चतुर्वेदी इतिहास 2

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माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों का इतिहास-लेखक, श्री बाल मुकुंद चतुर्वेदी

इतने प्रयासों के होते हुए भी हमारा इतिहास पूर्णता को प्राप्त नहीं हुआ। इन छुटपुट प्रयासों ने उसकी आधार शिलाएं रखी और वे सभी इतिहास भवन निमार्ण की प्रतीक्षा में भविष्य की ओर देखती रहीं। एक बार महामहोपाध्याय श्री गिरिधर शर्मा जी के सभापतित्व में भी एक इतिहास समिति मथुरा में बनी थी, किन्तु उसने भी कोई आशाप्रद उद्योग नहीं किया। निराशा के क्रूर हाथ न जाने क्यों हमारा मार्ग अवरूद्ध किये रहे।

विषय सूची

माथुर ब्राह्मणों के आदि मानप्रदाता श्री वाराहदेव

माथुर ब्राह्मण सब ब्राह्मणों से श्रेष्ठ आदि वंशज देव मूर्ति तथा पूजनीय हैं। यह उदघोषणा सबसे पहले भारत[1] के प्राचीन साहित्य में श्रीवाराह प्रभु द्वारा प्रवर्तित वराह पुराण से प्राप्त होती हैं। महर्षि वेदव्यास की अठारह पुराणों के प्रणयन की आयोजना में श्रीवाराह पुराण का स्थान अति महत्वपूर्ण और प्राचीनतम है।

आज के युग के पाश्चात्य चकाचौंध से "तिमिरांधवत" हुए "न्यू लाइट मैन" लोग प्रभु वाराह को शूकर मानकर उनके द्वारा प्रस्तुत इस पुराण को उपहास की वस्तु समझे हुए हैं। पाश्चात्य ही नहीं हमारे भारतीय मूल के ब्राह्मण पुत्र भी बिना समझे ही इसी मार्ग को अनुसरण करते जाते हैं। इस महाभ्रान्ति में देश के बड़े-बड़े मनीषी विद्वान आचार्य और डाक्टर, पी.एच.डी. भी चक्कर खा रहे हैं। इस लेख द्वारा हम उन सभी भूले-भटके बन्धुओं को भ्रान्तिमुक्त कर देना चाहते हैं।

वाराह कौन थे

भारतीय पौराणिक काल गणना के अनुसार वाराह कल्प की सृष्टि के आदि प्रतिष्ठापक देवाधिदेव प्रभु श्री नील वाराह थे। नील वाराह का समय संशोधित पौराणिक काल गणना के अनुसार 13,850 विक्रम सम्वत पूर्व का हैं। वाराह, सिंह, बानर, नाग भारत की प्राचीन जातियाँ हैं जो पाद्मकल्प में भी मौजूद थीं। प्राचीन नामकरण पद्धति के अनुसार प्राचीन सृष्टि कल्पों में विधाता ब्रह्मदेव ने प्रजाओं की जातियाँ पशु-पक्षी, कीट-पतंग, पर्वत-नदियों, वृक्ष जातियों आदि के नामों पर निर्धारित की थीं। महर्षि वशिष्ठ का वचन है –

पशुपक्षि गिरिवृक्षाणां ख्पाणि गुणकर्म च।

चरन्ति आत्मभावेन तेषां नामांकिता हि ते।।

अर्थात् – पशु पक्षी, पर्वतों, वृक्षों के रूपों गुणों और कर्मों को जो आत्म अंगीकृत भाव से धारण करते हैं वे प्रजाजन उन्हीं पशु-पक्षी आदि के नामों से लोक में मान्य किये जाते हैं। प्राचीन जम्बू द्वीप के नाभि वर्ष में जब सर्वत्र घने वनों का प्राबाय था तब उनमें रहने वाले वनवाराहों, सिंह-व्याघ्रों, सर्पों-नागों, बानरों आदि के गुण कर्मों, स्वभावों का अनुकरण करने वाली मानव प्रजायें उन्हीं के नामों से नामांकित की गई थीं। वन वाराह भी वलिष्ठ पुष्ठ पराक्रमी श्रेष्ठ जाति थी। वाराहों की प्राय: दो जातियाँ हुआ करती हैं।

  1. वन वाराह,
  2. ग्रामशूकर वाराह जाति

वन वाराहों के बल, शौर्य और पराक्रम की प्रतीक थी। इन्हें ग्रामशूकर मानना या कहना नितान्त भ्रमपूर्ण है। ऋग्वेद के एक मन्त्र में वाराहों को वीरूध ज्ञाता अर्थात वारी लगाने वाला कहा गया है। खेती और वारी कृषि के अलग-अलग प्रकार हैं। खेत में अन्न होता है जो सूखने-पकने पर प्रयोग में आता हैं जबकि वारी में साक-सब्जी, फल आदि वस्तुयें होती हैं जो हरी रहने पर ही उपयोग में आती हैं, पकने या सूखने पर वे अनुपयोगी हो जाती हैं।


वाराही जाति के लोग अभी भी (नाई) बारी या बरही बारैठ बरार, काछी कहे जाते हैं। बारी अभी भी प्राय: वारी लगाने या वन्य पत्तों से पत्तल-दौना बनाकर आजीविका चलाते हैं। विवाहादि के अवसर पर इन्हें सर्वत्र मान दिया जाता है। वाराही परम्परा के लोग बाराहसैनी, बारौठ, ठकार, बरैठ, बारहट, (चारण) आदि विभागों में अभी भी अनेक इकाइयों में हैं। बाह, बारामूला, बाराबंकी, बारैठा व्रार्सी सोना बारिकशायर बरेली, रायबरेली, बर्लिन आदि प्राचीन वाराह संस्कृति के अवशेष स्थल हैं। ब्रिटेन की भाषा में वारीयर (warrior) बारिक, बार्ड, बेपन आदि शब्द संस्कृत के वाराह रूप से ही गये हैं। आज भी हमारे देश में वाराह मिहिर महान ज्योतिषी तथा बाराह गिरी वैंकट भू.पू. राष्टपति महोदय क्या वन वाराह माने जा सकते हैं।


