स्वतंत्रता संग्राम 1920-1947

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असहयोग आन्दोलन

सितंबर सन् 1920 में कलकत्ता कांग्रेस ने अपने विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन का सहज स्वागत किया । गांधी जी के आह्रान पर मथुरा ज़िला अपना योगदान देने को प्रस्तुत हो गया । उन दिनों चूंकि कांग्रेज-संगठन की दृष्टि से मथुरा ज़िला दिल्ली प्रान्त में सम्मिलित था अतएव दिल्ली से समय-समय पर कांग्रेसी नेताओं का आगमन होता था । गांधीजी के असहयोग कार्यक्रम के अनुसार सरकारी उपाधियों का त्याग, नौकरियों का त्याग, अंग्रेजी अदालतों एवं शिक्षण संस्थाओं में त्याग का भी क्रियान्वयन हुआ । सन् 1921 के प्रारम्भ होने पर असहयोग आंदोलन में तेजी आने लगी तथा मथुरा ज़िले के गांवों एवं कस्बों में भी इसकी लहर फैलने लगी । अड़ींग, गोवर्धन, वृन्दावन एवं कोसी आदि स्थानों में भी राष्द्रीय हलचल प्रारम्भ हो गयी । गोवर्धन में राष्द्रीय चेतना को बढाने में सर्वश्री कृष्णबल्लभ शर्मा, ब्रजकिशोर, रामचन्द्र भट्ट एवं अपंग बाबू आदि प्रमुख थे । वृदावन में सर्वश्री गोस्वामी छबीले लाल, नारायण बी.ए., पुरुषोत्तम लाल, मूलचन्द सर्राफ आदि ने प्रमुख भाग लिया । असहयोग आन्दोलन तीव्र करने के लिए 9 अगस्त सन् 1921 को लाला लाजपत राय के सभापतित्व में वृन्दावन की मिर्जापुर वाली धर्मशाला में एक विशाल सभा हुई थी । इसमें हज़ारों की संख्या में जनता उपस्थित थी । गां0 छबीले लाल ने अभिनन्दन पत्र पढा था । सर्वश्री भगवानदास केला, आनन्दी लाल चतुर्वेदी, हमीद, ब्रजलाल वर्मन ने इस अवसर पर व्याख्यान दिये थे । वृन्दावन के गुरुकुल और प्रेम महाविधालय में भी उनका पदार्पण हुआ था । दूसरे दिन मथुरा के अग्रवाल विधालय में उनका आगमन हुआ । पुरानी कोतवाली (गांधी पार्क) में एक विशाल सभा में उनका भाषण हुआ । इस अवसर पर लाला गोवर्धनदास(लाहौर) का भी स्वदेशी पर भाषण हुआ । मथुरा के श्री द्वारिका प्रसाद भरतिया ने इस अवसर पर लाला लाजपतराय को समाज की ओर से अभिनन्दन पत्र भी दिया था ।

मथुरा राम-बारात केस

4 अक्टूबर सन् 1921 को मथुरा के तमोलियों ने एक भव्य रामलीला की बारात निकालने की योजना बनायी थी । तत्कालीन राष्द्रीयता की लहर ने इसको भी राष्द्रीय रंग से रंग दिया था अतएव विदेशी शासन ने इसके अधिकारियों का दमन करने का निश्चय किया । 19 अक्टूबर और इसके उपरान्त इसी सम्बंध में सर्वश्री ब्रजगोपाल भाटिया, द्वारकानाथ भार्गव, रामनाथ मुख्त्यार, ला॰ रामनारायण नारायण बेकर, मुंशी नारायण प्रसाद, देवीचरण, रामचन्द्र सूरदास, मुकन्दलाल, श्री निवास, ला॰ कृष्ण गोपाल, ला॰ प्रभुदयाल, राधाकांत भार्गव, सूरजभान दलाल, ला॰ छिदामल, शंकर तमोली, मनोहरी तमोली, ला॰ कद्दूमल सर्राफ, रणछोरलाल शर्मा, ज्योति स्वरूप, गोपालदास, ठाकुरदास, बद्री प्रसाद, पं0 मूलचन्द, ला॰ चिरंजीलाल बजाज, पन्नालाल बेदई, परसादी तमोली, ला॰ पन्नालाल, नन्दकुमार शर्मा, फूलखाँ रंगरेज, जदुनाथ मेहता, मुरलीधर आदि गिरफ़्तार हुए थे । हकीम ब्रजलाल वर्मन और मा0 रामसिंह के भी वारण्ट थे लेकिन बाहर रहने के कारण गिरफ़्तार न हो सके । कुल मिलाकर 43 देशभक्त गिरफ़्तार हुए थे । यह केस 2 नवम्बर सन् 1921 से प्रारम्भ होकर 3 मार्च सन् 1922 को तत्कालीन डिप्टी मजिस्द्रेट श्री द्वारिकानाथ साहू द्वारा छाता में फैसला देने के साथ समाप्त हुआ । 13 अभियुक्तों को मुकदमे के प्रारम्भ में ही छोड दिया गया था । मुकदमे के दौरान 8 अभियुक्तों पर फर्द जुर्म नहीं लगा । अन्त में केवल 20 पर मुक़दमा चलाया गया । इसमें कई को छोड दिया गया । केवल सर्वश्री हकीम ब्रजलाल वर्मन, मास्टर रामसिंह, मनोहरी तमोली, राधाकांत भार्गव, मुकुन्दलाल वर्मन, श्री निवास, काशीनाथ, पन्नालाल वेदई, मौलाना यासीन खाँ आदि दण्डित हुए और जेल गये ।


20 अक्टूबर सन् 1921 को मथुरा में दिल्ली सूवे की एक राजनीतिक कांफ्रेंस पंजाबी पेच(चौकी बागबहादुर के पास) स्थान पर हुई थी । दिल्ली के असफअली बैरिस्टर और ला॰ शंकरलाल बेकर का भी इस अवसर पर आगमन हुआ था । इस कान्फ्रेंस को सफल बनाने में सर्वश्री लक्ष्मण प्रसाद नागर, डा॰ गंगोली, डा॰ मुन्नालाल, द्वारिकाप्रसाद भरतिया, डा॰ राजस्वरूप सरीन, नारायणदास बी.ए. (वृन्दावन), गो. छबीले लाल(वृन्दावन) आदि ने अथक परिश्रम किया था । 7 नवम्बर सन् 1921 को महात्मा गांधी का 3॥बजे मथुरा में आगमन हुआ और एक विशाल सभा हुई । उनके साथ में मौलाना आजाद, पं. मोतीलाल नेहरू, डा. अन्सारी, श्री मुहम्मद लकई, डा. बाबूराम, डा.लक्ष्मीदत्त आदि का भी आगमन हुआ था । गांधी जी के अतिरिक्त पं. मोतीलाल नेहरू ने भी भाषण दिया था । सरकारी विरोध होते हुए भी यह सभा सफल हुई । दिल्ली, आगरा और अलीगढ के 150 स्वयंसेवक और मथुरा के 125 स्वयंसेवक इसमें सम्मिलित हुए थे ।

