भारद्वाज

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महर्षि भारद्वाज / Bhardwaj

भारद्वाज का वंश

विषय सूची

ऋषि भरद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रद्रष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रद्रष्टा मानी गयी है। भारद्वाज के मन्त्रद्रष्टा पुत्रों के नाम हैं- ऋजिष्वा, गर्ग, नर, पायु, वसु, शास, शिराम्बिठ, शुनहोत्र, सप्रथ और सुहोत्र। ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार 'कशिपा' भारद्वाज की पुत्री कही गयी है। इस प्रकार ऋषि भारद्वाज की 12 संताने मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की कोटि में सम्मानित थीं। भारद्वाज ऋषि ने बड़े गहन अनुभव किये थे। उनकी शिक्षा के आयाम अतिव्यापक थे।

भारद्वाज की शिक्षा

साम-गायक

भारद्वाज ने 'सामगान' को देवताओं से प्राप्त किया था।

भारद्वाज के विचार

  1. भारद्वाज कहते हैं अग्नि को देखो, यह मरणधर्मा मानवों में मौजूद अमर ज्योति है। यह अग्नि विश्वकृष्टि है अर्थात सर्वमनुष्य रूप है। यह अग्नि सब कर्मों में प्रवीणतम ऋषि है, जो मानव में रहती है, उसे प्रेरित करती है ऊपर उठने के लिये। अत: पहचानो। [11]
  2. मानवी अग्नि जागेगी। विश्वकृष्टि को जब प्रज्ज्वलित करेंगे तो उसे धारण करने के लिये साहस और बल की आवश्यकता होगी। इसके लिये आवश्यक है कि आप सच्चाई पर दृढ़ रहें।
  3. ऋषि भारद्वाज कहते हैं- 'हम झुकें नहीं। हम सामर्थ्यवान के आगे भी न झुकें। दृढ़ व्यक्ति के सामने भी नहीं झुकें। क्रूर-दुष्ट-हिंसक-दस्यु के आगे भी हमारा सिर झुके नहीं'। [12]
  4. ऋषि समझाते हैं कि जीभ से ऐसी वाणी बोलनी चाहिये कि सुनने वाले बुद्धिमान बनें। [13]
  5. हमारी विद्या ऐसी हो, जो कपटी दुष्टों का सफाया करे, युद्धों में संरक्षण दे, इच्छित धनों का प्राप्त कराये और हमारी बुद्धियों को निन्दित मार्ग से रोके। [14]
  1. हे सरस्वती! तू युद्धों में हम सबका रक्षण कर। [16]
  2. हे सरस्वती! तू हम सबकी बुद्धियों की सुरक्षा कर। [17]
  3. इस प्रकार भारद्वाज के विचारों में वही विद्या है, जो हम सबका पोषण करे, कपटी दुष्टों का विनाश करे, युद्ध में हमारा रक्षण करे, हमारी बुद्धि शुद्ध रखे तथा हमें वाञ्छित अर्थ देने में समर्थ हो।
  4. ऐसी विद्या को जिन्होंने प्राप्त किया है, ऋषि का उन्हें आदेश है- [18]अरे, ओ ज्ञान को प्रत्यक्ष करने वाले! प्रजाजनों को उस उत्तम ज्ञान को सुनाओ और जो दास हैं, सेवक हैं, उनको श्रेष्ठ नागरिक बनाओ। [19]
  5. ज्ञानी, विज्ञानी, शासक, कुशल योद्धा और राष्ट्र को अभय देने वाले ऋषि भरद्वाज के ऐसे ही तीव्र तेजस्वी और प्रेरक विचार हैं।

रामायण से

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, शान्तिपर्व (182।5)
  2. महाभारत, शान्तिपर्व(210।21)।
  3. महाभारत, शान्तिपर्व (58।3)
  4. तैत्तिरीय ब्राह्मण 3।10।11
  5. (ऐतरेय आरण्यक 1।2।2)।
  6. (सूत्र-स्थान 1।26)
  7. (जैमिनीय ब्राह्मण 3।2।8)।
  8. (ऋक्तन्त्र 10।181।2)।
  9. (ऐतरेय-ब्राह्मण 36।3)।
  10. (काठक 21।10)।
  11. पश्यतेममिदं ज्योतिस्मृतं मर्त्येषु। (ऋक्तन्त्र 6।9।4) प्रचेता अग्निर्वेधस्तम ऋषि:। (ऋक्तन्त्र 6।14।2)
  12. न वीळवे नमते न स्थिराय न शर्धते दस्युजूताय0 (ऋक्तन्त्र 6।24।8)
  13. 'जिह्वया सदमेदं सुमेधा आ' (6।67।8)।
  14. (ऋक्तन्त्र 6।61 3,6,14)
  15. 'नि बर्हय प्रजां विश्वस्य बृसयस्य मायिन:।'
  16. 'धीनामवित्र्यवतु॥'ऋक्तन्त्र
  17. 'अवा वाजेषु' नो नेषि वस्य:।' (6।61।3,4,6,14)
  18. 'श्रुत श्रावय चर्षणिभ्य:' (6।31।5)
  19. 'दासान्यार्याणि कर:' (6।22।10)।
  20. बाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड, सर्ग 54, श्लोक 10-54
  21. बाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड, सर्ग 91, श्लोक 12-83

लेखक:(आचार्य श्रीदुर्गाचरणजी शुक्ल)

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