बाराह लोग महाविद्वान थे। उनके रचे वैदकि सूत्र ग्रन्थ बाराह श्रौत सूत्र तथा बाराह सूत्र प्राप्त हैं। बाराह कुशल शिल्पी और भूमि समतल कर्ता भी थे। उनके शिल्प आयुध खुरप्रहार (खुर्पा) दंष्ट्रप्रहार (दरांली), पादप्रहार (फावड़ा) गर्तकरी (गैंती) वसुन्धर सूलिका (वसूली) लोक प्रसिद्ध हैं। वन में उनके पशुचारन बन बरहे, खेती सींचने की नाली बरहा, भोजन पदार्थ बड़ा (पकौड़ी) कांस, बर्ही, बर्रू, बरेजा खेत करी रक्षा पंक्ति बाड़, बाढ़ा सर्वत्र प्रसिद्ध हैं।

वाराहों की इतिहास की पहिचान

भारतीय पुराण इतिहास में वाराहों के तीन अवतरण हैं। ये तीनों ही मथुरा मण्डल से सम्बन्धित और माथुर ब्राह्मणों के पूजक संरक्षक और आत्मीयजन रहे हैं। वेदों में इनकी प्रतिष्ठा सर्व प्राचीन है। वाराह मूर्तियाँ मालवा, मध्य प्रदेश[2], अजन्ता[3], एलोरा[4], काश्मीर, नेपाल[5], पुष्कर[6] आदि अनेक स्थानों पर है तथा मथुरा संग्रहालय में प्राचीन युगों की अनेक मूर्तियाँ इतिहास की साक्षी हैं।

1. नील वाराह

वाराह देव का प्रथम अवतार है। इसका विस्तृत वर्णन वायुरूप (यूरूप) यूराल पर्वत क्षेत्र के विशाल उपमहाद्वीप के अधिपति वायु देव ने अपने वायु पुराण के अध्याय 6 में किया है। नील वाराह ही यज्ञ वाराह हैं। पाद्मकल्प के रात्रि भाग में जब महाप्रलय हुई, तब भीटण सूर्य ताप से विश्व के सारे वन सूख गये, समुद्रों का पानी जल गया तब भूमि में भयानक उथल-पुथल आयी। भयानक भूकम्प और जगह-जगह प्रलयकारी ज्वालामुखी फूट निकले जिससे पृथ्वी ऊँची-नीची महाविषम हो गई। भूस्तर के वन नीचे समा गये जो आज कोयला तेल के रूप में प्रगट हो रहे हैं। तब जलीय वाष्प अति सघन होने से महामेघ बरसने लगे चक्रवात उठने लगे। समस्त पृथ्वी जल में निमग्न हो गयी। सृष्टि की यह बिडम्बना देख प्रजापति ब्रह्मा वायु रूप धारण कर आकाश में विचरने लगे और चिन्ता से उनका मन अति व्यग्रता में डूब गया।

इस दशा में ब्रह्म देव ने जल में बिहार करने और जलीय भूमि को अपनी तीव्र दंष्ट्राओं के प्रहार से विदीर्ण कर उसे पंकरूप में बाहर लाने वाले वाराहरूप के प्रधान देव का स्मर्ण किया। ब्रह्मा सृष्टि कर्ता की व्यग्रता अनुभव कर उसी समय प्रलय के जल में से भगवान नील वाराह का प्रादुर्भाव हुआ। उनका विशाल आकार गम्भीर मेघ गर्जना अवाधित गति को देख ब्रह्मदेव चकित रह गये। तभी महा मानव वाराह देव ने अपनी अंगभूत वाराही सेना प्रगट की और एक महासृष्टि रचना अभियान के रूप में तीक्ष्ण दंष्ट्राओं (दरातों) पाद प्रहारों (फावड़ो) और कुद्दालकों (कुदालियों) और गर्तकरी आयुधों (गैतियों) द्वारा पृथ्वी को समतल करने के लिए पर्वतों का छेदन तथा गर्तों के पूरण हेतु मृत्तिका के टीलों को जल में डालकर भूमि को बड़े श्रम के साथ समतल करने का प्रयास किया।


इस समय देवलोक द्युलोक ब्रज मथुरा मण्डल के देवता ऋषिगणों ने ब्रज के महृर्लोंक (महरौली, महारानी) जन लोक (जानू जथनूर) तथा सुपार्श्व पर्वत (मथुरा), गोवर्धन पर्वत, इन्द्रगिरि कामवन, नरनारायण पर्वत (बूढ़े बद्री), विष्णु परमपद (परमदरौ), आनन्द पर्वत (घाटौ), नन्दीश पर्वत, (नन्दगाँव), ब्रहत्सानु (बरसानौ), चन्द पुष्कर (चांदोखर) भानुपुष्कर (भाड़ोखर) गोविन्द पुष्कर (गैदोखर) वृन्दावन पुष्कर (बैदोखर), धवलगिरि,(धौलैड़ा) सुवर्णमेरू (सुन्हैरा) के प्रलय रक्षित क्षेत्र में जिसे प्रभु वाराह ने "अनश्वरा सा मथुरा प्रलयेकपिन संहृता:" कहकर प्रलय से रक्षा का क्षेत्र घोषित किया है उसी देव बनों से आच्छादित क्षेत्र में जन आश्रय देने वाला देखा।