मथुरा 1921 तक

जनवरी सन् 1922 तक असहयोग आन्दोलन का बड़ा जोर रहा । अनेक जुलूस और गिरफ़्तारियों का तांता लग गया । 17 नवम्बर सन् 1921 को मथुरा में पूर्ण हड़ताल हुई । गोवर्धन में हड़ताल के पर्चे बांटते हुए मौलाना यासीन बेग को गिरफ़्तार कर लिया गया । वृन्दावन के श्री बाल गोविन्द (उप-सम्पादक ‘प्रेम’), श्री पुरुषोत्तम लाल, हरीकृष्ण भी उन्ही दिनों गिरफ़्तार हुए और जेल का दण्ड मिला । 16 दिसम्बर सन् 1921 को 5 स्वयंसेवक सर्वश्री केदारनाथ भार्गव, राजदयाल शर्मा, रामचंद्र सिंघल, भजन लाल एवं बाबूसिंह की गिरफ़्तारी हुई । 17 दिसम्बर को सर्वश्री रामशरण जौहरी, नन्दलाल शर्मा, गोपाल प्रसाद चौबे, रामचन्द्र सूरदास, मौलवी अब्दुल लतीफ गिरफ़्तार हुए । 18 दिसम्बर को 11 स्वयंसेवक – सर्वश्री राजेन्द्रनाथ भार्गव, मौलाना इनाम इलाही, बाबूलाल, मौलाना अब्दुल वाहिद, अब्दुल शकूर, छंगा, शिवनाराण दत्त, ताराचन्द, मास्टर अम्बा प्रसाद, रामरतन लाल अवस्थी, शरतकुमार मुखर्जी आदि मथुरा में गिरफ़्तार हुए । दूसरे दिन 21 स्वयंसेवको का मुक़दमा हुआ । पं. दुर्गादत्त जी की अदालत ने इन्हें 3-3 मास की जेल का दण्ड दिया । 19 दिसम्बर को मथुरा के सर्वश्री देवीचरण, गोपीनाथ, मौलाना अलादीन, पन्नालाल, ठाकुर टीकमसिंह एवं नत्थीसिंह (सरोठ), ला. द्वारकाप्रसाद (फ़रह) मथुरा में गिरफ़्तार हुए । 20 दिसम्बर को 19 स्वयंसेवक सर्वश्री राधावल्लभ भार्गव, मुरलीधर, ठाकुर इन्द्रजीत, प्रसादीलाल, ला. ब्रज भूषण स्वरूप, गोरखनाथ, बनवारी लाल, अकबर, कुल्लो, नत्थन क़साई गिरफ़्तार हुए । 21 दिसम्बर को 8 स्वयंसेवक-सर्वश्री केशवराम टण्डन (मथुरा), सौख के गोकुल चन्द, रामचन्द्र एवं सोहनलाल और मथुरा के किशोरी प्रसाद, श्रीनाथ एवं मौलाना मुहम्मद हुसेन की गिरफ़्तारी हुई । 22 दिसम्बर को 13 स्वयंसेवक- डा. मुन्नालाल, कुन्दन लाल शर्मा, बैकुण्ठनाथ भार्गव, रामप्रसाद हुलासी हज्जाम, छंगा क़साई, ठाकुर मदन, मूलचन्द तमोली, गोवर्धन के सर्वश्री रामचन्द्र,रामगोपाल सिंह, गोस्वामी अवनि कुमार एवं ब्रज किशोर शर्मा मथुरा में गिरफ़्तार हुए । 23 दिंसम्बर को मौलाना अब्दुल गनी के नेतृत्व में 40 ख़िलाफ़त के स्वयंसेवको का जुलूस निकाला । इनमें 28 को गिरफ़्तार किया गया । इन्हीं दिनों अनेक जुलूस निकले । बच्चों तक ने जुलूस निकाले थे । 19 और 20 दिसम्बर की गिरफ़्तारियों के मुकदमों की निर्णय जेल में ही हुआ । सब देशभक्तों को 2 मास से 4 मास तक का जेल दण्ड दिया गया । सन् 1921 के असहयोग आंदोलन के दौरान तत्कालीन प्रसिद्व जोशीले वक्ता श्री राधाकृष्ण भार्गव को 108 दफा के अन्तर्गत 1 वर्ष कारावास का दण्ड मिला था । वृन्दावन के गोस्वामी छबीले लाल को खुर्जा के भाषण के अपराध में 124 दफा के अन्तर्गत 1॥वर्ष जेल की सजा मिली थी । श्री मदनमोहन चतुर्वेदी (मथुरा) 8 अप्रैल सन् 1921 में गोरखपुर के भाषण के आधार पर 11 मई 1921 को मथुरा में गिरफ़्तार हुए और दण्डित हुए । यह बात ध्यान देने योग्य है कि सन् 1921 के आन्दोलन में मथुरा के 100 से अधिक लोग जेल गये जिनमें चौथाई मुसलमान थे । इसी आंदोलन में श्री सूरजभान दलाल की मृत्यु हुई जिनको मथुरा की जनता आज भी आदर के साथ स्मरण करती है । संक्षेप में सन् 1921 के असहयोग आंदोलन में मथुरा ज़िले का प्रशंसनीय योगदान रहा ।

सन् 1921 के बाद

सन् 1922 में पं. मोतीलाल नेहरू के सभापतित्व में धूमधाम से प्रान्तीय सम्मेलन मथुरा में हुआ था । सन् 1923 में स्वराज्य पार्टी के टिकट पर वृन्दावन में कांग्रेसी उम्मीदवार बी.ए. केन्द्रीय असेम्बली के चुनाव में विजयी रहे । सन् 1923 के नागपुर के सत्याग्रह में मथुरा ज़िले के अनेक देशभक्तों ने भाग लिया । इस सम्बंध में सर्वश्री तारासिंह (महोली), हुकुम सिंह(कारब) विशेष रूप से उल्लेखनीय है । सन् 1923 में बा. गंगा प्रसाद भार्गव,लक्ष्मण प्रसाद वकील, हकीम ब्रजलाल वर्मन, बाबू रामनाथ आदि के सहयोग से ‘ब्रजवासी’नामक पत्र निकालना प्रारम्भ किया और यह वर्षो ज़िले का प्रमुख राष्द्रीय पत्र रहा । सन् 1927-28 में मथुरा ज़िले में साइमन कमीशन के बहिष्कार सम्बंधी हड़ताल और जुलूसों का आयोजन हुआ । मथुरा का विशाल जूलूस अभूतपूर्व था । धीरे-धीरे देश का वातावरण विक्षुब्ध होता गया । देश के अन्य भागों की तरह मथुरा में नवजवान सभा, नवयुवक संघ की स्थापना हुई । ‘युवक संघ’के प्रमुख कार्यकर्ता सर्वश्री अक्षय कुमार कर्ण, चिंतामणि शुक्ल, माखनलाल, हज़ारीलाल, सुरेन्द्रसिंह राघव, शरणगोपाल, गोपालदास सौदागर, बल्लभदास अजमेरा, विनोद भास्कर, सरदार रणवीर सिंह आदि थे । ‘नवजवान भारत सभा’की गतिविधियों में सर्वश्री रामशरणदास जौहरी, गोपाल प्रसाद चतुर्वेदी, रामजीदास गुप्त, शिवशंकर उपाध्याय आदि का नाम उल्लेखनीय रहेगा । वृन्दावन में इसके प्रमुख कार्यकर्ता श्री गणेशीलाल पांडे और अरुण चक्रवर्ती थे । सन् 1921 में सुप्रसिद्व देशभक्त महिलारत्न श्रीमती मनोरमा देवी ने सूर्यघाट के पास यमुना किनारे ‘राष्द्रीय महिला आश्रम’की स्थापना की थी । इसके सदस्यों ने स्वतंत्रता में सक्रिय भाग लिया और जेल यात्राएँ की । तत्कालीन उत्तर प्रदेशीय कांग्रेस कमेटी के सभापति पं. जवाहरलाल नेहरू जुलाई 1921 में गांधी जी के आने के पूर्व मथुरा में भी पदार्पण किया । नवम्बर सन् 1921 में खादी प्रचार के सन्दर्भ में महात्मा गांधी ने मथुरा ने मथुरा में पदार्पण किया । बापू की ठहरने की व्यवस्था आधुनिक बडे डाकखाने की ऊपरी मंजिल में सडक की ओर वाले कमरे में की गयी थी । गांधी जी ने इस दौरे में वृन्दावन, कोसी,गोवर्धन, राया, सादाबाद, गोकुल, महावन में भी पदार्पण कर जनता को दर्शनों का सौभाग्य प्रदान किया था । सन् 1921 में ही मथुरा ज़िला फिर यू. पी. प्रान्तीय कांग्रेस कमेट से सम्बन्धित हो गया ।

