जाट-मराठा काल

Nayati
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जाट−मराठा काल / Jat - Maratha

(सन 1748 से सन 1826 तक)

जाट−मराठा शक्तियाँ

विषय सूची

मुग़ल सल्तनत के आख़री समय में जो शक्तियाँ उभरी; जिन्होंने ब्रज मंडल के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उन जाट और मराठा सरदारों के नाम इतिहास में बहुत मशहूर हैं। जाटों का इतिहास पुराना है। जाट मुख्यतः खेती करने वाली जाति है; लेकिन औरंगज़ेब के अत्याचारों और निरंकुश प्रवृति ने उन्हें एक बड़ी सैन्य शक्ति का रूप दे दिया। उधर मराठों ने छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में औरगंज़ब को भीषण चुनौती दी और सफलता भी प्राप्त की जिससे मराठा भी उत्तर भारत में मशहूर हुए। कुछ समय के बाद पेशवाओं और उनके सैनिक सरदारों इतने शक्तिशाली हो गये कि उन्हें पूरे भारत में जाना जाने लगा। मुग़लिया सल्तनत के अन्त से अंगेज़ों के शासन तक ब्रज मंडल में जाटों और मराठाओं का प्रभुत्व रहा । इन्होंने ब्रज के राजनैतिक और सामाजिक जीवन को बहुत प्रभावित किया। यह समय ब्रज के इतिहास में 'जाट−मराठा काल' के नाम से जाना जाता है । इस काल का विशेष महत्व है ।

राजनीति में जाटों का प्रभाव

ब्रज की समकालीन राजनीति में जाट शक्तिशाली बन कर उभरे । जाट नेताओं ने इस समय में ब्रज में अनेक जगहों पर, जैसे सिनसिनी, डीग, भरतपुर, मुरसान और हाथरस जैसे कई राज्यों को स्थापित किया । इन राजाओं में डीग−भरतपुर के राजा महत्वपूर्ण हैं । इन राजाओं ने ब्रज का गौरव बढ़ाया, इन्हें 'ब्रजेन्द्र' अथवा 'ब्रजराज' भी कहा गया । ब्रज के इतिहास में कृष्ण के पश्चात जिन कुछ हिन्दू राजाओं ने शासन किया , उनमें डीग और भरतपुर के राजा विशेष थे । इन राजाओं ने लगभग सौ सालों तक ब्रजमंडल के एक बड़े भाग पर राज्य किया । इन जाट शासकों में महाराजा सूरजमल (शासनकाल सन् 1755 से सन् 1763 तक )और उनके पुत्र जवाहर सिंह (शासन काल सन् 1763 से सन् 1768 तक ) ब्रज के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध हैं ।

जाटों के क्रियाकलाप

जाट राजाओं ने ब्रज में हिन्दू शासन को स्थापित किया । इनकी राजधानी पहले डीग थी, फिर भरतपुर बनायी गयी । महाराजा सूरजमल और उनके बेटे जवाहर सिंह के समय में जाट राज्य बहुत फैला, लेकिन धीरे धीरे वह घटता गया । भरतपुर, मथुरा और उसके आसपास अंगेज़ों के शासन से पहले जाट बहुत प्रभावशाली थे और अपने राज्य के सम्पन्न स्वामी थे । वे कर और लगान वसूलते थे और अपने सिक्के चलाते थे । उनकी टकसाल डीग, भरतपुर, मथुरा और वृन्दावन के अतिरिक्त आगरा और इटावा में भी थीं । जाट राजाओं के सिक्के अंगेज़ों के शासन काल में भी भरतपुर राज्य के अलावा मथुरा मंडल में प्रचलित थे ।

जाट राज्य की नींव

मुग़लों के आख़री समय में जाट सरकारी ख़ज़ाना और शस्त्रों का भंडार लूट लेते थे । जाटों के नेताओं में नंदराम, गोकुल सिंह और राजाराम विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं । राजाराम के कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ।

राजाराम का विद्रोह

सन् 1685 में जाटों की बग़ावत का नायक 'सिनसिनी' का राजाराम था । सिनसिनी ब्रज में एक छोटी सी ग्रामीण बस्ती थी, जो डीग से दक्षिण में और भरतपुर से 13 मील उत्तर पश्चिम में आज भी है । वहाँ जाटों की 'गढ़ी' नाम से एक सैनिक छावनी थी । यह गढ़ी भरतपुर के जाट राजाओं के पूर्वजों की थी । इस राजघराने को 'सिनसिनी वार' के नाम से जाना जाता है । राजाराम की गतिविधियाँ सिनसिनी से धौलपुर और मथुरा से आमेर राज्य थी । इन जगहों पर मुग़ल प्रभावशाली नहीं थे । यहाँ जाटों के दल लूटमार करते थे । औरंगज़ेब इस समय दक्षिण के युद्ध में व्यस्त था । वह जाटों की गतिविधियों से बहुत परेशान था । वह इस विद्रोह को ख़त्म करने की आज्ञा देता था ; किंतु उसके सेनानायक नाक़ाम रहे ।