देवों के आवाह्न और नव सृष्टि की संरचना हेतु उन्होंने तब पुण्यक्षेत्र मथुरा में वाराह तीर्थ की स्थापना कर एक अदभुत् महामहिमा मण्डित यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ का विषद वर्णन भी वायु पुराण के अध्याय 6 में प्राप्त है। नीलदेव नामधारी ये वाराहदेव ने अपने समस्त देह को यज्ञ रूप बनाकर अ,प यज्ञावतार रूप में यज्ञ में विराजे। यह यज्ञ वर्तमान सृष्टि का सबसे प्रथम सबसे महान और सबसे अधिक आधिदैविक आधिभौतिक और आध्यात्मिक तीनों गुणों वाला महान से महानतम यज्ञ था।

इस यज्ञ में उनकी पत्नी छायादेवी (छांहरी) रात्रि देवी या नयनादेवी थी। जो आदि माता के रूप ब्रज में तथा भारतवर्ष के अनेक स्थलों में पूजित है। इसी यज्ञ में नीलदेव शने यहाँ – ब्रह्मा, वायु, सूर्य, इन्द्र, नारायण (गोविन्द) तथा प्राचीन ऋषि-महर्षियों को महर्लोंक से नीचे उतारा, उन्हें वेद और तप तथा यज्ञ की विलुप्त हुई बिद्यायें दीं। वे सभी ऋषिगण मथुरा मण्डल के प्राचीन निवासी आदि वंशज माथुरदेव ही थे। इन्हें वाराहदेव ने अपने यज्ञ में उद्गाता होता, उपाकर्मविद् पद पर प्रतिष्टित कर उन्हें प्रथम वेद प्राप्तकर्ता नाना मंत्र दीक्षित प्रवर्ग्य आदि पदों नाना उपासना और छंदोविद् योगी और तपस्वी पद प्रदान किया। इस यज्ञ में प्रभु नील देव के अंगों से रोमदर्भ, नासा आज्य, मक्खन प्राणघृत, सामघोष सोम, अंतरात्मा ज्ञान, यज्ञ भूमि विश्व (मथुरा) स्कंध ब्राह्मण माथुर दीक्षा नाना मन्त्र, गो सुवर्ण रत्नादि भूमि दक्षिणा प्रगट किये। उस पुण्य अध्बर में अनेक दंष्ट्रा यूप थे, चरण वेद थे, वर्ण अग्नि था। जिह्वा अग्नि शिखायें थीं। शीर्ष ब्रह्मपद, प्राण महाघोष तथा सृष्टि रचना विनियोग था। स्वयं वायुदेव ने ही इसका सविस्तार विवरण अपने वायु पुराण में अध्याय 6 में "आँखों देखा हाल" के रूप में उल्लिखित किया है जिसे जिज्ञासु जन मनन और अध्ययन कर सकते हैं।

2. आदि वाराह

भगवान वाराह का द्वितीय अवतार आदि वाराह या कपिल वाराह है, 9260 विक्रम पूर्व यह अवतार हुआ है। कश्यप की सृष्टि में जब महाप्रबल हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष दो भाई देव भूमि में प्रगट हुए तब हिरण्य कश्यप को प्रह्लाद की भक्ति से प्रभावित होकर भगवान नृसिंह (नरजाति) ने वध किया तथा उसका भाई हिरण्याक्ष जिसे दक्षिण देश का राज्य दिया गया है। हिरण्याक्ष का शासन प्रदेश दक्षिण भारत में हिंगोली, हींगन घाट, हींगना नदी तथा हिरण्याक्षगण हैंगड़े नामों से अभी प्रसिद्ध हैं। हिरण्याक्ष द्वारा पाताल में ले जाई गई देवलोक की भूमि (ब्रज भूमि) की सारी संस्कृति सम्पत्ति (देवमूर्तिबाँ, तीर्थ, यज्ञ और पुण्य स्थलियां वेद, सम्पत्ति, देव नगर, तीर्थ यात्रा महत्व के दर्शनीय क्षेत्र) आदि ब्रज को उजाड़कर दक्षिण में स्थापित किये गयें। इससे देवलोक के ब्राह्मण माथुर जो नारायण के भक्त थे अति दु:खी हुए। इसी समय ब्राह्मणों और देवों के संकट को देखकर ब्रह्मदेव के नासिक भाग से प्रभु आदि वाराह देव का प्रादुर्भाव हुआ। आदि वाराह के साथ भी महाप्रबल वाराह सेना थी। वे अपनी सेना को लेकर हिरण्याक्ष के राष्ट्र पर चढ गये तथा विन्ध्यगिरि के पाद प्रसूत जल समुद्र को पार कर उन्होंने हिरण्याक्ष का पुर घेर लिया। संगमनेर में महा संग्राम हुआ तथा माथुर ब्राह्मथों को सन्तुष्ट कर उनका अर्चन सम्मान किया। इस सम्मान युक्त प्रतिष्ठा का रूप वाराह पुराण के मथुरा माहात्म्य अध्यायों में देखा जा सकता है।