मथुरा में नमक सत्याग्रह

महात्मा गांधी के आह्रान पर मथुरा जनपद (ज़िला) में नमक सत्याग्रह सन् 1930 में प्रारम्भ हुआ । सर्वप्रथम मार्च में आचार्य जुगल किशोर के नेतृत्व में वृन्दावन से आगरा में नमक क़ानून तोडने के लिए प्रेम महाविधालय का एक जत्था रवाना हुआ । इसका स्थान-स्थान पर भव्य स्वागत हुआ । इस जत्थे में सर्वश्री चन्द्रदत्त पांडे, शिवशंकर उपाध्याय, हज़ारीलाल, सिद्वनाथ, रामनाथ मिश्र,सोहनलाल, हरप्रसाद, बसन्तकुमार चक्रवर्ती एवं हरचरण लाल गुप्त आदि देशभक्त युवक सम्मिलित हुए थे । दूसरों प्रमुख जत्था श्री धर्म किशोर के नेतृत्व में सत्याग्रह आश्रम मथुरा से 13 अप्रैल को रवाना होकर 22 अपैल को आगरा पहुँचा था । यह जत्था वृन्दावन, जैत, बाटी, धनगांव, लालपुर, अडींग, राधाकुण्ड, गोवर्धन, बछगांव, सोंख, मागोर्रा, परखम एवं फ़रह होता हुआ आगरा पहुँचा था । बल्देव से भी लगभग 20 सत्याग्रहियों का एक जत्था नमक क़ानून भंग करने के लिए चल पडा था । इस जत्थे में श्री द्वारिका प्रसाद वत्सल, मणिभूषण शर्मा, गयाप्रसाद गोकुलिया, किशोरीलाल, जमुना जलवाले, मूसे महाराज, रामलाल जाटव, बांकेलाल उर्फ पंगा, छेदालाल, बनवारीलाल पंडा आदि ने भाग लिया । सन् 1930 के नमक सत्याग्रह आंदोलन में मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन एवं ज़िले के अनेक स्थानों पर विदेशी वस्त्र की दुकानों पर पिकेटिग का कार्य बडी संलग्नता से पूर्ण हुआ । इसमें अनेक महिलाओं ने भाग लिया । वृन्दावन स्थित प्रेम महाविधालय उन दिनों राष्द्रीय हलचल का केन्द्र बन गया था । यहाँ अनेक देशभक्त अध्यापकों जैसे आचार्य जुगल किशोर,प्रोफेसर कृष्णचन्द्र, श्री नलिनीकान्त मुकजी, श्री श्रीनारायणदास (दास बाबू) आदि ने न केवल सक्रिय भाग लिया अपितु जेल यात्राऐं भी कीं । उनमें सर्वश्री अक्षयकुमार करण, अवनि कुमार करण, दरबारीलाल अस्थाना, धर्मकिशोर, हरप्रसाद मिश्र, रामनारायण मिश्र, सिद्वनाथ, सोहनलाल, चन्द्रदत्त पांडे, रामरक्ष पांडे, बसन्त कुमार चक्रवर्ती, अर्जुन प्रसाद,श्रीधर प्रसाद, रवीन्द्र शर्मा, जगदीश मण्डल आदि उल्लेखनीय रहेंगे ।


सन् 1930 में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए अनेक लोगों ने अनुपम त्याग का परिचय दिया । सन् 1930 में जोशीली विशाल प्रभातफेरियों द्वारा राष्द्रीय जोश उत्पन्न किया जाता था । प्रभात फेरियों को सफल बनाने में पं. जगन्नाथ प्रसाद भार्गव, हरीनाथ भार्गव, ब्रजगोपाल भाटिया, गुरुदेव स्वामी, दाता नन्दन सिंह, ठा. चिरंजीसिंह, देवनायक हटीला, बाबूलाल(तस्वीर वाले) और महिलाओं में सर्व श्रीमती गोदावरी देवी, शान्तिदेवी (बह्राचारिणी), चन्द्रावली, कृष्णादेवी, राधादेवी, बृजेश्वरी देवी, प्रकाशवती, सौभाग्यवती देवी, भूपकुँअर, श्याम सुन्दरी भाटिया, श्यामकुमारी, सुखदावती, विधादेवी, शिवरानी चतुर्वेदी ने विशेष भाग लिया । वृन्दावन में भी प्रभातफेरियों की धूम रहती थी । स्वतंत्रता प्रेमी जनता इसमें अधकि संख्या में भाग लेती थी । प्रेम महाविधालय के अध्यापक एवं छात्र इनमें विशेष योगदान रहता था । स्वयंसेवाओं के लिए भोजन की व्यवस्था में यहाँ के विभिन्न क्षेत्रों ने बडी सहायता प्रदान की थी । श्री राधाचरण अग्रवाल एवं श्री गोविंद प्रसाद ने इस कार्य में बहुत मदद दी थी । श्री सदासुख बाबू ने प्रशंसनीय योग दिया । लाला बाबू के मन्दिर और पासवाले मन्दिर के ये मैनेजर थे । भैरों वाला क्षेत्र भी बड़ा सहायक रहा । श्री ज्योतिश बाबू, श्री द्विजेन्द्र बाबू एवं डा. केशवचन्द्र चक्रवर्ती के सहायता कार्य उल्लेखनीय रहे । हुण्डी प्रणाली में वैध राधारमण एवं श्री मदन लाल अरोडा ने सहायता प्रदान की थी । वृन्दावन में सर्वागीण प्रगति प्रदान करने वाले बाबू नारायणदास बी. ए. की सेवाएँ एवं कार्य चिरस्मरणीय रहेंगे ।

मथुरा की चुंगी पर तिरंगा

सन् 1930 में नगरपालिका पर से विदेशी शासन के झंण्डे को हटाकर तिरंगा राष्द्रीय झंडा फहराने की घटना भी उल्लेखनीय रहेगी । तत्कालीन ला. लल्लोमल एवं उपाध्यक्ष सेठ रूप किशोर की हठधर्मी के कारण जब विदेशी झंडा नहीं हटा तो सर्वश्री केदारनाथ भार्गव, डा.श्रीनाथ भार्गव, गौरीदत्त चतुर्वेदी, बाबूलाल भार्गव, लीलाधर, जग्गो, मोतीलाल, मूलचन्द (सरौठ) तथा नत्थीसिंह(सरौठ) तक, भजनलाल वर्मा ने आगे बढकर और प्राणों की चिन्ता न करके चुंगी पर तिरंगा झण्डा फहराने में सफलता प्राप्त कर ली और जेल यात्रा के पथकि बन गये । गोवर्धन में ख़ास महल की अमन सभा भंग करने की घटना भी उन्हीं दिनों हुई । इस आन्दोलन के दौरान गवर्नमेण्ट हाई स्कूल और कचहरी पर झण्डा सत्याग्रह की भी घटनाएँ बडी महत्वपूर्ण थी । श्री अक्षयकुमार करण के नेतृत्व में एक बडे जुलूस ने गवर्नमेण्ट हाई स्कूल पर जब तिरंगा झण्डा फहराने का प्रयत्न किया तो पुलिस ने बडी निर्ममता से लाठी प्रहार किया जिसके फलस्वरूप अनेक लोग घायल हुए । कचहरी पर झण्डा फहराने के प्रयत्न में जब गोरे ज्वाइण्ट मजिस्ट्रेट ने एक के हाथ से झण्डा छीन लिया तो झण्डा वापिसी के लिए कचहरी पर ही सत्याग्रह आरम्भ हो गया जिसमें डा. ताराचन्द एवं श्री सोहन लाल जी को बाल पकडकर घसीटा गया । अन्त में सत्याग्रहियों के दृढ संकल्प से प्रभावित होकर अधिकार वर्ग को झण्डा वापिस करना पडा ।


सन् 1930 में नवम्बर की पचावर कान्फ्रेन्स और 17 फरवरी सन् 1931 की सरौठी कान्फ्रेन्स की घटनाएं भी ऐतिहासिक बनी रहेंगी । अधिकारी वर्ग में इनको सफल न होने देने का हर प्रकार का प्रयत्न किया था लेकिन दृढ-संकल्पी एवं सर्वस्व अर्पण करने को प्रस्तुत देशभक्तों ने दोनों कान्फ्रेसों को करके ही अपनी देशभक्ति का परिचय दिया । अनेक जत्थे इन अवसरों पर गिरफ़्तार हुए थे । सुप्रसिद्व वकील श्री सुन्दरलाल अरोडा एवं श्री गंगा प्रसाद भार्गव भी इसी संबंध में गिरफ़्तार हुए थे । सन् 1930 के सत्याग्रह आन्दोलन में जिन कस्बों एवं गांवों ने त्याग एवं बलिदान की बेला में अनुपम योगदान दिया उनमें सादाबाद, गोवर्धन, कोसी, छाता, कारव, कुज्जेरा, सरौठ, इरौली जुनारदार झुडावई, बलदेव, ऊंचागांव रसमई, बिजाहरी एवं सिहोरा आदि को विस्मरण नहीं कर सकते । यहाँ के अनेक देशभक्तो ने न केवल हर प्रकार की यंत्रणाएं कष्ट सहन किये अपितु जेलों में महीनों कष्टमय जीवन व्यतीत किया ।