चूड़ामन का संगठन

चूड़ामन, जो नेतृत्व में बहुत ही कुशल था, राजाराम के बाद जाटों का नेता बना । उसने जाटों को संगठित किया और जाट राज्य की नींव डाली । इसका फ़ायदा बदनसिंह नामक जाट सरदार को हुआ, जिसने पूरी तरह से जाट राज्य को स्थापित किया ।

जाट राज्य के संस्थापक बदन सिंह

चूड़ामन के भतीजे का नाम बदन सिंह था । आपसी कलह की वजह से उसे जेल में डाल दिया था । तभी मुग़ल शासक मुहम्मदशाह ने आमेर के सवाई राजा जयसिंह को आगरा का सूबेदार बनाकर जाटों की बग़ावत पर काबू करने का हुक्म दिया । सवाई राजा जयसिंह ने जाटों के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी । इसी समय बदनसिंह जेल से निकल कर भाग गया । बदन सिंह राजा जयसिंह से मिला । उसने जयसिंह से संधि की । इसके बाद सन् 1719 में बदन सिंह को सर्वसम्मति से नेता मान लिया गया । बदनसिंह में कुशल नेतृत्व और राजप्रबन्ध के सभी गुण थे । वह वीर, कुशल सेनापति और व्यवहार कुशल राजनीतिज्ञ और योग्य शासक था । उसने थूण और सिनसिनी के पुराने क़िलों को छोड़ सारा ध्यान डीग और कुम्हेर के जाट बहुल क्षेत्र पर लगाकर अपने अधिकार में ले लिया और मज़बूत क़िलों को निर्मित किया । जनता उसे ठाकुर कहने लगी । बदनसिंह ने सन् 1719−1723 तक शासन की नींव रख डीग को अपनी राजधानी बनाया । उसने मुग़ल शासक मुहम्मदशाह और उसके सबसे प्रभावशाली नायक जयसिंह से बहुत ही अच्छे संबंध बनाये और अपने राज्य को सुरक्षित कर लिया । बदनसिंह ने सन् 1719 से सन् 1755 तक 33 वर्षों तक राज्य किया । इसके बाद उसने अपने बड़े बेटे सूरजमल( सुजानसिंह )को सत्ता सौंप दी और छोटे बेटे प्रतापसिंह को वयर का क़िला और जागीर दी । बदनसिंह ने अपना आख़री समय ब्रज के 'सहार' में साहित्यक परिचर्चा और काव्य रचना करते हुए बिताया । बदनसिंह योग्य प्रशासक होने के साथ ही साहित्य और कला का प्रेमी था । उसने कला और साहित्य को प्रोत्साहित किया । उसके राज्य में कवियों को शासन की ओर से आश्रय प्राप्त था । उसके द्वारा रचित कुछ छंद प्राप्य हैं । उसका निधन सन् 1755 की ज्येष्ठ शु. 10 को हो गया था । उसके बाद उसका बड़ा बेटा सूरजमल जाटों का शासक बना ।

राजा सूरजमल (सन् 1755−1763 )

राजा सूरजमल सुयोग्य शासक था । उसने ब्रज में एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य को बना इतिहास में गौरव प्राप्त किया । उसके शासन का समय सन् 1755 से सन् 1763 है । वह सन् 1755 से कई साल पहले से अपने पिता बदनसिंह के शासन के समय से ही वह राजकार्य सम्भालता था । राजा सूरजमल के दरबारी कवि 'सूदन' ने राजा की तारीफ़ में 'सुजानचरित्र' नामक ग्रंथ लिखा । इस ग्रंथ में सूदन ने राजा सूरजमल द्वारा लड़ी लड़ाइयों का आँखों देखा वर्णन किया है । इस ग्रन्थ में सन् 1745 से सन् 1753 तक के समय में लड़ी गयी लड़ाईयों (7 युद्धों )का वर्णन है । इन लड़ाइयों में सूदन ने भी भाग लिया था, इसलिए उसका वर्णन विश्वसनीय कहा जा सकता है । इस ग्रंथ में आमेर के राजा जयसिंह के निधन के बाद उसके बड़े बेटे ईश्वरीसिंह का मराठों के ख़िलाफ़़ लड़ा गया सन् 1747 का युद्ध, आगरा और अजमेर के सूबेदार सलावत खाँ से लड़ा गया सन् 1748 का युद्ध और सन् 1753 की दिल्ली की लूट का वर्णन उल्लेखनीय है। इस ग्रंथ में सूरजमल की सन् 1753 के बाद की घटनाओं का वर्णन नहीं है । राजकवि सूदन का निधन सम्भवतः सन् 1753 के लगभग ही हो गया होगा । सम्भवतः इसी से बाद में लड़ी लड़ाइयों का विवरण नहीं मिलता है । इस पुस्तक में दिल्ली की लूट का विवरण महत्वपूर्ण है ।