मथुरा आकर आदि वाराहदेव ने बसमत महाराष्ट्र वासिनी अपनी प्रियतमा बसुमती देवी या बसुन्धरा देवी को जिसे वे अपने विजय स्मारक के रूप में विजयबाड़ा से लाये थे, उन्हें उसकी जिज्ञासा पूर्ति के रूप में "माथुर और मथुरा मण्डल का महत्व" अपने पुराण में विशेष रूप से बतलाया। वाराह देव ने दक्षिण के महाराष्ट्र प्रदेश में अपने नाम से एक पुरी भी बसाई जिसमें हिरण्याक्ष के बचे-खुचे दुष्ट दानवों को नियन्तित रखने के लिये अपनी सेना का एक अंग भी यहाँ छोड़ दिया। यह पुरी आज वहाँ बारामती कराड़ के नाम से प्रसिद्ध है। माथुरों के सबसे बड़े सम्मानदाता और प्रशंसक यह वाराह देव ही थे जिन्हें लोग अपने अज्ञान के कारण मनमाने रूप में कल्पित किये हुए हैं। वाराह देव कोटि का वर्णन वेदों में भी उपलब्ध है। ऋग्वेद में वाराह द्वारा चोरी गई हुई पृथ्वी का उद्वार तथा विन्ध्यापर्वत को पार करने का का वर्णन है।

इन आदि वाराह प्रभु का दिव्य देव विग्रह मथुरों की सेवा में निधि के रूप में मथुरा के मानिक चौक मुहल्ले में है तथा इसकी इतिहासिक कथा मथुरा महात्म्य में विस्तार से है। इनकी महामहिमामयी देवराज्ञी वाराही देवी का स्थान भी माथुरों की बगीची (बाटिका) बाराहीवारी में चतुर्वेद विद्यालय के बगल में है। प्रतापी देव नारियों में वाराही तथा नारसिंही दो ही अवतारी देवियाँ ऐसी हैं जो भगवती दुर्गा के रणसंग्राम में अपनी विशाल देव सेनाओं वाराही सेना और नारसिंही सेना लेकर उनका स्वयं संचालन करते हुए विजय श्री से विभूषित हुई थीं। वाराही नारसिंही च भीम भैरव नादिनी कहकर दुर्गाम्बा के रण में इन्हें याद किय गया है।

3. श्वेत वाराह

श्वेत वाराह, वाराह परम्परा का तीसरा अवतार है। इनका प्राकट्य समय 1002 वि0पू0 तथा विमति राजा से युद्ध का काल 8047 वि0पू0 है। श्वेत वाराह अवतार की कथा पुराणों में नहीं मिलती है। यह कथा ब्रजभक्ति महार्णव श्री उद्धवाचार्यदेव के "ब्रज यात्रा" ग्रन्थ में देखने में आयी, तथा पुन: अधिक शोध करने पर यह कथा वाराह पुराण के मथुरा माहात्म्य खंड में अ0 15 पर उपलब्ध हुई है। इतिहास की दृष्टि से यह घटना अति महत्वपूर्ण है। वहाँ लिखा है कि द्रविण देश में सुमति नाम का राजा था। वह अपने पुत्रों को राज्य देकर तीर्थयात्रा को निकला। तीर्थयात्रा के भ्रमण में मार्ग में ही कही उसकी मृत्यु हो गई तब एक दिन महर्षि नारद ने सुमति के पुत्र विमति से जाकर कहा -"पिता का ऋण उतारे वही पुत्र है।" नारद चले गये राजा चिन्ता में पड़ गया। मन्त्रियों से पूछा तब मन्त्रियों ने खोज लगाकर कहा – राजन् आपके पिताजी को तीर्थों ने मारा है सो तींर्थों से बदला लेना चाहिये। राजा सोचने लगा तीर्थ तो अगणित है उन सबसे बदला लेना कैसे सम्भव है। तभी एक मंत्री ने कहा – महाराज सुनते हैं समस्त तीर्थ चार मास मथुरा में निवास करते हैं, उसी अवसर पर मथुरा में उन्हें नष्ट करना चाहिये। राजा को बात समझ आयी और चातुर्मास शेष रहते ही बड़ी सेना ले मथुरा पर चढ आया।

मथुरा में सब तीर्थ थे। अपने विनाश की बात सुन वे घवढ़ाये और सलाह कर उत्तर ध्रुव के बर्फ से ढके श्वेतद्वीप के कलाप या कल्प ग्राम में चले गये। कलाप ग्राम में उन्होंने वहाँ के देवता श्वेत वाराह के दर्शन किये। उनसे रक्षा के हेतु स्तुति की। प्रभु प्रसन्न हो गये और देवों के साथ मथुरा पधारे। वहाँ सुमति से युद्ध कर सैन्य सहित राजा विमति को पराजय किया तथा देवों और माथुर ब्राह्मणों, प्रजाजन को अभय किया। इस युद्ध में उनके खड़्ग (असि) का अग्र भाग टूट गया जिससे उन्होंने एक कुण्ड खोदा जो असिकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्वेत वाराह देव तभी से मथुरावासियों महर्षियों द्वारा पूजित हुए और उनको कल्पस्वामी घोषित किया गया तथा उनका तीर्थ देवस्थल वहाँ बनाया गया।

पुराणों की वंशावली के अनुसार सुमति जैन सम्प्रदाय के सुमतिनाथ तीर्थकर हैं, और वे योगेश्वर ऋषभदेव के पौत्र तथा भरत के पुत्र है। उनका समय शोधित काल गणना से 8118 वि0पू0 है। उत्तरी ध्रूव पर (यूरोप के उत्तर छोर पर) शिव पुत्र स्कन्द देव का स्कैन्डीनेविया (स्कन्द नामि) प्रदेश है, वहाँ श्वेतद्वीप स्वीडेन नार्वे स्विटजर लैंड तथा कलाप ग्राम महर्षि नारदका लापलेण्ड नाम से ज्ञात बर्फीला दुर्गम प्रदेश है। इस कलाप ग्राम की ब्रह्मलोक ध्रूव में स्थित होने की चर्चा उपनिषदों में भी है। ध्रूव को उत्तर ध्रूव प्रदेश तक का भूमण्डल का राज्य प्रभु नारायण ने दिया था। उस प्रभाव से माथुरों के मान्य देवता श्वेत वाराह की प्राचीन और विश्वव्यापी रूप में जानकारी हमैं मिलती है।