मथुरा में सन 1930 का नमक सत्याग्रह

आन्दोलन के दिनों में पुलिस देशभक्तों को नाना प्रकार से फंसाने का प्रयत्न करती थी । कोसी में राष्ट्रीयता की लहर को कुचलने के लिए तत्कालीन अंग्रेज़ कलेक्टर डाइविल, सरकिल इंस्पेक्टर बशीर अहमद, कोसी के सेक्रेटरी मोहम्मद अब्बास और छाते के मुसलमान थानेदार के कुचक के कारण 28 मई सन् 1930 को होने वाली स्वतंत्रता-प्रेमियों की जो सभा होने वाली थी वह त्र्कीत गुंडो द्वारा सफल न होने दी और अन्त में 30 मई को छोटी सी घटना को लेकर साम्प्रदायिक दंगे का रूप प्रदान कर कोसी के राष्ट्र प्रेमियों को गिरफ़्तार कर लिया गया । पुलिस ने लगभग 115 गिरफ़्तारियाँ की थी और बहुतों से पुलिस ने मनमाना रुपया वसूल किया । आतंक का राज्य कोसी में स्थापित हो गया । बहुत से लोग कोसी छोडकर भाग गये । इसमें कोसी के प्रसिद्व धनीमानी देशभक्त सेठ गया लाल, चेतराम, परसादी लाल एवं लक्ष्मणदास पुलिस के कोपभाजन बने । कोसी का यह सुप्रसिद्व केस लगभग 12 महीने चला । अन्त में श्री प्रिया नाथ घोष ने 22 अगस्त सन् 1931 को इसका निर्णय देकर सबको मुक्त कर दिया । महीनों कोसी केस के देशभक्तों को कष्टमय जेल जीवन भी व्यतीत करना पडा । सफ़ाई के देशभक्त वकीलों में राय बहादुर जमुना प्रसाद, श्री सूरजवली बैरिस्टर (मेरठ),श्री विशनचन्द्र भार्गव एवं श्री रामनाथ मुख्तयार ने बडी लगन के साथ सफलता प्राप्त की मथुरा ज़िले मे बिजाहरी गांव भी स्वतंत्रता संग्रामों में अग्रिम रहा है । नमक सत्याग्रह में यहाँ के देशभक्तो ने भाग लिया था । मार्च के अंत तक लगान बंदी का कार्य चला । इस अवसर पर भागमल, गोविन्दा, हरना, बोहरे, बुद्वसिंह आदि ने झूठी रिपोर्ट देकर दमन के लिए डकैती केस यहाँ के कुछ देश भक्तों पर कायम किया । 107 दफा में 20 मई, 1931 में वे गिरफ़्तार किये गये । गिरफ़्तार करने 80 पुलिस वाले गये थे । इन्होंने 4 कांग्रेस कार्यकर्ताओं-शोभाराम, बलुआ, वेदी और टोडी को गिरफ़्तार किया । इस अवसर पर पुलिस ने नादिरशाही का परिचय दिया । घरो से गुड, घी, खाध सामान लूटा और तलाशी के बहाने रुपया जेवर आदि उठाकर ले गये । डा. श्रीनाथ, प्रो. कृष्ण चन्द्र, हकीम ब्रजलाल वर्मन ने जाकर गांव में छानबीन की और ज़िलाधीश डाइबिल का ध्यान पुलिस के अत्याचारों के विरूद्व आकर्षित किया । लेकिन कुछ ध्यान नहीं दिया गया । वारण्ट गिरफ़्तारी की तारीख 22 मई थी इसलिए कुल अपराधी एल. पी. हेनकाक्स(ज्वाइण्ट मजिस्ट्रेट) की अदालत में हाजिर हुए । उन्हें जेल भेज दिया गया । जेल जाने वालों में करण सिंह, वेदी, बलुआ, भागमल, गजराज, ख़ुशहाल सिंह, रामसिंह, गज्जी, दीपा, जोरावर, किशनलाल, तुलसी जुगला आदि थे । गांधी-इर्विन पैक्ट के विरूद्व होने वाली उक्त घटना की ओर महात्मा गांधी ने भी ध्यान दिया और उन्होंने पुलिस के विरूद्व दाबा दायर करने का आदेश दिया । अन्त में यह केस इलाहाबाद हाईकोट से छूटा । इस मुकदमे के दौरान ही मथुरा के प्रसिद्व वकील एवं देशभक्त पं. गंगाप्रसाद भार्गव का इलाहाबाद में ही पैरवी काल में ह्रदय गति रूक जाने के कारण स्वर्गवास हो गया । मथुरा ज़िले के लिए यह वज्रपात सदृश घटना थी ।


30 मई सन् 1931 को यमुना की रेती पर डा. मुहम्मद आलम के सभापतित्व में मथुरा ज़िला राजनीतिक कान्फ्रेंस की धूम रही और उसी के साथ-साथ एक प्रदर्शनी भी हुई थी । मास्टर राम सिंह की अध्यक्षता में बन्दी सम्मेलन भी आयोजित हुआ । इसी वर्ष मई मास में युक्त प्रान्तीय ‘नौजवान भारत सभा’ कान्फ्रेस भी मथुरा के बहोरा स्थान में श्री सुभाष चन्द्र बोस के सभापतित्व में धूम-धाम से हुई थी । इस कान्फ्रेंस की सफलता के लिए अखिल भारतीय नौजवान भारत सभा के मन्त्री श्री रामजीदास गुप्त ने बड़ा परिश्रम किया था । इस कान्फ्रेंस में से ही श्री रामगोपाल प्रसाद आजाद को गिरफ़्तार किया गया था । इसी कान्फ्रेंस में भाषण के संदर्भ में प्रान्तीय नौजवान भारत सभा के सभापति श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल को गिरफ़्तार करके मथुरा लाया गया और उन्हें दो वर्ष का सपरिश्रम कारावास दिया गया । सन् 1931 में ही वृन्दावन में कर्मवीर पं. सुन्दरलाल जी की अध्यक्षता में ज़िला बन्दी सम्मेलन बडे उत्साह से मनाया गया । इसमें ज़िले भर के स्वतंत्रता के वह सैनिक, जो कि आंदोलन में जेल गये थे, एकत्र हुए थे ।

सन् 1932 में मथुरा ज़िला

सन् 1932 को 4 जनवरी को महात्मा गांधी की गिरफ़्तारी के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम का फिर बिगुल मथुरा ज़िले में बज गया । 5 जनवरी सन् 1932 को दफा 144 को भंग करके मथुरा देशप्रेमियों ने गिरफ़्तारी को आवाहन किया । प्रभात फरी के अवसर पर सर्वप्रथम डा. श्री नाथ भार्गव फिर उंसी दिन श्री केदार नाथ भार्गव और मास्टर रामसिंह गिरफ़्तार कर लिए गये । उसी दिन शाम को श्री राधामोहन चतुर्वेदी को गिरफ़्तार किया गया । इस अवसर पर पुलिस ने भीषण लाठी चार्ज कर अनेकों को घायल कर दिया । इसके उपरांत ज़िले भर में गिरफ़्तारियों का तांता बंध गया । अनेक दिवसों के मनाने में गिरफ़्तारियाँ हुई । ‘गांधी दिवस’, ‘मोतीलाल दिवस’, ‘झंडा दिवस’, ‘शहीद दिवस’ आदि दिवसों के मनाने में देशभक्तों ने जेल जाना स्वीकार किया । पुलिस ने राष्द्रीय हलचलों के अनेक केन्द्र जैसे प्रेम महाविधालय वृन्दावन, मथुरा के सत्याग्रह आश्रम, राष्द्रीय महिला सेवा आश्रम आदि को जब्त कर लिया । उन दिनों देशभक्तों ने ख़तरा उठाकर साइक्लोस्टाइल द्वारा राष्द्रीय हलचल को गतिवान रखा । ज़िले भर में इस प्रकार का साहित्य में भेजा जाता था । प्रेम महाविधालय के अनेक छात्र एवं अध्यापक ज़िलों भर में छा गये और अन्त में गिरफ़्तार हो गये । काशी विधापीठ के अनेक छात्रों ने यहाँ आकर आंदोलन में भाग लिया और जेल गये जिनमें श्री कृष्ण शंकर श्रीवास्तव एवं श्री शिवबड़ाई सिंह प्रमुख थे ।


प्रेम महाविधालय के अध्यापक प्रो. कृष्ण चन्द्र, श्री नलिनी कान्त मुकर्जी, एवं आचार्य जुगूल किशोर ने जेल का आह्रान किया । जिन छात्रों ने इस आंदोलन में प्रमुख भाग लिया और जेल गये उनमें सर्वश्री अक्षयकुमार करण, रामनरायण मिश्र, हर प्रसाद मिश्र, शिवशंकर उपाध्याय, हज़ारीलाल, गुडप्पा, धर्मकिशोर, वसन्त चक्रवती, चन्द्र दत्त पांडे, सोहन लाल, बलवीर, श्रीमण्डल सिद्वनाथ, श्री अर्जुन, रामरक्ष पांडे आदि प्रमुख थे । बाबू नारायण दास बी.ए. एवं श्री गंगा प्रसाद भार्गव ने इस आन्दोलन को तीव्र बनाने का भगीरथ प्रयत्न किया । इरौली जुनारदार, कारव, सिहोरा, सरोठ, कुज्जेरा आदि गांवों के अनेक देशभक्त इस आन्दोलन में गिरफ़्तार हुए । गोवर्धन ,सादाबाद, कोसी, राया में भी गिरफ़्तारियाँ हुई । वृन्दावन में गोविन्द देव के परिसर में 5 जनवरी को होने वाली सभा के अवसर पर सर्वे श्री नलिनी कान्त मुकर्जी, विनोदी लाल गोस्वामी, देवदत्त शर्मा, कालीदास दत्त एवं विधालय के कुछ छात्र गिरफ़्तार किये गये । बाद में सर्वश्री पुरुषोत्तमलाल, ला. हरचरणलाल, डा. नित्याई चरणदास, वर्धाचरणदत्त, प्यारेलाल चक्की वाले, गणेशी लाल पांडे प्रभृति गिरफ़्तार हुए और जेल का दण्ड मिला ।