सूरजमल का मूल्यांकन

ब्रज के जाट राजाओं में सूरजमल सबसे प्रसिद्ध शासक, कुशल सेनानी, साहसी योद्धा और सफल राजनीतिज्ञ था । उसने जाटों में सब से पहले राजा की पदवी धारण की थी; और एक शक्तिशाली हिन्दू राज्य का संचालन किया था । उसका राज्य विस्तृत था, जिसमें डीग−भरतपुर के अतिरिक्त मथुरा, आगरा, धौलपुर, हाथरस, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, गुडगाँव, रोहतक, रेवाड़ी, फर्रूखनगर और मेरठ के ज़िले थे। एक ओर यमुना में गंगा तक और दूसरी ओर चंबल तक का सारा प्रदेश उसके राज्य में सम्मिलित था । सूरजमल की सेना विशाल थी । उसमें 60 हाथी, 500 घोड़े, 1500 अश्वारोही, 25000 पैदल और 300 तोपें थीं । अपनी मृत्यु के समय उसने लगभग 10 करोड़ रुपया राजकोश में छोड़ा था ।*
सूरजमल ब्रजभाषा साहित्य का प्रेमी और कवियों का आश्रयदाता था । उसके दरबार में अनेक कवि थे, जिनमें सूदन कवि का नाम प्रसिद्ध था । सूरजमल की कई रानियाँ थी; जिनमें किशोरी और हंसा प्रमुख थीं । उसके 5 पुत्र थे, जिनके नाम निन्नांकित हैं −जवाहर सिंह, रतन सिंह, नवल सिंह, रणजीत सिंह और नाहर सिंह । सूरजमल के बाद जवाहर सिंह जाटों का राजा हुआ । जाटों की आरंभिक राजधानी डीग थी ; किंतु सूरजमल ने भरतपुर के कच्चे किले को पक्का बना कर वहाँ अपनी राजधानी बनाई थी ।

जवाहर सिंह (शासन सं. 1820 से सं. 1825)

वह जाट राजा सूरजमल का प्रतापी ज्येष्ठ पुत्र था। वह अपने बाबा−दादा के सद्श्य वीर और साहसी था ; लेकिन वह उनके समान नीति−निपुण एवं विनम्र नहीं था । उसके उद्धत स्वभाव और उग्र व्यवहार से पिता सूरजमल उससे अप्रसन्न रहता था । प्रमुख जाट सरदार भी उससे असंतुष्ट रहते थे, किंतु उसकी वीरता के सभी प्रशंसक थे । सूरजमल की मृत्यु के पश्चात जब जवाहर सिंह जाटों का राजा हो गया, तब सभी जाट सरदार उसके साथ हो गये ।

पुष्कर−यात्रा और मृत्यु

जवाहर सिंह राजपूत राजाओं पर अपना रौब जमाना चाहता था । उसने जाटों की सेना के साथ पुष्कर−यात्रा के लिए प्रस्थान किया । जयपुर के राजा माधवसिंह को सूचना दिये बगैर राज्य की सीमा से होकर जाटों की पताका फहराता वह पुष्कर पहुँच गया । जयपुर की सेना का उसे रोकने का साहस नहीं हुआ; जब वह वहाँ से वापिस लौटा तब दोनों सेनाओं में युद्ध छिड़ गया । जवाहर सिंह अपनी सेना के साथ राजपूतों से वीरतापूर्वक लड़ता हुआ जयपुर की सीमा पार कर सकुशल आगरा आ गया; किंतु उसे बड़ी हानि उठानी पड़ी । इस युद्ध में राजपूतों के साथ जाटों के भी अनेक योद्धा मारे गये । तबसे जयपुर नरेश और जवाहरसिंह में कटुता और विद्वेष की वृद्धि होती रही, जिससे दोनों की शक्ति क्षीण हुई । सं. 1825 में आगरा में किसी अज्ञात सैनिक ने जवाहरसिंह का धोखे से वध कर दिया । कहा जाता है, वह एक गुप्त षड़्यंत्र था, जिसमें जयपुर नरेश का हाथ था ।

