गीता 13:31

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गीता अध्याय-13 श्लोक-31 / Gita Chapter-13 Verse-31

प्रसंग-


अब भगवान् द्वारा तीसरे श्लोक में जो 'यत्प्रभावश्च' पद से क्षेत्रज्ञ का प्रभाव सुनने का संकेत किया गया था, उसके अनुसार तीन श्लोकों द्वारा आत्मा के प्रभाव का वर्णन करते हैं-


अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय: ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ।।31।।



हे <balloon link="index.php?title=अर्जुन" title="महाभारत के मुख्य पात्र है। पाण्डु एवं कुन्ती के वह तीसरे पुत्र थे । अर्जुन सबसे अच्छा धनुर्धर था। वो द्रोणाचार्य का शिष्य था। द्रौपदी को स्वयंवर मे जीतने वाला वो ही था। ¤¤¤ आगे पढ़ने के लिए लिंक पर ही क्लिक करें ¤¤¤">अर्जुन</balloon> ! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है ।।31।।

Arjuna, being without beginning and without attributes, this indestructible supreme spirit, though dwelling in the body, in fact does nothing nor gets contaminated. (31)


कौन्तेय = हे अर्जुन ; अनादित्वात् = अनादि होने से (और) ; निर्गुणत्वात् = गुणातीत होने से ; अयम् = यह ; अव्यय: = अविनाशी ; परमात्मा = परमात्मा ; शरीरस्थ: = शरीर में स्थित हुआ ; अपि = भी (वास्तव में) ; न = न ; करोति = करता है (और) ; न = न ; लिप्यते = लिपायमान होता है ;



अध्याय तेरह श्लोक संख्या
Verses- Chapter-13

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