मथुरा जनपद में महिलाओं का योगदान

सन् 1932 के आन्दोलन की यह विशेषता रही कि मथुरा ज़िले से अनेक महिलाओं ने भी जेल जाना स्वीकार किया और अनेक कष्ट सहन किये । मथुरा नगर से सर्वश्रीमती प्रकाशवती, सौभाग्यवती, शान्ती देवी (ब्रह्राचारिणी) श्यामारानी, कलावती, राधादेवी, ब्रजेश्वरी देवी, माता गोदावरी देवी, भूप कुंवर, श्याम सुन्दरी भाटिया, सुखदावती आदि; वृन्दावन से श्रीमती शान्ति देवी (आचार्य जुगुल किशोर की पत्नी), श्रीमती शान्ति देवी (पत्नी प्रो. कृष्णचन्द्र), श्रीमती नारायण बाला और ग्रामीण क्षेत्र से सर्व श्रीमती चमेली देवी, खेम कुमारी, हरभंजी देवी, कटोरी देवी, लक्ष्मी देवी, मंगली देवी, राम प्यारी, भूदेवी, दुलारी देवी, ग्यासा, धनवीर, कलावती, रामदेवी, केशर कुअँर, विधादेवी, दर्शन कुमारी, भगवती देवी प्रभृति ने कारागार दण्ड को सहन किया ।


सन् 1932 में 23 अप्रैल को विदेशी सरकार द्वारा वर्जित कांग्रेस के दिल्ली अधिवेशन में भाग लेने के लिए जो देशभक्त यहाँ से दिल्ली गये थे और वहाँ गिरफ़्तार होने पर लगभग 1 मास जेल में रहे थे उनमें सर्वश्री गोपालदास सेठ, रामस्वरूप, हरिश्वन्द्र वैध(कोसी), फूलचन्द(कोसी), विश्वनाथ चतुर्वेदी एवं गुरुदेव स्वामी छत्तरसिंह, धर्मजीत (सोनई) आदि प्रमुख थे। सारांश में सन् 1932 के स्वतन्त्रता युद्व में सराहनीय योगदान दिया । सहस्त्रों की संख्या में गिरफ़्तारियाँ हुई । जेलों में भीषण यंत्रणाओं को देशभक्तों ने सहन किया । हथकडर, बेडी, और वेतों की सजाओं को सहन किया । बहुत से देशभक्तों ने आन्दोलन की अवधि में 2 या 3 बार जेल यात्राएँ की थी । जनवरी सन् 1932 से जनवरी सन् 1934 तक यह आन्दोलन चलता रहा । अन्त में हरिजन आन्दोलन में परिवर्तित हो गया । मथुरा जनपद के सेनानी उसी जोश के साथ महान सामाजिक सुधार के कार्यों में जुट गये । जातिबहिष्कार और रूढिवादी लोगों के द्वारा अपमानित होने की चिन्ता न करते हुए उन्होंने बडी निर्भीकता से महान समाजिक क्रान्ति में भाग लिया जिसका सूत्रपात इस युग के श्रेष्ठ मानव महात्मा गांधी ने किया था ।


सन् 1934 में केन्द्रीय असेम्बली के चुनाव के अवसर पर मथुरा ज़िले ने पं. ह्रदयनाथ कंजरू के विरूद्व कांग्रेसी उम्मेदवार श्री कृष्णदत्त पालीवाल को बहुमत से विजयी बनाकर महान स्वतन्त्रता सेनानी का सम्मान किया । सन् 1935 में श्रीमती उमा नेहरू की अध्यक्षता में सहपऊ में पाँचवों राजनीतिक कांफ्रेन्स धूमधाम से हुई । इसी वर्ष काँग्रेस की स्वर्णजयन्ती बडे उल्लास के साथ मनायी गयी । सन् 1937 में नये शासनविधान के अनुसार प्रान्तीय असेम्बिलियों का निर्वाचन हुआ । इसी सन्दर्भ में सरदार बल्लभभाई पटेल का मथुरा में आगमन हुआ । सन् 1939 में छठवीं ज़िला राजनीतिक सम्मेलन ग्राम कारब में हुआ । डा. अशरफ इसके सभापति थे । आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में गोवर्धन में आठवाँ ज़िला राजनीतिक सम्मेलन 28,29 और 30 नवम्बर को बडी धूमधाम से हुआ ।

व्यक्तिगत सत्याग्रह

सन् 1940-41 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी मथुरा ज़िला पीछे नहीं रहा । ज़िले भर में विभिन्न स्थानों पर देशभक्तों ने सत्याग्रह कर जेल को आह्रान किया । इस आन्दोलन का भाषण स्वातन्त्र्य मुख्य आधार रहा । सत्याग्रही को भाषण करने के पूर्व ज़िलाधीश को सूचित करना पडता था कि अमुक स्थान पर सत्याग्रह किया जायेगा । कभी-कभी तो निश्चित स्थान पर सत्याग्रह करने के पूर्व ही गिरफ़्तार कर लिया जाता था । ज़िले में इस प्रकार की अनेक घटनायें हुई । लगभग 300 देशभक्तों ने व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेकर जेल यातनाएँ सहन की थी । प्रायः सभी पुराने स्वतन्तत्रता सेनानियों ने पुनः जेल यात्राएँ की थी । मथुरा जेल से सेनानियों को प्रान्त की विभिन्न जेलों जैसे आगरा, लखनऊ, बरेली, फतेहगढ और चुनार कैम्प जेलों को भेज दिया गया था । मार्च सन् 1940 में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का अन्तिम आगमन हुआ । 4 मार्च सन् 1940 में उन्होंने वृन्दावन में कमला नेहरू पुस्तकालय का उद्घाटन किया था। सन् 1941 में वृन्दावन बम केस सम्बन्ध में सर्वश्री नन्दलाल झा (कुरसण्डा), ब्रह्रानन्द(वृन्दावन), मुरारीलाल (वृन्दावन) जो प्रेम महाविधालय के वर्कशाप में कार्य करते थे, गिरफ़्तार किया गया और सन् 1942 में इन्हें जेल की सजा दी गयी । लगभग 3 वर्ष ये जेल में रहे ।

भारत छोड़ो आन्दोलन मथुरा / Quit India movement Mathura

मथुरा में 'भारत छोडो’ आन्दोलन

अगस्त सन् 1942 का अग्रेजों ‘भारत छोडो’ आन्दोलन का विस्फोट मथुरा नगर में 9 अगस्त को आरम्भ हुआ । पहले यमुना नदी पर नाव में दाल बाटी का कार्यक्रम रखा गया था । जिसका मूल उद्देश्य क्रान्ति में कार्यक्रम को निर्धारित करना था लेकिन इसका पता पुलिस को लग गया । दाल बाटी के कार्यक्रम में सर्वश्री हकीम ब्रजलाल वर्मन, रामजीदास गुप्त, भजनलाल, स्वामी रघुवीर शरण, देवनायक हटीला, रामस्वरूप वर्मा, मुकुन्द लाल वर्मन आदि प्रमुख थे । पुलिस ने जब नाव का पीछा किया तो देशभक्तों ने गिरफ़्तार होना सामयिक नहीं समझा । इनका इरादा दूसरी पार नाव से उतर कर ज़िले भर में फैलकर आन्दोलन को गतिवान करना था । ऐसा ही इन्होंने किया । 9 अगस्त, 1942 को मथुरा ज़िले में सर्वप्रथम गिरफ़्तारी जोशी राधेश्याम जी की हुई । इन्हें नज़रबन्द कर दिया गया । इसके उपरान्त केदारनाथ भार्गव भी नज़रबन्द कर लिये गये । 9 अगस्त को जब बाज़ार में हड़ताल कराने राधामोहन चतुर्वेदी निकले तो वे गिरफ़्तार कर लिये गये । डा. श्रीनाथ भार्गव भी बन्दी बना लिये गये । इन दोंनों को भी नज़रबन्द बना लिया गया । मथुरा के छात्रों में भी नेताओं की गिरफ़्तारी पर बड़ा क्षोभ व्याप्त था । उन्होंने भी शिक्षण संस्थाओं को बन्द कराने और सरकारी संस्थानों पर धरना देने का निश्चय किया । 10 अगस्त को चम्पा अग्रवाल इण्टर कालेज से छात्रों का जुलूस आरम्भ हुआ । यह किशोरीरमण इण्टर कालेज के छात्रों को लेते हुए गवर्नमेण्ट हाईस्कूल की तरफ बढा । इस जुलूस का आकार विशाल बन गया था । गवर्नमेण्ट हाईस्कूल को बन्द कराने के प्रयत्न में पुलिस ने छात्रों के जुलूस पर लाठी वर्षा प्रारम्भ कर दी । अनेक घायल हो गये । सतीशचन्द्र वाजपेयी छात्र बुरी तरह घायल हुआ । पुलिस ने सतीश, दीनानाथ चतुर्वेदी और द्वारिका नाथ को गिरफ़्तार कर लिया लौटने पर सायंकाल छात्रों ने गांधी पार्क में एक सभा आयोजित करने का प्रयत्न किया लेकिन पुलिस ने सभा स्थल को घेर लिया और निर्ममता से उन्हें पीटा । यह दृश्य बड़ा ह्रदय विदारक था । रामशरण दास जौहरी भी पुलिस की मार से बुरी तरह घायल हुए थे । छात्रों के आन्दोलन से सूत्रधारों में सर्वश्री कैलाश पुष्प, वासुदेव चतुर्वेदी, कुन्दनलाल चतुर्वेदी एवं राधेश्याम चतुर्वेदी आदि भी प्रमुख थे ।

