जाबाल्युपनिषद

ब्रज डिस्कवरी, एक मुक्त ज्ञानकोष से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

<sidebar>

  • सुस्वागतम्
    • mainpage|मुखपृष्ठ
    • ब्लॉग-चिट्ठा-चौपाल|ब्लॉग-चौपाल
      विशेष:Contact|संपर्क
    • समस्त श्रेणियाँ|समस्त श्रेणियाँ
  • SEARCH
  • LANGUAGES

__NORICHEDITOR__

  • सामवेदीय उपनिषद
    • आरूणकोपनिषद|आरूणकोपनिषद
    • केनोपनिषद|केनोपनिषद
    • कुण्डिकोपनिषद|कुण्डिकोपनिषद
    • छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्य उपनिषद
    • जाबाल्युपनिषद|जाबाल्युपनिषद
    • जाबालदर्शनोपनिषद|जाबालदर्शनोपनिषद
    • महोपनिषद|महोपनिषद
    • मैत्रेय्युग्पनिषद|मैत्रेय्युग्पनिषद
    • योगचूडाण्युपनिषद|योगचूडाण्युपनिषद
    • रूद्राक्षजाबालोपनिषद|रूद्राक्षजाबालोपनिषद
    • वज्रसूचिकोपनिषद|वज्रसूचिकोपनिषद
    • संन्यासोपनिषद|संन्यासोपनिषद
    • सावित्र्युपनिषद|सावित्र्युपनिषद

</sidebar>

जाबाल्युपनिषद

पशुपति ब्रह्म क्या है?

  • सामवेद से सम्बन्धित इस उपनिषद में मात्र तेईस मन्त्र हैं इसमें पिप्लाद के पुत्र पैप्पलादि और भगवान जाबालि के मध्य 'परमतत्त्व' से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर हैं।
  • इसमें जिन प्रश्नों को पूछा गया है, उनमें प्रमुख प्रश्न हैं-'यह परमतत्त्व क्या है, जीव क्या है, पशु कौन है, ईश कौन है तथा मोक्ष-प्राप्ति का उपाय क्या है?'
  • जाबालि ने साधना द्वारा जिस ज्ञान को प्राप्त किया था, उसे बताते हुए उन्होंने कहा-'हे पिप्पलाद! स्वयं पशुपति ही अहंकार से ग्रस्त होकर जीव बन जाता है। वह पशु के समान हो जाता है। सर्वज्ञ और पंचतत्त्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। वही 'ब्रह्म' है, वही 'परमतत्त्व' है।'
  • यह उपनिषद शैव मत से सम्बन्धित है; क्योंकि शिव को ही पशुपति कहा गया है। शैव मतावलम्बियों द्वारा मस्तक पर त्रिपुण्ड्र धारण कर ओंकार की साधना से 'पशुपति ब्रह्म' को प्राप्त किया जा सकता है।


सम्बंधित लिंक