जवाहरसिंह का मूल्यांकन

जवाहरसिंह सं. 1820 से सं. 1825 तक के वर्षों तक ही भरतपुर की राजगद्दी पर रहा ; उसी समय में वह अपने अद्भुत साहस और अनुपम शौर्य से अपना नाम अमर कर गया और जाट राज्य के गौरव को भी चरम सीमा पर पहुँचा दिया था । जाट राजवंश में चूड़ामन से लेकर अब तक जो वीर पुरुष हुए थे, उनमें जवाहरसिंह किसी से कम नहीं था । यदि वीरता और साहस के साथ उसमें गंभीरता, नीतिज्ञता और व्यवहार−कुशलता भी होती तो वह ब्रज के इतिहास को एक नया मोड़ दे सकता था । किंतु उसने अपनी शक्ति को व्यर्थ के युद्धों में नष्ट कर दिया, इस कारण उसके बाद ही जाट राज्य का महत्व कम होने लगा । जवाहरसिंह साहसी योद्धा होने के साथ ही साथ साहित्य और कला का प्रेमी तथा प्रोत्साहनकर्त्ता भी था । उसके आश्रित कवियों में भूधर, रंगलाल और मोतीराम के नाम उल्लेखनीय हैं । ब्रजभाषा का विख्यात महाकवि देव अपनी वृद्धावस्था में उसके दरबार में उपस्थित हुआ था ।

जाट राज्य का ह्रास (सं. 1825 − सं. 1883)

जवाहरसिंह तक जाट राज्य की निरंतर उन्नति होती रही थी । उसके बाद उसका ह्रास आरंभ हुआ । जवाहरसिंह की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई रत्नसिंह जाटों का राजा हुआ था । वह थोड़े समय तक ही राजगद्दी पर रह सका । राजा बनने के कुछ समय बाद वह वृन्दावन गया और वहाँ रासलीला में लीन हो गया । वहाँ के गोसाई रूपानंद नाम के मायावी तांत्रिक ने अद्भुत चमत्कार दिखाकर भुलावे में डाल कर सं. 1826 वि. में मार डाला । उसकी मृत्यु भी संभवत: उसी षड्यंत्र का परिणाम थी, जिसका शिकार उसका बड़ा भाई जवाहरसिंह हुआ था ।

केहरी सिंह (शासन सं. 1826−सं. 1834)

वह रत्नसिंह के बाद जाटों का राजा हुआ था । उस समय वह कम आयु का बालक था । उसका संरक्षक होने के लिए उसके दोनों चाचा नवल सिंह और रणवीर सिंह में प्रतिद्वंद्विता होने लगी, जिससे जाट सरदार दो गुटों में बँट गये । इस गृह−कलह से जाट राज्य की बड़ी हानि हुई । उसके कुछ समय बाद जाट−मुग़ल संघर्ष छिड़ गया ।

जाट−मुग़ल संघर्ष

जाटों के गृह−कलह का लाभ मुग़ल सम्राट शाहआलम की ओर से वज़ीर मिर्जा नजफ़ख़ाँ ने उठाया । उसने जाटों के क्षेत्र में अपने प्रभाव के लिए उनसे युद्ध छेड़ दिया । जिससे सं. 1831 तक जाटों के राज्य का बड़ा भाग छिन्न−भिन्न हो गया । जाटों की शासन−सत्ता सीमित क्षेत्र में सिमट गई थी । उसी समय सं. 1832 में जाट सरदार नवल सिंह की मृत्यु हो गई थी ।

रणजीत सिंह (सं. 1832 − सं. 1862)

वह नवलसिंह की मृत्यु के पश्चात जाट राज्य का स्वामी बना । शासन सँभालते ही उसे मुग़ल आक्रमण का सामना करना पड़ा, जिसमें जाटों की पराजय हुई थी । रणजीत के अधिकार में केवल भरतपुर का क़िला और उसका निकटवर्ती क्षेत्र रह गया । उसकी वार्षिक आय घट कर केवल 5 लाख रुपया रह गई ।