आन्दोलन में तीव्रता

दिन-प्रतिदिन आन्दोलन में तीव्रता आने लगी । कराहरी गाँव में 20 अगस्त को हकीम ब्रजलाल वर्मन एवं बाद को स्वामी रधुवीर शरण, 25 अगस्त को भगवानदत्त जी चतुर्वेदी को गिरफ़्तार कर नजरबन्द कर लिया गया । इसके पश्चात सर्वश्री देवनायक हटीला, लक्ष्मीरमण आचार्य, जगदीश्वर उपाध्याय, पृथ्वीनाथ चतुर्वेदी, सरन गोपाल, रामस्वरूप वर्मा, गौरीदत्त चतुर्वेदी, हरदेव सिंह, गोपालदास सेठ, सुन्दरश्याम चतुर्वेदी गिरफ़्तार कर लिये गये और इन्हें नज़रबन्द घोषित कर दिया गया । सर्वश्री ब्रजगोपाल भाटिया एवं डा. प्रमोदनाथ गोस्वामी को कुछ दिन नजरबन्द रखने के बाद मुक्त कर दिया गया । वृन्दावन के सर्वश्री प्रो. कृष्णचन्द्र, पुरुषोत्तमलाल बोहरे, गणेशीलाल पांडे, नलिनीकान्त मुकर्जी, हरचरण लाल, रणधीर बंसल की भी यही दशा हुई । गोवर्धन के सर्वश्री रामरतन सिंह, देवकीनन्दन, ब्रजेन्द्र केशोरैया को भी नजरबन्द कर लिया गया । ग्रामीण क्षेत्र के जो देशभक्त नजरबन्द कर लिये गये उनमें सर्वश्री तारासिंह (महोली), शिवलाल सिंह (भदार), बसन्तलाल (राया), मिहीदत्त (इरौली जुनारदार), सुनहरी लाल आजाद (सहपऊ), गेंदासिंह (चंदवारा), बुद्वी बाबा (गोपी का नगला), टीकाराम पुजारी (ऊँचागाँव रसमई), चौधरी दिगम्बर सिंह (कुरसण्डा), वीरीसिंह (हथकोली), चकलेश्वर सिंह (धनगांव) थे । ये विभिन्न समय में गिरफ़्तार हुए थे । आचार्य जुगलकिशोर एवं उनकी पत्नी श्रीमती शक्तिदेवी को दिल्ली में गिरफ़्तार कर लिया गया । चिन्तामणि शुक्ल को अगस्त क्रान्ति के 2 मास पूर्व ही आपत्तिजनक भाषण देने के अपराध में बुलन्दशहर में गिरफ़्तार कर लिया गया था । सन् 1942 की क्रान्ति में मथुरा नगर से सर्वश्री कैलाश पुष्प, छैलबिहारी, महेन्द्रनाथ उर्फ कमल बाबू, दीनानाथ चतुर्वेदी, विरजो पानवाला, रणछोरलाल पाठक आदि ने भी बन्दी जीवन व्यतीत किया था । नगर में विभिन्न बम विस्फोट होने के सन्देह में सर्वश्री शंकरलाल यादव, वैद्य कृष्णदास, शिवहरि गौर, श्रीनिवास फोटोग्राफर, मिहीलाल को पुलिस ने बड़ा तंग किया था । इन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया था और लगभग 2 मास बन्दी जीवन व्यतीत करना पडा था । बम केस के दौरान में सर्वश्री त्रिलोकीनाथ शर्मा, डा. प्रमथनाथ गोस्वामी, बाबू केशवदेव वकील, विश्वपाल शर्मा ने ब्रिटिश शासन की चिन्ता न करते हुए सफ़ाई पक्ष में गवाही देकर अपनी देशभक्ति का परिचय दिया था ।


जेल के विभिन्न भागों में तोड-फोड के कार्य सम्पन्न हुए । अनेक देशभक्तों की टोलियाँ इस कार्य में सचेष्ट हो गई थीं मांट क्षेत्र में इसी प्रकार की टोली के सदस्य पुलिस द्वारा गिरफ़्तार हुए । यह केस राया षडयंत्र केस के नाम से प्रसिद्व हुआ । इस टोली में प्रायः सभी विश्वविधालय के छात्र थे- सर्वश्री ओउम प्रकाश तिवारी, कुँअर बहादुर मिश्र, इन्द्र चन्द्र, नेकराम शर्मा, बंगाली मल अग्रवाल, रामबाबू, बाबूलाल आदि इसमें प्रमुख थे । इन सबको जेल का दण्ड मिला था । इन्द्रचन्द्र की मृत्यु तो जेल जीवन में ही हो गयी थी । कोसी कलां क्षेत्र में सरदार रणवीर सिंह ने तोड-फोड की योजना बनायी थी । इस योजना के अनुसार कोसी में थाना और बैंक पर अधिकार जमाना था । सर्वश्री भरत सिंह, हरिश्चन्द्र, बाबूलाल आदि इस योजना में सम्मिलित हुए थे लेकिन यह योजना सफल न हो सकी । मांट तहसील के क्षत्र में इरौली जुनारदार के देशभक्त सर्वश्री तुलसीराम, वेद राम, दुर्गा दत्त, घूरेलाल, चेतराम आदि ने क्रान्ति को गतिवान रखने का प्रयत्न किया । ये सब विभिन्न समय में गिरफ़्तार कर लिये गये और इन्हें जेल की सजा मिली । उन दिनों बाज़ार में हड़ताल करना भी अपराध था । हड़ताल करने के अपराध में सर्वश्री मदन गोपाल सौदागर, गोपाल प्रसाद सौदागर, छवीनाथ भार्गव आदि देशभक्तों को गिरफ़्तार किया गया और दण्डित किया गया । क्रान्तिकारी गतिविधियों का पता लगाने के सम्बन्ध में सर्वश्री गौरीदत्त चतुर्वेदी एवं हरदेव सिंह को पुलिस ने अमानुषिक एवं भीषण यंत्रणाएँ दी थी । 9 सितंबर को ‘क्रान्तिदिवस’ के जुलूस का नेतृत्व करते हुए श्री रामजी दास गुप्त, जो ज़िले के प्रथम डिक्टेटर थे, गिरफ़्तार हुए । उसी दिन सर्वश्री बलवीर सिंह बघेल और रामगोपाल शर्मा भी बन्दी बना लिए गये ।


