ग्रहण

ब्रज डिस्कवरी, एक मुक्त ज्ञानकोष से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज

ग्रहण / Grahan

विषय सूची

प्राचीन कालों से सूर्य-चन्द्र-ग्रहणों को महत्त्व दिया जाता रहा है। ग्रहण के सम्बन्ध में विशाल साहित्य का निर्माण हो चुका है। सम्बन्धित ग्रंथ हैं-

  1. हेमाद्रि
  2. कालविवेक
  3. कृत्यरत्नाकर
  4. कालनिर्णय
  5. वर्षक्रियाकौमुदी
  6. तिथितत्त्व
  7. कृत्यतत्त्व
  8. निर्णयसिन्धु
  9. स्मृतिकौस्तुभ
  10. धर्मसिन्धु
  11. गदाधरपद्धति [1]

सूर्य और चन्द्र्ग्रहण

ग्रहण के समय श्राद्ध

ग्रहण के समय श्राद्ध-कर्म करना दो कारणों से कठिन है-

  1. अधिकांश में ग्रहण अल्पावधि के होते हैं,
  2. दूसरे, ग्रहण के समय भोजन करना वर्जित है। ग्रहण के समय भोजन करने से प्राजापत्य प्रायश्चित्त करना पड़ता है। इसी से कुछ स्मृतियों एवं निबन्धों में ऐसा आया है कि श्राद्ध आम-श्राद्ध या हेम-श्राद्ध होना चाहिए। ग्रहण के समय श्राद्ध करने से बड़ा फल मिलता है, किन्तु उस समय भोजन करने पर प्रायश्चित्त करना पड़ता है और व्यक्ति अन्य लोगों की दृष्टि में गिर जाता है।

ग्रहण का विधान

ग्रहण पर कृत्यों के क्रम यों हैं-

  1. गंगा या किसी अन्य जल में स्नान,
  2. प्राणायाम,
  3. तर्पण,
  4. गायत्रीजप,
  5. अग्नि में तिल एवं व्याहृतियों तथा ग्रहों के लिए व्यवस्थित मन्त्रों के साथ होम*, इसके उपरान्त
  6. आम-श्राद्ध, सोना, गायों एवं भूमि के दान। आजकल अधिकांश लोग ग्रहण के समय स्नान करते हैं और कुछ दान भी करते हैं किन्तु ग्रहण-सम्बन्धी अन्य कृत्य नहीं करते। ग्रहण-काल जप, दीक्षा, मन्त्र-साधना (विभिन्न देवों के निमित्त) के लिए उत्तम काल है।* जब तक ग्रहण आँखों से दिखाई देता है तब तक की अवधि पुण्यकाल कही जाती है।

