नहीं आती। प्राचीन काल में भारत के वाद्यों में वीणा मुख्य थी। इसका उल्लेख प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। सरस्वती और नारद का वीणा वादन, श्रीकृष्ण की वंशी, महादेव का डमरू तो प्रसिद्ध ही है। वाद्य आदि विषयों के संस्कृत में अनेक ग्रन्थ हैं। उनमें अनेक वाद्यों के परिमाण, उनके बनाने और मरम्मत करने की विधियाँ मिलती हैं। राज्यभिषेक, यात्रा, उत्सव, विवाह, उपनयन आदि मांगलिक कार्यों के अवसरों पर भिन्न-भिन्न वाद्यों का उपयोग होता था। युद्ध में सैनिकों के उत्साह, शौर्य को बढ़ाने के लिये अनेक तरह के वाद्य बजाये जाते थे।

ऐसे युद्ध का उदाहरण मधु-कैटभ के साथ विष्णु का युद्ध है, जो समुद्र में पाँच हज़ार वर्षों तक होता रहा था—

मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ॥
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान हरि:॥
पंचवर्षसहस्त्राणि बाहुप्रहरणो विभु:। (सप्तशती 1। 92-94)
  1. रूपभेद (रंगों की मिलावट),
  2. प्रमाण (चित्र में दूरी, गहराई आदि का दिखलाना और चित्रगत वस्तु के अंगों का अनुपात),
  3. भाव और लावण्य की योजना,
  4. सादृश्य,
  5. वर्णिका (रंगों का सामंजस्य) और
  6. भंग (रचना-कौशल)। 'समरागंणसूत्रधार' आदि प्राचीन शिल्पग्रन्थों में इस कला का विशदरूप से विवरण उपलब्ध होता है।

निष्कर्ष

यह पाठयक्रम कितना व्यापक है! इसमें प्राय: सभी विषयों का समावेश हो जाता है। इसी अंक में अन्यत्र प्रकाशित 'हिंदू-संस्कृतिका आधार' शीर्षक लेख में जिन 32 विद्याओं का संक्षिप्त वर्णन किया गया है, उनका भी इसी पाठयक्रम में समावेश है। शिक्षा का यह उद्देश्य माना जाता है कि उससे ज्ञान की वृद्धि हो, सदाचार में प्रवृत्ति हो और जीविकोपार्जन में सहायता मिले। इस क्रम में इन तीनों का ध्यान रखा गया है। इतना ही नहीं, पारलौकिक कल्याण भी नहीं छोड़ा गया है। संक्षेप में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थो को ध्यान में रखकर ही शिक्षा का यह क्रम निश्चित किया गया है। इससे पता लगता है कि उस समय-की शिक्षा का आदर्श कितना उच्च तथा व्यावहारिक था। श्रीकृष्णचन्द्र को इन सभी विषयों की पूरी शिक्षा दी गयी थी और वे प्राय: सभी में प्रवीण थें। अर्जुन नृत्यकला और नल, भीम आदि पाकविद्या में निपुण थें परशुराम, द्रोणाचार्य-सरीखे ब्राह्मण धनुर्वेद में दक्ष थे। इससे जान पड़ता है कि गुरुकुलों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों के बालकों को प्राय: इन सभी विषयों की थोड़ी-बहुत शिक्षा दी जाती रही होगी। परंतु इस शिक्षा से ऐसा न हो कि जो काम जिसके जी में आया करने लगा, जैसा कि आजकल होता है- इसका भी ध्यान रखा गया था। क्योंकि ऐसा होने से सारी समाज व्यवस्था ही बिगड़ जाती, श्रेणी-संघर्ष और बेकारी की उत्पत्ति होती, जैसा कि आजकल देखने में आ रहा है। सब मनुष्यों का स्वभाव एक-सा नहीं होता, किसी की प्रवृत्ति किसी ओर तो किसी की किसी ओर होती है। जिसकी जिस ओर प्रवृत्ति है, उसी में अभ्यास करने से कुशलता प्राप्त होती है। इसीलिये शुक्राचार्य ने लिखा है—
यां यां कलां समाश्रित्य निपुणो यो हि मानव:।
नैपुण्यकरणे सम्यक् तां तां कुर्यात् स एव हि॥

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. शक्तो मूकोऽपि यत् कर्तुं कलासंज्ञं तु तत् स्मृतम्।
  2. 'मृतस्य तस्य न स्वर्गो यशो नेहापि विद्यते। बलदर्पविनाशान्तं नियुद्धं यश से रिपो:। न कस्यासीद्धि कुर्याद्वै प्राणान्तं बाहुयुद्धकम्॥
  3. जलवाथ्वग्निसंयोगनिरोधैश्च क्रिया कला।
  4. स्वर्णाद्यलंकारकृति: कलालेपादिसत्कृति:।
  5. मार्दवादिक्रियाज्ञानं चर्मणां तु कला स्मृता। पशुचर्मांगनिर्हारक्रियाज्ञानं कला स्मृता ॥
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