ब्रज की दुर्दशा

जाटों की पराजय से ब्रज की स्थिति संकटग्रस्त हो गई । इस समय में इस प्रदेश के सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का कोई रखवाला नहीं रहा और रूहेले सैनिक जब चाहें यहाँ आकर लूट−मार मचा देते थे । ब्रज में निवास करते भक्तगण अनिच्छा पूर्वक ब्रज को छोड़ कर इधर−उधर भागते फिरते थे । वृन्दावन के भक्त वृन्दावनदास उसी समय वृन्दावन से कृष्णगढ़ गये थे । उन्होंने अपनी एक रचना 'श्री बेलि' में सं. 1831 के संकट का वर्णन करते हुए लिखा है* सं. 1814 से 1832 तक ब्रज प्रदेश पर यवन सेना ने बार−बार आक्रमण किए जिससे यह समय ब्रज के लिए भीषण संकट का रहा । ब्रज जन हताश हो गये थे । चाचा वृन्दावनदास ने दुर्व्यवस्था का कथन करते हुए लिखा है[1]
रणजीत सिंह के शासन काल की पराजयों से ब्रज में घोर संकट था । उस समय ब्रजवासी भक्त ब्रज को छोड़ कर इधर−उधर भटक रहे थे । वृन्दावनदास उस समय में कृष्णगढ़ में ही थे । सं. 1835 में उन्होंने अपनी 'आरती पत्रिका' कृष्णगढ़ में ही लिखी थी । उसमें अपनी मनोदशा का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा* ब्रज की दुर्दशा करने वाले और जाटों के प्रबल शत्रु मुग़ल नजफ़ख़ाँ की मृत्यु सं. 1839 में हो गई थी ।

ब्रज की अव्यवस्था में अंगरेजों की सैनिक हलचलें

माधवजी सिंधिया की मृत्यु के बाद ही मराठा राज्य के शासक पेशवा और अहिल्याबाई होलकर का देहावसान हुआ था । उन सबके अभाव में मराठों की शक्ति डगमगाने लगी और उनकी शासननीति में अनेक उलट−फेर होने लगे । माधव जी का उत्तराधिकारी दौलतराव सिंधिया हुआ तथा अहिल्याबाई का उत्तराधिकारी तुकोजीराव और उनकी मृत्यु होने पर यशवंतराव होलकर हुआ । उत्तर भारत में सत्ता को लेकर सिधिंया और होलकर में निरंतर संघर्ष होने लगा । मराठा, जाट और मुसलमानों में भी नित्य झगड़े होने लगे । इस सिद्धांतहीन संघर्ष के कारण ब्रजंमडल और उसके आसपास अव्यवस्था फैल गई थी जिसका लाभ अंगरेजों ने उठा कर ब्रजमंडल में अपनी सैनिक हलचलों से झकझोर दिया ।

जाट−अंगरेज़ युद्ध

सं. 1860 में अंगरेज़ी सेना ने दौलतराव सिंधिया के विरुद्ध सफल अभियान करके मथुरा पर अधिकार कर लिया । उधर जनरल लेक की कमान यशवंतराव होलकर का पीछा कर रही थी । होलकर ने भाग कर भरतपुर में शरण ली । उस समय भरतपुर में जाट राजा रणजीत सिंह का शासन था । जनरल लेक ने भरतपुर नरेश से माँग की कि वह होलकर को अंगरेजों के सुपुर्द कर दे । रणजीत सिंह ने इस माँग को स्वीकार नहीं किया । अंगरेज़ों ने भरतपुर पर आक्रमण कर दिया । जाटों ने बहुत वीरता से अंगरेज़ी सेना का मुक़ाबला किया कि उसे पीछे हटना पड़ा । जनरल लेक जैसे वीर सेनापति की अध्यक्षता में अंगरेज़ों ने चार बार भरतपुर पर आक्रमण किया किंतु हर बार उन्हें मुँह की खानी पड़ी । इससे भरतपुर क़िले की अजेयता, जाटों की वीरता और रणजीत सिंह की प्रबंध−कुशलता की सर्वत्र ख्याति हो गई । रणजीत सिंह की पराजयों के कारण जाटों की जो अप्रतिष्ठा हुई थी, वह अंगरेज़ों से सफलतापूर्वक युद्ध करने के कारण दूर हो गई । जाट राज्य के इतिहास में सूरजमल और जवाहरसिंह द्वारा दिल्ली में की गई लूट की भाँति रणजीत सिंह द्वारा अंगरेज़ों से सफल संघर्ष करने की घटना भी बड़ी प्रसिद्ध है । ब्रज के अनेक कवियों और लोक गायकों ने भरतपुर पर अंगरेज़ों की चढ़ाई, जाटों की वीरता और अंगरेज़ों की पराजय का अत्यंत ओजपूर्ण वर्णन किया है । -[2][3] * * *