भूगोल हमें बताता है कि इस देश के उत्तरी सिरे पर ध्रूव प्रदेश में हिंमनदों के तट पर बर्फ पर बर्फ की कगारों में से एक अति अद् भुद जीव के अस्थिपंजर और दाँत मिलते हैं। ये दांत 5-6 फुट लम्बे और बड़े सुदृढ़ होते हैं जो वहाँ किसी पुराकालिक बन्य पशु का होना सिद्ध करते हैं, वहाँ इन पशुओं को "मैमय" कहते हैं प्राचीन श्वेत वाराह के विशाल आद्य अस्तित्व और उसके पालक श्वेत वाराह जनों का यह एक अति महत्वपूर्ण तथ्य है। यह हमारे प्राचीन इतिहास का सुदूरगामी स्पष्ट कीर्ति ध्वज भी है।

मथुरा के रक्षक आदि सभ्यता के जनक भूमण्डल के उद्धारक इन वाराहों का वर्णन ऋग्वेद 10-99-06 में, तैत्तरीय संहिता 7-1-5-1 में तथा तैत्तरीय ब्राह्मण 7-1-3 में और सभी पुराणों में प्राप्त है। प्रात:संध्या में मृत्तिका धारण मंत्र में इन्हें इन शब्दों स्मरण किया जाता है-

उधृतोकषि बराहेण कृष्णेन शत बाहुना।

मृत्तिका पावनीभूते मां पावय वसुन्धरे।।

अश्वक्रान्ते रथ: क्रान्ते विष्णु क्रान्ते वसुन्धरे।

मृत्तिका हर में पापं यन्मया पूर्व संचितम्।।

ब्रह्म सृष्टि का प्रादुर्भाव

भगवान नील वाराह के द्वारा देवलोक की भूमि का उद्वार होने के बाद इस क्षेत्र में भगवान नारायण का प्रादुर्भाव 13,800 विक्रम सम्वत पूर्व मथुरा मण्डल की इसी भूमि में हुआ। प्रलयकाल का जन उतर जाने के बाद भगवान के प्रयत्नों से अनेक सुगन्धित वन और पुष्कर-पुष्करिणी (पोखरा-पोखरी) सरोवर निर्मित हुए। इन जल सिंचित नीची भूमियों को दहर (डहर) नाम दिया गया। इन दहरों में सिंघाड़े और अनेक जातियों के कमल उत्पन्न होते हैं। ब्रज के हर गाँव में ये डहर हैं। भगवान आदि नारायण का प्रादुर्भाव स्थल यमुना तट के एक बड़े डहर में जिसे अभी भी डहरूआ कहा जाता है उसमें हुआ था। "नारायणस्त्व मेवासीत् दहराक्षे हृदिस्थित:, प्रेरक: प्रेयमाणानां त्वमेव जगदीश्वर:।"

नारायण हृदय वैदिक सूक्त में इसे स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है। भगवान नारायण का आदि नारायण स्थल (गतश्रम नारायण) यमुना के तट पर मथुरा में ही है, तथा यहीं महाबली मधु-कैटभ दानवों का संहार कराकर केषव माधव के साथ प्रभु नारायण श्रान्ति रहित हुये थे, अत: यहीं पर लोक विख्यात विश्रान्त तीर्थ है। मनुजी ने कहा है
"आपो नारा इति प्रोक्ता: आपोवैनर सूनव:" नराणां अयनं यस्मात् तेन नारायण: स्मृत:।"[7]

अर्थात् अपजल की धाराओं को जहाँ नारा कहा जाता था वह जल नर नाम के क्षेत्र के और नरनारायण पर्वत से प्रवाहित होता था। यह जल प्रधान क्षेत्र ही नर जाति का जो आदि मानव की प्राचीन संज्ञा है, उसका अयन (आवास स्थान) होने से इसे नारायण क्षेत्र कहा जाता था। --- नरनारायण पर्वत ब्रज बूढ़े बद्री क्षेत्र में तथा विष्णु परम पद (परमदरौ) एवं महर्षि वेद व्यास की तपस्थली शम्याप्रास (सेऊ) आन्दाद्रि पर्वत (घाटी) आदि बद्री अलक नन्दा, इन्द्रलोक देव-स्वर्ग (इन्द्रौली), इन्द्र क्रीड़ा पर्वत, इन्द्र क्रील (खिसलनीसिल) तथा कामुक धनुष धारण करने वाले देवजनों का स्थान कामु का पर्वत आदि अनेक सत युग के स्थान इस क्षेत्र में हैं। नरलोक के स्थान नमैली, नरूल, नरीसेंमरी आदि इसी देवलोक में हैं। इसी क्षेत्र के सर्वदेव अधीश्वर भगवान नारायण मथुरा पूरी में नित्य निवास करते थे। भागवत के अनुसार "मथुरा भगवान यत्र नित्य संत्रिहितों हरि:" कहकर उन्हीं प्रभु नारायण का भूत भविष्य, वर्तमान तीनों कालों में नित्य-निवास घोषित किया गया है। मथुरा में वे कहाँ सर्वकाल निवास कर सकते थे। यह वाराह पुराण के एक प्रसंग से स्पष्ट होता है-