14 अगस्त, 1942 को परखम में माल गाड़ी गिराने के अपराध में इस गांव में आतंक का राज्य स्थापित हो गया । पुलिस ने इस गांव पर मनमाने अत्याचार किये । गाड़ी गिरने की सूचना पाते ही ज़िला कलेक्टटर पुलिस और मिलिद्री लेकर आ गये । उनके पास बंदूक़ें ही नहीं अपितु मशीनगन भी थी । पूरा गांव उन्होंने घेर लिया और गांव की गलियों में फौजी जवान और पुलिस की गश्त होने लगी डर के कारण बच्चे और औरतें घरों में घुस गये । पुलिस वालों को जो कोई भी मिलता था उसे पकड लिया जाता था । उसे कलेक्टटर के सामने पेश कर दिया जाता था । वहाँ पर पुलिस के डंडों की मार और जूतों की मार से परखम के लोगों को निर्दयतापूर्वक सताया जाता था । भले-भले आदमियों की मूछें तक उखाडी गयीं इस प्रकार के अत्याचार कई दिन तक चलते रहे । लोग भूख के कारण व्याकुल हो रहे थे । वे गांव को छोडकर जंगलों में शरण लेने में ही कल्याण समझते थे । गांव सूना सा हो गया था । औरतों ने पुलिस से बचाने के लिए घर का सामान ज़मीन में गाड दिया था । इस प्रकार आतंक, लूट का दौर दौरा महीनों रहा । दो महीने बाद गांव वालों से 4000 रुपया लिया परखम के इस काण्ड के सम्बन्ध में जिन देशभक्तों को अनेक कष्टों का सामना करना पडा उनमें प्रमुख सर्वश्री मौजीराम, रूपराम, भूपालीराम, गोविन्दराम, गंजीराम, बतासीराम, हीरालाल, सुजानसिंह, कमलसिंह, भुल्लनसिंह, मिठ्ठनलाल, गंगाधर, ग्यासीराम, कुँजीलाल, देवपाल, होतीलाल, नानगराम, किशोरीलाल, श्रीपति, रामचरन, सूआसिंह, सुनपति आदि थे । इनमें से बहुतों को गिरफ़्तार किया गया था और अनेक दिन जेल में रहना पडा था । यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि सन् 1934 में प्रान्तीय हरिजन कार्यालय ग्राम परखम में खोला गया था जिसमें आचार्य जुगुल किशोर, स्वामी रघुवीर शरण, मास्टर रामसिंह ने खादी कार्य, सेवा समिति, औषधालय और पुस्तकालय की व्यवस्था भी थी और इस कार्य में अनेक सक्रिय कार्यकर्ता काम करते थे । इन्हीं कारणों से यह अधिकारियों की दृष्टि में खटकता था । तत्कालीन थानेदार फ़रह ने उक्त दफ़्तर में चोरी से आग लगवाई जिससे 10-15 हज़ार का सामान जल कर ख़ाक हो गया ।


सन् 1942 में विदेशी शासन को अपंग बनाने हेतु ध्वंसात्मक कार्य करने वाले देशभक्तों के दलों में श्री जगन प्रसाद अड़ींगवालों के दल ने भी क्रान्ति को प्रज्जवलित करने की चेष्टा की थी । इस दल में प्रारम्भ में सर्वश्री राधेश्याम चौधरी, शिवलालसिंह (भदार), पीताम्बर सिंह (नगला मोरा), ललित बिहारी (अड़ींग) किशनलाल (जखनगाँव) चौधरी भुल्लनसिंह (शाहपुर) प्रमुख थे । भरतपुर की मेनलाइन के तारों को काटने में दल सफल रहा । इस दल में आगे चलकर जैत के डा. श्यामलाल और डा. रामसिंह और उनके अन्य साथी भी सम्मिलित हो गये । इस दल की छटीकरा स्टेशन को अग्नि के भेंट करने की योजना क्रियान्वित न हो सकी । इस दल में सौंख स्थान नन्नू पट्टी में 300 के लगभग संख्या हो गई थी लेकिन वहां कोई क्रान्तिकारी घटना घटित नहीं हुइ । केवल तार काटने की घटनाएं अधिकांश में नहर और रेल की पटरियों पर इन लोगों के द्वारा होती रही । कोसी में इस दल के लोगों ने वहाँ के कुछ स्थानीय लोगों से सम्पर्क स्थापित किया । इनमें सर्वश्री रामस्वरूप वकील, लालाराम एवं बिहारीलाल जी से सहयोग प्राप्त हुआ । कोसी के थाने और स्टेशन को नष्ट करने की योजना इस दल ने बनायी थी । इस हेतु पास ही के गांव खटावटे में इस दल के लोग एकत्रित भी हुए थे जिनमें सरदार रणवीर सिंह, सर्वश्री जगन प्रसाद, रामस्वरूप वकील, ललित बिहारी, चौधरी शिवलाल, हरनरायण, कुन्दनसिंह, श्यामलाल पहलवान, डा. रामसिंह आदि प्रमुख थे । यहाँ पर सर्वश्री भरतसिंह (जाव), राधेलाल (सांचोली) भी सम्मिलित हो गये थे । अन्त में योजना सफल न हो सकी । श्री जगनप्रसाद जी के मकान को पुलिस ने दो तीन बार घेरा लेकिन आप बच गये । इन्हें कई बार खेतों पर सोना पडा । अन्त में मथुरा में साईकिल ठीक कराते समय गिरफ़्तार कर लिया गया और दण्डित किया गया ।

तरौली गोलीकाण्ड

तरौली के प्रमुख राष्द्रीय कार्यकर्ता मोहरसिंह सन् 1942 में बडे सक्रिय रहे थे । इन्हें गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस कटिबद्व थी । पुलिस ने श्री मोहर सिंह को गिरफ़्तार करने हेतु गांव वालों को बड़ा उत्पीडित किया था । श्री सालिगराम शर्मा अफसर दोयम पुलिस स्टेशन छाता जब इस गांव को आतंकित करने के लिए गये तब उसने अन्त में गोली चला दी जिससे खचेरा के गोली लगी जो बाद में अस्पताल में यह निकाली गयी पुलिस ने तरौली गांव के जिन लोगों गिरफ़्तार किया उनमें इस गांव के सर्वश्री हरिश्चन्द्र, सूरजसिंह, गिर्राज वैश्य, ओंकार वैश्य, कन्हैयालाल सुनार, रामजीत ठाकुर, घूरे जोगी, खचेरा सिंह, गनपत सिंह, ग्यासिया (पुत्र श्री निर्मल), और पसौली गांव के विरजू, अजय चन्द, सूखाराम, ग्यासिया आदि प्रमुख थे । इन सबों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया और उन्हें कई मास जेल में रहना पडा । घूरे जोगी की मृत्यु जेल में ही हुई थी । स्मरण रहे कि उन दिनों तरौली गांव में पुलिस द्वारा 50 हज़ार रुपये की लूट हुई और यहाँ के लोगों को अनेक प्रकार के कष्ट भोगने पडे । गोली काण्ड की घटना के कुछ दिनों पश्चात श्री मोहरसिंह की भी गिरफ़्तार कर लिया गया और 1 वर्ष की जेल और 50 रुपये जुर्माना का दण्ड मिला । मांट तहसील के अन्तर्गत कराहरी गांव के सर्वश्री सांमल सिंह, छिद्दालाल, बिहारीलाल सिंह और कुज्जीलाल को भी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण गिरफ़्तार किया गया था । इन्हें 18 फरवरी, 1943 को 2 वर्ष का जेल दण्ड दिया गया लेकिन कई दिन हवालात में रहने के बाद मुकद्दमा जीतने पर इन्हें मुक्त कर दिया गया । इस प्रकार मथुरा जनपद का ग्रामीण क्षेत्र एवं नगर ‘करो या मरो’ के क्रियान्वय में संलग्न रहा । मथुरा नगर के चम्पा अग्रवाल कालेज, किशोरीरमण इण्टरमीडिएट कालेज, पुरानी कोतवाली में बम विस्फोट की जो घटनाएं हुई थीं उनमें श्री गुरुदयाल सिंह (आगरा), श्री भगवत सिंह उर्फ चकलेश्वर (धनगांव), श्री टी.पी. नारायण पेशारोडी (एक केरल निवासी देशभक्त जो मथुरा रहते थे) एवं राम स्वरूप और पुरुषोत्तम आदि देशभक्त व्यक्तियों का विशेष सम्बन्ध था इन्होंने क्रान्ति को गतिवान रखने का प्रशंसनीय प्रयत्न किया था ।