रणधीर सिंह (शासन सं. 1862−सं. 1879)

वह रणजीत सिंह के बाद जाटों का राजा हुआ । रणजीत सिंह की मृत्यु सं. 1862 वि. में हुई । रणधीर उसका ज्येष्ठ पुत्र था । उसके शासन काल में इस भू−भाग में कोई घटना नहीं हुई, जिसने जाट राज्य की शांति को भंग किया हो । फलत: रणधीर अपने सीमित अधिकृत क्षेत्र पर बिना झगड़े−झंझट के शासन करता हुआ अपना राज्य काल पूरा कर गया । उसकी मृत्यु सं. 1879 में हुई थी ।

बलदेव सिंह का शासन (सं. 1879 −सं. 1882)

वह रणधीर सिंह का छोटा भाई था । वह केवल 2 वर्ष तक ही शासन कर सका था । उसके बाद उसकी मृत्यु हो गई थी ।

परवर्ती जाट राजा

बलदेव सिंह के बाद उसका पुत्र बलवंत सिंह (सं. 1882−1910) भरतपुर का राजा हुआ । बलवंत सिंह के पश्चात उसका पुत्र यशवंत सिंह (सं. 1910 − सं. 1950) जाटों का राजा हुआ । उसके शासनकाल में अंग्रेज़ो के विरुद्ध सैनिक विद्रोह हुआ था, जिसमें देश की जनता ने भी आंशिक रूप से भाग लिया । जिससे अंग्रेज़ी कंपनी का अधिकार समाप्त हो गया; और इंगलेंड की महारानी विक्टोरिया ने इस देश की शासन−सत्ता अपने हाथ में ले ली ।

मराठों के प्रभाव में वृद्धि

मुग़ल शासन के अंतिम काल में मराठों ने उत्तर भारत में प्रभाव बढ़ा लिया था । मुग़ल सम्राट शाहआलम को अपने शेष साम्राज्य की बिगड़ी शासन−व्यवस्था को ठीक करने के लिए मराठों की सहायता लेने को बाध्य होना पड़ा । उसने मराठा सरदार माधव जी सिंधिया को अपना मीर बख़्शी (मुख्य मन्त्री) और प्रधान सेनापति बना दिया । उस समय भरतपुर की राजगद्दी पर जाट राजा रणजीत सिंह था । माधव जी सिंधिया का प्रभाव मुग़ल सम्राट और जाट राजा दोनों पर था । उनका संक्षिप्त विवरण यह है, −

माधव जी सिंधिया

उसका जन्म मराठों की एक नीची जाति और निम्न परिवार में हुआ था । उसका पिता रानोजी आरंभ में पेशवा का एक साधारण सेवक था और उसके जूतों की देख−भाल करता था । उसकी स्वामिभक्ति और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर पेशवा ने उसे सेना में भर्ती कर लिया, जहाँ वह उन्नति करता हुआ सेना नायक के पद पर पहुँच गया । उसके पुत्र माधव जी ने अपनी वीरता, बुद्धिमता और नीति−निपुणता से उन्नति की और वह मराठा सेना के योग्यतम सेनानायकों में गिना जाने लगा । पानीपत के युद्ध में अन्य मराठा सरदारों की भाँति वह भी सम्मिलित था और शत्रुओं से लड़ता हुआ घायल हो गया था । उसके बाद उत्तर भारत में आश्चर्यजनक रूप से मराठा शक्ति के विस्तार का श्रेय जिन्हें है उनमें माधव जी का नाम सबसे पहले लिया जाता है । दिल्ली दरबार के वजीर मिर्जा नजफ़ख़ाँ की सं. 1839 में मृत्यु होने के बाद मुग़ल साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गई, जिसे दूर करने के लिए तत्कालीन मुग़ल सम्राट शाहआलम ने माधव जी सिंधिया को अपना मुख्यमन्त्री (मीर बख़्शी) बनाया । पेशवा की ओर से उत्तर भारत में जो मराठा सेना थी, उसके सेनापतियों में माधव जी ही सबसे अधिक योग्य था । उसने मुग़ल साम्राज्य की अव्यवस्था दूर कर मुग़ल दरबार के उपद्रवी रूहेले सरदारों को दबा दिया और जयपुर राज्य से बक़ाया कर वसूल किया । फिर डीग, आगरा, अलीगढ़, मथुरा आदि प्रमुख स्थानों पर अधिकार कर अपनी योग्यता, शक्ति और सत्ता की धाक जमा दी । वह मुग़ल साम्राज्य का मुख्यमन्त्री होने के साथ ही साथ प्रधान सेनापति और सम्राट का संरक्षक (वकीले मुत्लक़) भी था । इसलिए वह सम्राट् शाहआलम के नाम पर शासन करने लगा । उसके कारण मराठों का प्रभाव उत्तर भारत में बहुत बढ़ गया और मराठों की भगवा पताका दिल्ली के लाल किले पर फहराने लगी ।