वराह पुराण के अन्तर्गत मथुरा माहात्म्य खण्ड में यह स्पष्ट किया गया है। एक अवसर पर इसी सतयुग काल में नारायण के वाहन गरूड़देव अपने स्वामी के दर्शनों हेतु बैकुण्ड में गये, उन्होंने वहाँ देखा लक्ष्मीपति भगवान वहाँ नहीं है। वे चिन्ता में पड़ गये और स्वर्ग आदि देवलोकों में प्रभु को खोजते फिरे, किन्तु उन्हें कहीं भी अपने स्वामी के दर्शन नहीं हुए, वे अत्यन्त व्यग्र निराश हो गये तभी उन्हें देवर्षि नारद ने संकेत दिया कि प्रभु को मथुरा में जाकर देखो। गरूड़ बड़े विस्माम भाव से मथुरा में आये और यहाँ खोज दृष्टि से देखने पर उन्हें मथुरा के प्रत्येक माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मण देह के अन्तर्गत सर्वत्र अपने प्रभु नारायण के दर्शन प्राप्त हुए। ज्ञान की इस महती प्रतिष्टा और प्रभु की माथुर ब्राह्मणों पर अहेतुकी स्नेह भावना देख्कर उन्हें यह स्वीकार करना पड़ा कि यह निर्विवाद सत्य है कि मथुरा में मेरे प्रभु अपने प्रिय वेदमूर्ति, तपोरिष्ठ, सदावारी और लोक कल्याण चिन्तक इन माथुर ब्राह्मणों में ही सदा सर्वदा अविछिन्न रूप से निवास करते हैं। तभी उन्होंने मुक्त कण्ठ से कहा
"मथुरा भगवान यत्र नित्यसन्निहितो हरि:।"

इस परम्परा में माथुरा ध्रुव के गुरु नारद जी के भी जो नारायण उपासक थे, गुरुभावी रहे। प्रह्लाद , अम्बरीष, स्वायंभुव मनु, वेदव्यास, इक्ष्वाकु , श्रीलक्ष्मीदेवी सरस्वतीजी, गरूड़देव सुदर्शन परशुराम तथा अन्यान्य नारायण उपासक सम्प्रदायों के वैष्णव श्रीवैष्णव सभी के पूज्य और सम्मानित युग-युग में रहे हैं। वैष्णव आचार्य बल्लभाचार्य ने अपने यमुनाष्टक से माथुरों की माता श्री यमुना महाराणी को ध्रुव पराशराभीष्टदे" स्पष्ट रूप से कहा है।

माथुरों की माता मथुरादेवी

12,900 विक्रम पूर्व में कश्यप सृष्टि से पूर्व माथुर ब्राह्मण अग्निमन्थन विद्या के कारण अग्निदेव के पद पर प्रतिष्ठित होकर सर्वत्र यज्ञ आयोजनों का सम्भार करने के लिये सर्वत्र बड़े मान के साथ बुलाये जाने लगे। ऋग्वेद में अग्नि, सोम, इन्द्र तीन देवताओं के ही सर्वाधिक हज़ारों मंत्र हैं, ऋग्वेद का आरम्भ ही माथुर प्रोहित अग्निदेव को देव ऋन्विज के रूप में आवाहित करने के मंत्र से होता है। माथुर ब्राह्मण अनेक यज्ञों में परिभ्रमण करते रहते थे, उनके अपने घर की व्यवस्था करने वाला कोई न था उनकी इस चिन्ता को अनुभव कर देवलोक से एक देवी उतरीं और माथुरों से कहा- "हे अग्निपुत्रो मैं तुम्हारी अग्नि मंथन विद्या की परम अधिष्ठात्री प्रमाथिनी देवी हूँ। मैं तुम्हारे घरों को सुव्यवस्थित रखने तथा तुम्हारे गार्हपत्य आश्रमों में सदा आनन्दमय वातावरण बनाये रखने के लिये तुम्हारा माता पद धारण करती हूँ। माथुरों ने इसे सहर्ष स्वीकार किया और तभी से प्रभाथिनी माथुरों की माता मथुरा देवी प्रतिष्ठित हुई। आनन्दमयी लक्ष्मी कुल की देवी थीं तथा नृत्य गान से माथुर स्थल को आनन्दमय बनाये रखती थीं। अपनी मूर्ति के रूप मैं वे आज भी कमल धारिणी, कटि हस्तानृत्य मुद्रा में स्थित देखी जा सकती हैं।

देवी भागवत में तथा वायु पुराण [8] मैं इन्हें दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी नामों से सम्बोधित किया गया है। माथुरों की यह देवी नव दुर्गाओं, दस विद्याओं तथा देव मातृकाओं से भी ऊपर पद वाली और प्राचीनतम हैं। अथर्ववेद में इन्हें प्रथम पूजित और महान महिमा वाली जगत जननी कहा गया है। "इयमेव या प्रथमा महान्तो अस्य महिमानो अन्तरवधूजिगाय नवगज्जनित्री" 1 अर्थात यह प्रथम उत्पन्न महा महान अन्तरवर्ति गृहस्वामिनी पद वाली नवपुत्रों की जननी है। ये अग्नि, सोम को वृद्धि देतीं यज्ञ के पक्ष को ऋषि धर्म से स्थापित करती हैं।

सप्तलोकों की स्थापना

इनके समय ही ब्रजलोक में सप्त व्याहृति रूप गायत्री के सात लोकों की स्थापना हुई "तत्र भूरादयो लोका भुवि माथुर मंडलम्,

अत्रै व ब्रजभूमि सा यन् तत्वं सुगोपितम्।

तेनात्रत्रिविद्या लोका स्थिता पूर्वं न संशय।।[9]