विभिन्न मत

ग्रहण के फल

ग्रहणों से उत्पन्न बहुत से फलों की चर्चा हुई है। दो-एक उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं। विष्णुधर्मोत्तर* में आया है- 'यदि एक ही मास में पहले चन्द्र और उपरान्त सूर्य के ग्रहण हों तो इस घटना के फलस्वरूप ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों में झगड़े या विरोध उत्पन्न होंगे, किन्तु यदि इसका उलटा हो तो समृद्धि की वृद्धि होती है। [11]। उसी पुराण में यह भी आया है- 'उस नक्षत्र में, जिसमें सूर्य या चन्द्र का ग्रहण होता है, उत्पन्न व्यक्ति दु:ख पाते हैं, किन्तु इन दु:खों का मार्जन शान्ति कृत्यों से हो सकता है।' इस विषय में अत्रि की उक्ति है- 'यदि किसी व्यक्ति के जन्म-दिन के नक्षत्र में चन्द्र एवं सूर्य का ग्रहण हो तो उस व्यक्ति को व्याधि, प्रवास, मृत्यु एवं राजा से भय होता है। [12]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हेमाद्रि (काल, पृ0 379-394), कालविवेक (पृ0 521-543), कृत्यरत्नाकर (पृ0 625-631), कालनिर्णय (पृ0 346-358), वर्षक्रियाकौमुदी (पृ0 90-117), तिथितत्त्व (पृ0 150-162), कृत्यतत्त्व (पृ0 432-434), निर्णयसिन्धु (पृ0 61-76), स्मृतिकौस्तुभ (पृ0 69-80), धर्मसिन्धु (पृ0 32-34), गदाधरपद्धति (कालासार, पृ0 588-599)
  2. भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दु:।... इत्युपरागकारणमुक्तमिदं दिव्यदृग्भिराचार्वै:। राहुरकारणमस्मित्रियुक्त: शास्त्रसद्भाव:॥ बृहत्संहिता (5।8 एवं 13)
  3. इन्दोर्लक्षगुणं प्रोक्तं रवेर्दशगुणं स्मृतम्। गंगातोये तु सम्प्राप्ते इन्दो: कोटी रवेर्दश॥ हेमाद्रि (काल, पृ0 384), कालविवेक (पृ0 521) एवं निर्णयसिन्धु (पृ0 64)।
  4. सर्व गंगासमं तोयं सर्वे व्याससमा द्विजा:। सर्व मेरूसमं दानं ग्रहणे सूर्यचन्द्रयो:॥ भुजबल (पृ0 348); वर्षक्रियाकौमुदी (पृ0 111); कालनिर्णय (पृ0 348); स0 म0 (पृ0 130)। गोदावरी भीमरथी तुंगभद्रा च वेणिका। तापी पयोष्णी विन्ध्यस्य दक्षिणे तु प्रकीर्तिता:॥ भागीरथी नर्मदा च यमुना च सरस्वती। विशोका च वितस्ता च हिमवत्पर्वताश्रिता:॥ एता नद्य: पुष्यतमा देवतीर्थान्युदाहृता:। ब्रह्मपुराण (70।33-34)
  5. देखिए इण्डियन ऐण्टीक्वेरी, 6, पृ0 72-75; एपिग्रैफिया इण्डिका, 3, पृ0 1-7; एपिग्रैफिया इण्डिका, 3, पृ0 103-110 ; एपिग्रैफिया इण्डिका, 7, पृ0 202-208; एपिग्रैफिया इण्डिका, 9, पृ0 97-102; एपिग्रैफिया इण्डिका, 14, पृ0 156-163 आदि-आदि)
  6. लक्ष्मीधर कृत कृत्यकल्पतरू, नैयत, पृ0 368; हेमाद्रि, काल, 388; कृत्यरत्नाकर, पृ0 625; स्मृतिकौस्तुभ, पृ0 69)
  7. स्नानं दानं तप: श्राद्धमनन्तं राहुदर्शने। आसुरी रात्रिरन्यत्र तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ (हेमाद्रि, काल, पृ0 387; कालविवेक, पृ0 527; स्मृतिकौस्तुभ, पृ0 71)। संकान्तौ पुण्यकालस्तु षोडशोभयत: कला:। चन्द्रसूर्योपरागे तु यावद्दर्शनगोचर:॥ जाबालि (लक्ष्मीधर कृत कृत्यकल्पत, नैयत, पृ0 368; हेमाद्रि, काल, पृ0 388; कृत्यरत्नाकर, पृ0 624; स्मृतिकौस्तुभ, पृ0 69)
  8. कालविवेक, पृ0 523; कालनिर्णय , पृ0 351; तिथितत्त्व, पृ0 154; स्मृतिकौस्तुभ, 70, व्यास से उद्धृत)
  9. चन्द्रार्कोपरागे नाश्नीयादविमुक्तयोरस्तंगतयोर्दृष्ट्वा स्नात्वा परेऽहनि। विष्णुधर्मसूत्र (68। 1-3); हेमाद्रि, काल, पृ0 396; कालविवेक, पृ0 537; कृत्यरत्नाकर, पृ0 626; वर्षक्रियाकौमुदी, पृ0 102; नाद्यात्सूर्यग्रहात्पूर्वमह्नि सायं शशिग्रहात्। ग्रहकाले च नाश्नीयात्स्नात्वाश्नीयाच्च विमुक्तयों:॥ मुक्ते शशिनि भुंजीत यदि स्यात्र महानिशा। स्नात्वा दृष्ट्वापरेऽह्वचद्याद् ग्रस्तास्तमितयोस्तयो:॥ उद्धत- कृत्यकल्पतरू (नैयत0, पृ0 309-310); कालविवेक (पृ0 537); हेमाद्रि(काल, पृ0 370); कृत्यरत्नाकर (पृ0 626-627); वर्षक्रियाकौमुदी (पृ0 104)
  10. वृद्धगौतम:। सूर्यग्रहे तु नाश्नीयात् पूर्व यामचतुष्टयम्। चन्द्रग्रहे तु यामांस्त्रीन् बालवृद्धातुरैर्विना॥ हेमाद्रि, काल, पृ0 381; स्मृतिकौस्तुभ, पृ0 76
  11. 'एकस्मिन्यदि मासे स्याद् ग्रहणं चन्द्रसूर्ययो:। ब्रह्मक्षत्रविरोधाय विपरीते विवृद्धये॥ विष्णुधर्मोतर (1।85।56) 'यन्नक्षत्रगतौ राहुर्ग्रसते चन्द्रभास्करौ। तज्जातानां भवेत्पीडा ये नरा: शान्तिवर्जिता:॥' वही, (1।85।33-34)
  12. 'आह चात्रि:। यस्य स्वजन्मनक्षत्रे ग्रस्येते शशिभास्करौ। व्याधिं प्रवासं मृत्युं च राज्ञश्चैव महद्भयम्॥ कालविवेक (पृ0 543), हेमाद्रि (काल0 पृ0 392-393)

सम्बंधित लिंक

निजी टूल
नामस्थान
संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
टूलबॉक्स