सुवर्णसप्तति शास्त्र

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सुवर्णसप्तति शास्त्र

सुवर्णसप्तति शास्त्र बौद्ध भिक्षु परमार्थ द्वारा 550 ई.-569 ई. के मध्य चीनी भाषा में अनुवादित सांख्यकारिका का भाष्य है। किस भाष्य का यह चीनी अनुवाद है- इस पर कुछ विवाद है। आचार्य उदयवीर शास्त्री के अनुसार यह 'माठरवृत्ति' के नाम से उपलब्ध टीका का अनुवाद है। इस मत का आधार चीनी भाषा में उपलब्ध ग्रन्थ तथा माठरवृत्ति में आश्चर्यजनक समानता है।

  1. त्रयोदशविधकरणै: सूक्ष्मशरीरं संसारयति
  2. तस्मात् सूक्ष्मशरीरं विहाय, त्रयोदशकं न स्थातुं क्षमते॥
  3. इदं सूक्ष्मशरीरं त्रयोदशकेन सह ... संसरति
  4. पंचतन्मात्ररूपं सूक्ष्मशरीरं त्रयोदशविधकरणैर्युक्त-त्रिविधलोकसर्गान् संसरति।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सां.द.इ. पृष्ठ 391
  2. टीकाकार का यह मन्तव्य स्वयं उदयवीर शास्त्री द्वारा प्रस्तुत उद्धरण में भी स्पष्ट हो जाता है- 'तत्सूक्ष्मशरीरमेकादशेन्द्रियसंयुक्तं' में एकादशेन्द्रिय का सूक्ष्म शरीर से पृथक् निर्देश टीकाकार के इस आग्रह की पुष्टि करता है कि सूक्ष्म शरीर सात तत्त्वों का है। सूक्ष्म शब्द यहाँ शरीर नाम का नहीं अपितु सूक्ष्मता का बोधक है।

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