सं. 1844 में माधव जी को अपनी सेना के पुनर्गठन के लिए मालवा जाना पड़ा । उसकी अनुपस्थिति में ग़ुलाम क़ादिर रूहेला ने दिल्ली पर और इस्मायल बेग ने आगरा पर अधिकार कर लिया । उन दोनों यवन तानाशाहों ने दिल्ली और ब्रज में अत्याचार करना आरंभ कर दिया था । ग़ुलाम क़ादिर ने शाहआलम, उसकी बेगमों और परिवार वालों पर ऐसे अत्याचार किये, जो मुग़ल सम्राटों में से किसी को कभी सहन नहीं करने पड़े थे । उसने बादशाह की आँखे निकलवा कर उसे अंधा कर दिया और उसकी स्त्रियों को बेइज्ज़ती की । उस समय अंधे बादशाह ने माधव जी पास ख़बर भेजी कि वह उसकी दयनीय दशा में सहायता करने को शीघ्र ही दिल्ली आये । उसने माधव जी को अपने प्रिय पुत्र की तरह संबोधन करते हुए (माधौ जी सिंधिया फ़र्ज़न्दे जिगरबंदे मनअस्त) एक मार्मिक कविता लिखी थी ।[4] बादशाह की पुकार सुन माधव जी ने रानाख़ाँ और जिब्बादादा के नेतृत्व में एक शक्तिशाली मराठा सेना दिल्ली भेजी, जिसने ग़ुलाम क़ादिर को हराकर उसे दिल्ली से भागने के लिए बाध्य किया । सं. 1845 में मराठों का अधिकार पुन: दिल्ली के क़िले और नगर पर हो गया । उस समय माधव जी भी वहाँ पहुँच गया । दिल्ली से भागते हुए ग़ुलाम क़ादिर को मराठा सेना ने मेरठ के पास पकड़ लिया और उसे मथुरा में माधवजी के सन्मुख उपस्थित किया । शाहआलम ने माधव जी से आग्रह किया कि ग़ुलाम क़ादिर के साथ भी वही सलूक किया जावे जो उसने मेरे साथ किया था और फिर उसे क़त्ल कर दिया जाए । बादशाह की इच्छानुसार ग़ुलाम क़ादिर की दंड स्वरूप आँखे निकलवाई गई और फिर उसे मार दिया गया । माधव जी सफलता और उसके प्रभाव के कारण कुछ मराठा सरदार भी उससे ईर्ष्या करने लगे थे । होलकर उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी और विरोधी था । पेशवा के दरबार में भी उसके विरुद्ध षड्यंत्र होने लगा था । इन समस्याओं के समाधान के लिए माधव जी का पूना जाना आवश्यक हो गया । वहाँ पहुँच कर उसने पेशवा के समक्ष उसी प्रकार दीनता प्रदर्शित की, जिस प्रकार उसके पूर्वज किया करते थे; किंतु उसका पूना दरबार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था । सं. 1851 (12 फरवरी सन् 1795) में माधव जी का देहांत हो गया ।

माधव जी की देन

माधव जी सिंधिया एक युगांतरकारी पुरुष थे । उनकी वीरता, नीतिज्ञता और दूरदर्शिता अनुपम थी । उन्होंने अपने पुरुषार्थ से मराठों की पताका दिल्ली के किले पर फहराई और उत्तर भारत में मराठों की शक्ति, सत्ता और प्रभुता को चरम सीमा पर पहुँचा दिया था । उनकी ब्रज को देन भी बड़ी महत्वपूर्ण थी । जाट राज्य का ह्रास होने से ब्रज में जो भीषण संकट पैदा हुआ था, वह माधव जी के कारण दूर हो गया था ।