अर्थात इस माथुर मण्डल में भू भव स्व मह:जन तप सत्यम् सातदेवलोक प्रतिष्ठित हैं, इसी माथुर मण्डल के अन्तर्गत वह ब्रजभूमि है, जो देवों के गोचारण का क्षेत्र है, तथा जहाँ ब्रह्म का परमगूढ़ तत्व सुरक्षित है। इसी स्थिति के कारण प्राचीन समय से देवों के तीन लोक यहीं स्थिति रहे हैं, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। इसी कारण से महर्षि वेदव्यास ने मथुरा को "आद्य" भगवत स्थानं यत्पुण्यं हरिमेधस: अर्थात मथुरा भगवान का सर्वप्रथम आद्यस्थान है, जो हरिमेधा ऋषि का पुण्य क्षेत्र है तथा "माथुरा परत्मानो मापुरा: परमाशिष:" अर्थात माथुर ब्राह्माण ही परमात्मा हैं और इनका आशीर्वाद ही परम सिद्धिप्रद फल देने वाला है। ऐसा दृढ़ता और विश्वास के साथ प्रतिपादित किया है। गायत्री गोप कन्या का लोक ब्रज का गांठौली बन तथा मार्तण्ड सूर्य का लोक टौड़घनौ वन है।

चतुर्वेदी पद की प्राप्ति

इसी काल में ऋषि-महर्षियों द्वारा वेद मन्त्रों की अनेक विधि रचना हुई। माथुरों ने इसमें बहुत बड़ा भाग लिया। इस समय चारों वेदों के मन्त्र प्रणेता और वेदाधिकारी होने के कारण इन्हें चतुर्वेदी पदवी से विभूषित किया गया 9300 वि. के भगवान विष्णु की नामावली में इन्हें विष्णु रूप मानकर, चतुरात्मा चतुरभाष्य चतुर्वेदी विदेक पात् अर्थात् चारों वेदों की आत्मा चार वेदों के देवभाव के विज्ञाता चारों वेदों की विद्या के ज्ञानाधिकारी चतुर्भुज भगवान का स्वरूप चतुर्वेदी ही है। इस प्रकार माथुरों के गौरव को देवों द्वारा भी सम्पुष्टि मिली है।

स्वायम्भू मनु काल

स्वाम्भू मनु के समय 9,000 वि. पूर्व में मनु का निवास स्थान ब्रह्मर्षि देश रहा, जो मनु की प्रजाओं के क्षेत्र ब्रह्मावर्त से अधिक श्रेष्ठ माना गया है। मनुजी कहते है –

कुरूक्षेत्राश्च मत्स्याश्च पांचाला सूरसैनिका:।

एष ब्रह्मर्षि देशों वै ब्रह्मावर्तानन्तर:।।

एतद्देश प्रसूतस्य सकारा दब्र जन्मन:।

स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन् पृषिव्याम् सर्वमानबा:।।

अर्थात कुरूक्षेत्र मत्स्य (जयपुर, अलवर[10], धौलपुर[11]) पांचाल (पीलीभीत, बरेली[12], कानपुर[13], फ़र्रुख़ाबाद[14]) शूरसैन (मथुरा, बटेश्वर[15], एटा[16]) आदि ये चार प्रदेश ही ब्रह्मर्षि देश हैं जो ब्रह्मावर्त से अलग हैं। इस ब्रह्मर्षि देश में उत्पन्न हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल से सम्पूर्ण भूमण्डल के प्राणी अपने-अपने चरित्रों के निर्माण के लिये शिक्षा ग्रहण करें। इनमें यमुना तट का शूरसैन (सूर्य नारायण की सेनाओं का प्रदेश) देश सबसे अधिक पवित्र और श्रेष्ठतम माना गया है। सूरसैन के प्रधान प्रजाजन माथुर ब्राह्मण ही हैं, ये आज भी भगवान कृष्णकाल के कंस मेला में अपने प्रिय शिष्यों श्रीकृष्ण बलराम और उनके सखाओं को बड़े उत्सव के साथ नगर में लाते हुए 'सूरसैन' का परम्पराबद्ध घोष करते हुए यह सिद्ध करते है कि सूरसैन देश के मनु कालीन ब्रह्मर्षिजन हम ही हैं। भगवान सूर्य के साथ यमुना पुत्र होने के कारण माथुरों का पारिवारिक संबन्ध भी है। तथा बारह सूर्यों की तेजस्वी ब्राह्मण सैना में माथुरों की प्रधानता मनुस्मृति में अन्यत्र भी कही गयी है। "भागवत में माथुरान शोरसेनाना विषयाश्च बुवुजे स्वयं "कहकर माथुरों को ही सूरसेन जन कहा गया है।


यूनानी लेखक मेगास्थनीज ने 26 वि.पू. में भी इन्हें शौर-सेनाई लोग कहा है। अथर्ववेद यमुना सूक्त के कथन से सिद्ध होता है कि मनुकाल के महर्षि वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, दक्ष उशना मृगुवंशी ऋषि तथा पुरंदर इन्द्र वायुदेवता धर्मराज यम आदि भी श्री यमुना के आराधक होने से यमुना पुत्र माथुर ब्राह्मणों के परम भक्त थे। भक्त प्रहलाद, भगवान ब्रह्मा, हिरण्यकशिपु, कविउशना, स्वायंभुव, अम्वरीष श्री राम, शत्रुघ्न, परशुराम, सभी यमुना और माथुरों के पूजक थे।