हिम्मतबहादुर

वह माधव जी सिंधिया का समकालीन एक नागा गुंसाईं था और एक वीर, साहसी एवं कुशल सेनानायक के रूप में प्रसिद्ध था । उसके अधिकार में नागा सन्यासियों की सशस्त्र सेना थी, जिनके द्वारा वह उस समय की राजनैतिक हलचलों में सक्रिय भाग लेता था । ब्रज की तत्कालीन राजनीति से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध रहा था, अत: उसका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है । वह कुलपहाड़ का निवासी ब्राह्मण था और बचपन में ही सन्यासी होकर राजेन्द्र गिरि का शिष्य हो गया था । तब उसका नाम अनूपगिरि रखा गया था । उसकी रूचि सैनिक कार्यों में अधिक थी, अत: वह लखनऊ के नवाब शुजाउद्दौला की घुड़सवार सेना में भर्ती हो गया था । वहाँ उसने वीरता में बड़ा नाम पैदा किया, जिसके कारण नवाब ने उसे 'हिम्मतबहादुर' की पदवी और जागीर प्रदान की थी । बाद में वह अनूपगिरि के बजाय हिम्मतबहादुर के नाम से ही प्रसिद्ध हुआ । उसने युद्ध को अपनी जीविका का साधन बनाया । उसे जिस व्यक्ति से धन मिलता, उसी के पक्ष में वह सेना लेकर युद्ध करता था । इस प्रकार उसने अवध के नवाब, बुंदेलखंड के राजा, दिल्ली के मुग़ल सम्राट मराठों और अंग्रेज़ सभी के पक्ष में अनेक युद्ध किये थे । इस संबंध में उसका न कोई सिद्धांत था और न कोई नीति । उसने रुपये के लिए विदेशी मुसलमान और अंग्रेज़ आक्रमणकारियों का साथ दिया था ।


अपने समय में उसकी वीरता की धाक थी । मुग़ल दरबार का साथ देकर उसने माधव जी सिंधिया को नीचा दिखाना चाहा था, किंतु उसमें वह सफल नहीं हुआ । वह माधव जी को सदा परेशान करता था । माधव जी ने उसकी जागीर का बड़ा भाग छीन लिया था और उसके अधिकार में केवल माँट और वृन्दावन की जागीरें रहने दी थीं । वृन्दावन में राजाओं की भाँति बड़ी शान से रहता था और माधव जी से शत्रुता रखने के कारण सदैव उनके विरुद्ध चालें चला करता था । उसने सैनिक दाँव−पेच और कूटनीति के अतिरिक्त मन्त्र−तंत्र का प्रयोग भी किया था । वह कुशल सेनानी एवं कूटनीतिज्ञ होने के साथ ही साथ कवि, काव्य−प्रेमी और कवियों का आश्रयदाता था । ब्रजभाषा के सुप्रसिद्ध कवि 'पद्माकर' ने उसी के आश्रय में अपने एक मात्र वीर काव्य 'हिम्मतबहादुर विरूदावली' की रचना की थी । हिम्मत बहादुर का देहान्त सं. 1861 में हुआ था ।

अली बहादुर

उस काल में पेशवा की ओर से उत्तर भारत में जो मराठा सेना थी, उसका एक सेनानायक अलीबहादुर नामक मराठा था । वह बाजीराव पेशवा की मुस्लिम उपपत्नी मस्तानी का पौत्र था । पेशवा का वंशज होने से मराठा राज्य में उसका प्रभाव था और उसकी गणना बड़े सरदारों में होती थी । पेशवा ने अलीबहादुर को आदेश दिया था कि वह उत्तर भारत में मराठों की शक्ति का विस्तार करे, किंतु उसमें उसे आंशिक सफलता ही मिली थी ।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जमन कि जम जातना, भुगताई इह देह ।
    अब अपने अपनाइ लेउ, बास काँपत कपिला गाय ज्यों, कहत मरत हौं लाज।
    कलि केहरि ते अब करौ, रच्छा सुरच्छा आज।
  2. चढ़े फिरंगी भयौ भारत भरतपुर में, तोपन तरपि कै, हलान पै हलान की ।
    काली करी तृपत ,फिरंगी सो कुरंगी भए,एक हू कला न चली ,पथरकलान की ॥ (­प्रेमकवि)
  3. मच्यौ घमासान, कोस तीन लगि लोथ परीं, मर गये सूर साँचे मौहरा अगाह तें ।
    कहै 'जसराम' अंगरेज़ जंग हार गये, जीते जदुवंशी सूर, लड़त उछाह तें ॥ (जसराम)
  4. उसमें कहा गया था−"मेरे राज्य को दु:ख की आँधी ने छिन्न−भिन्न कर दिया है । जो राज्य सूर्य की तरह प्रकशित था, उसे ग़ुलाम कादिर ने तिमिरावृत कर दिया । अल्लाह मदद करे, मेरा प्रिय पुत्र माधव जी सिंधिया मेरी अवश्य रक्षा करेगा और मेरे अपमान का बदला लेगा ।"

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