वैवस्वत मनु के पुत्र नृगराज का मथुरा में राज्य था तथा नृग ने यमुना के नृगाह्वाय तीर्थ पर अनंतकोटि (अनगिनती) गौऐ दान की। इस गौदान में नारद जी (नारद टीला) और पर्वतवन (पहाड़ी कामां) पर्वत ऋषि में झगड़ा हुआ और उनके शाप से नृग राजा को कृकलाश (गिरगिटा) योनि में गिरना पड़ा। कृकलश श्वभ्र की गुफ़ा यमुना तट पर ही है इसमें ऋषि वशिष्ठजी नायकील महात्मा निवास करते रहे। मनु कालीन ब्रह्मर्षिजन हम हैं। भगवान सूर्य के साथ यमुना पुत्र होने के कारण माथुरों का पारिवारिक सम्बन्ध भी हैं। तथा बारह सूर्यों की तेजस्वी सैना में माथुरों की प्रधानता मनुस्मृति में अन्यत्र भी कही गई है। "भागवत में माथुरान शूरसेनानां विषयांश्च वुभुजे स्वयं" कहकर माथुरों को ही स्वायं भू मनु वंश।


स्वायं भू मनु का निवास आश्रम मथुरा पुरी में था यह निश्चित सत्य है। इनका आश्रम सरस्वती नदी के तट शपर बिन्दु सरोवर के निकट कालिंदी यमुना और सरस्वती के संगम स्थल पर भगवान वामन प्रभु के आश्रम के समीप ही था। मथुरा में यह स्थान आवरीष टीले के निकट अभी भी है। यहाँ पुष्कर[17] से आई आदि सरस्वती ब्रह्म सरस्वती (या नन्दा सरस्वती) यमुना के साथ संगम करती है। यहीं एक बड़े मैदान में दो बिन्दु कूपों के समीप बिंदु सरोवर का स्थल हैं। इसके समीप ही अंगिरा ऋषियों का आंगरष तीर्थ, किरीटी विष्णु का कीरीटी तीर्थ, नाभाग अम्बरीष का नारायण देवालय तथा राजधानी टीला, महर्षि वेदव्यास का कृष्ण गंगा आश्रम, बृहस्पति पुत्र उपमन्यु ऋषि का सोम तीर्थ, भगवती योग माया लक्ष्मी का माया तीर्थ दुर्वासा मुनि का चक्रभय से पलायन का चक्र तीर्थ तथा यमुना के पार दुर्वासा आश्रम वृहदवन आदि त्नेता कालीन सभी ऐतिहासिक स्थलों की भूमियाँ अभी भी हैं।


स्वायं भू मनु के दो पुत्र थे। इनमें ज्येष्ठ उत्तान पाद तथा छोटे प्रियव्रत थे। मनुजी ने उत्तानपाद को सूरसैन मत्स्य और कुरु क्षेत्र का राज्य दिया। प्रियव्रत को बहुत बड़े राज्य पांचाल का राज्य दिया। प्रियव्रत ने अपने पुरूषार्थ से समस्त भूमण्डल को आधीन कर सुमेरू पर्वत के चारों तरफ सात समुद्र और सातद्वीपों की स्थापना की। उत्तानवाद को ब्रह्माषि देश का प्रमुख भाग मिला तथा यहाँ के माथुर ब्रह्मर्षियों के आदर्श वातावरण के कारण उन्हें भक्त ध्रुवनाम का भगवद् भक्त पुत्र प्राप्त हुआ। ध्रुव ने मथुरा निवासी नारद टीला आश्रम के निवासी महात्मा नारद से मन्त्र उपदेभ्र पाकर मधुवन में तप करके भगवत कृपा की प्राप्ति की। ध्रुव की कथाभागवत तथा अन्य पुराणों में बहुत विस्तार से है, तथा तपस्या से पूर्व और तपस्या के पश्चात भक्त ध्रुव अपने पितामह की राजधानी मथुरा में ही निवास करते थे। मथुरा में ध्रुव तीर्थ (आदि गया) तथा ध्रुवपुर (धौरैरा) अटलवन ध्रुव की स्थिति के प्रवल साक्षी हैं।

आदि मनु की प्रधान पीठ होने के कारण उनके बाद के सभी मनुओं का मन्वन्तर अभिशेक मथुरा में ही होता रहा। ये सभी सात ऋषि वशंज माथुर ब्राह्मणों के परम भक्त थे।

वैवस्वत मनु

मथुरा में स्वायं भू मनु के बाद सातवें मनु वैवस्वत मनु की धार्मिक राजधानी भी रही। वैवस्वत मनु का काल 6379 वि. पू. है। इसी समय 6304 वि. पूर्व में राजर्षी नाभाग के नभग वंश का राज रहा। 6,173 वि. पूर्व में नाभाग अम्बरीष तथा इसी समय महाराज नृग भी मथुरा में शासन करते रहे। अम्बरीष के वंश में अगिराओं से उत्पन्न पुत्र रथीतर लोग जो आंगिरस ब्राह्मण थे यहीं तप करते थे। रथीतर वेद मन्त्र कर्ता ऋषि हैं जिनका समय 5967 वि. पूर्व है।

मथुरा में ही प्रह्लाद के पौत्र राजा वलि ने अपना सौवाँ यज्ञ सप्तर्षियों के समीप बलि टीले पर किया था, जो उस समय के मधुवन का ही एक भाग था भगवान वामन का समय 9536 वि. पूर्व है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भारत को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  2. मध्य प्रदेश को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  3. अजन्ता को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  4. एलोरा को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  5. नेपाल को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  6. पुष्कर को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  7. मनुस्मृति 1-10
  8. वायु पुराण 9-88
  9. भागवत माहात्म्य स्कंध 1-26
  10. अलवर को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  11. धौलपुर को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  12. बरेली को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  13. कानपुर को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  14. फ़र्रुख़ाबाद को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  15. बटेश्वर को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  16. एटा को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
  17. पुष्कर को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।
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