वृन्दावन में 28 अगस्त का गोलीकाण्ड

सन् 1942 के अग्रेजों ‘भारत छाडो’ आन्दोलन के प्रारम्भ होने के साथ ही वृन्दावन में ‘करो मा मरो’ की उदात्त भावना से प्रेरित होकर यहाँ के युवक एवं देशभक्त मातृभूमि की स्वतंत्रता पर सर्वस्व अर्पण करने के लिए बेचैन हो गये अंगेज़ों के विदेशी शासन का उन्मूलन करने का जोश 28 अगस्त को चरम सीमा पर पहुँच गया । 27 अगस्त की रात्रि को यमुना के पुनीत जल के ऊपर नाव में 28 अगस्त की कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की हुई थी । इसी प्रकार की एक और कार्यकर्ताओं की गुप्त बैठक प्रो. कृष्णचन्द्र के तत्वावधान में हैजा अस्पताल में हुई थी । पूर्व निश्चित कार्यक्रम के अनुसार सर्वश्री अद्वैत कुमार गोस्वामी, हेमन्त कुमार, प्रकाशचन्द्र भार्गव, रमेशचन्द्र शर्मा आदि लड़कियों के सरकारी स्कूल में 28 अगस्त को हड़ताल कराने के लिए रवाना हो गये । यहाँ की प्रधानाध्यापिका ने हड़ताल करना स्वीकार नहीं किया तब उपस्थित जनता में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और वह स्कूल बन्द करने के लिए कटिबद्व हो गयी । इतने में ही श्री लाल सिंह दरोगा सदल बल वहाँ पहँच गया और उसने सर्वश्री अद्वैतकुमार गोस्वामी, हेमन्त कुमार प्रकाशचन्द्र एवं नन्द कुमार जैसे जोशीले युवको को गिरफ़्तार कर लिया । इन्हें हवालात में बन्द कर दिया गया ।इस घटना से वृन्दावन में रोष का वातावरण व्याप्त हो गया । श्री राधो गोस्वामी ने अपने घर से झंडा और घंटा लिया, साथ में लक्ष्मण युवक को भी ले लिया और अब ये दोनों बाज़ार में हड़ताल करने निकल पडे । इनके प्रयत्न से बाज़ार शीघ्रता से बन्द हो गया । बाज़ार में हड़ताल करके जनता सहस्त्रों की संख्या में चुंगी के चौराहे पर पहँच गयी । मथुरा से वृन्दावन का सम्बन्ध विच्छेद कर उत्तेजित देशभक्तों का इरादा थाने पर अधिकार कर गिरफ़्तार युवकों को मुक्त करना था अतएव तत्कालीन ई.ओ. श्री रणधीर सिंह बंसल से उन्होंने कुदाल, फावडे लिये और मथुरा रोड वाली पुलिया को कुछ नष्ट कर दिया और सडक भी खोद डाली । इस कार्य में श्री कृष्णचरण उर्फ कल्लो गोस्वामी ने प्रमुख भाग लिया । सर्वश्री रामू गैस वाले, शिवचरण एवं सुवराती मिस्त्री ने हैजा अस्पताल के पास टेलीफ़ोन वाला तार भी काट डाला । इस दिन तोड-फोड के कार्यो में विशेष योगदान देने वाले अन्य युवकों में सर्वश्री मदनमोहन भटनागर, मेंडूलाल, रामकुमार शर्मा, लक्ष्मणदत्त दुबे, बांकेलाल टालवाला, किशनलाल गुप्त, मदनमोहन गुप्त, जगदीशचन्द्र उपाध्याय, चीर बिहारी, नारायण प्रसाद शर्मा, खेमचन्द स्वामी, ललित कुमार शर्मा, दानबिहारी शुक्ल, राजबिहारी कुलश्रेष्ठ, श्यामबिहारी लाल, लक्ष्मण प्रसाद, गोविन्द बल्लभ गोस्वामी राधामोहनदास, अतुल कृष्ण गोस्वामी, विश्वम्भरदयाल गोस्वामी, चैतन्य कुमार गोस्वामी, नीलमणि गोस्वामी, चीर बिहारी, परमानन्द, रमेशचन्द्र शर्मा के नाम विशेष उल्लखनीय है । क्रांन्ति के प्रारम्भ से ही ये युवक सक्रिय हो गये थे । अंत में वीर युवक लक्ष्मण के नेतृत्व, में जिसके हाथ में, तिरंगा झंडा था जन समुदाय थाने की ओर बढा ।


थानेदार लालसिंह ने स्थिति को गंभीर समझ कर देशभक्तों की भीड़पर गोली चलाने का आख़िर आदेश दे दिया । पहले तो उत्तेजित जनता को भयभीत करने के लिए हवाई फायर किये गये लेकिन जब इसका कोई परिणाम न निकला तो मथुरा से आई हुई पुलिस की गारद के ईट और पत्थरों से रक्तरंजित अब्दुल रज़्ज़ाक़ नामक सिपाही ने फायरिंग करने का आदेश मांगा । आदेश मिलने पर उसने घातक फायरिंग करना आरम्भ कर दिया । थाने की ओर से आने वाली गोलियों और छर्रो की बौछार से कई लोग घायल हुए लेकिन पिस्तौल की एक गोली जो वीर युवक लक्ष्मण पेट के में लगी और दूसरे सीधे पैर की जांघ में लगी । वीर लक्ष्मण मातृभूमि की स्वतंत्रता हेतु शहीद हो गया । श्री बुद्वूलाल उर्फ बुद्वू साहस करके लक्ष्मण को अस्पताल ले जाने के लिए एक खाट भी लाये और अस्पताल पहँचाया लेकिन वह तो अमरता प्राप्त कर चुका था । शहीद लक्ष्मण राजस्थान की वीरभूमि से प्रारम्भ में गोवर्धन आकर रहे थे । वहीं पर स्वतंत्रता युद्वों की गतिविधियों में भाग लेना उसने प्रारंभ किया था । सन् 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उसने प्रारंभ किया था । सन् 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उसे जेल का दण्ड भी मिला था । जेल से मुक्त होने पर वृन्दावन में राष्द्रीय हलचलों में भाग लेते हुए 28 अगस्त को वह शहीद हो गया । पुलिस की गोली और छर्रो से अनेक लोग घायल हुए । इनमें सर्वश्री गोपीनाथ शर्मा, नारायण प्रसाद शर्मा, राधामोहनदास और नन्द कुमार शुक्ल प्रमुख थे । श्री नन्दकुमार शुक्ल टखने में गोली लगने के कारण सदैव के लिए लंगडे हो गये । सर्वश्री नारायण प्रसाद शर्मा और राधामोहनदास के शरीर के छर्रो को बडी कठिनाई से बाद में निकाला गया । उसी दिन पुलिस की भयानक मार से मूला नामक धोबी सदैव के लिए अपंग हो गया । अत्याचारी पुलिस ने उसी दिन छोटे नत्थो सर्राफ को भी बडी निर्ममता के साथ मारा था । श्री दाऊदयाल पंडा के हस्तक्षेप के कारण इनकी जान बची थी । गोलीकाण्ड के पश्चात वृन्दावन में पुलिस का आतंक छा गया । सम्पूर्ण नगर में सत्राटा था । सब लोग भयभीत थे । पुलिस ने अनेक लोगों को गिरफ़्तार भी किया । इनमें सर्वश्री फ़तेहबहादुर, मूलचन्द, सच्चिदानन्द, राधो गोस्वामी, नारायण लाल, परमानन्द, गोपीनाथ शर्मा, छोटे नत्थो सर्राफ, बिहारीलाल उर्फ बिहारी, श्रीगोविंद, रामजी लाल, प्यारेलाल, लक्ष्मीनारायण, शिवचरण, प्रभातीलाल, श्यामसुन्दर, राधारमण, श्रीनाथ उर्फ सीनो, गेंदालाल, दम्भो सरदार, सीताराम, नन्दकुमार शुक्ल एवं हरिशंकर प्रमुख थे । इन पर 147, 215 और 436 दफायें लगायी गयी थी । इण्डियन टेलीग्राफ एक्ट की धारा 352 (आई.पी.सी.) के अन्तर्गत 25 वीं उपधारा और डिफेन्स आँफ इण्डिया एक्ट की 141 वीं ( आई.पी.सी.) की 35वीं और 36वीं धारायें भी इन पर लगायी गयी थी । इन देशभक्तों का मुक़दमा श्री पद्मादत्त पांडे की अदालत में हुआ । 14 दिसम्बर सन् 1942 को इस मुकदमे का निर्णय हुआ । सर्वश्री मूलचन्द, सच्चिदानन्द, नारायणलाल, परमानन्द, गोपीनाथ, नत्थोमल, गोविन्द, रामजीलाल, शिवचरण, श्यामसुन्दर, राधारमण,गेंदालाल, सीताराम, नन्दकुमार शुक्ल, हरीशंकर मुक्त कर दिये गये । शेष को लगभग 3 वर्ष की जेल की सजा दी गयी । मुकदमे के दौरान राधारमण के श्री गोपीलाल गोस्वामी वकील ने निर्भीक होकर अदालत में शहादत दी थी । गोलीकाण्ड के सन्दर्भ में गुलाब ठाकुर और श्रीसुमन (गोस्वामी संकर्षण) को भी गिरफ़्तार किया गया था लेकिन कुछ दिनों बाद छोड दिया गया ।


सन् 1942 में क्रान्ति के दिनो में वृन्दावन वासियों को ओर कष्ट के दिन व्यतीत करने पडे । पुलिस के द्वारा अन्धाधुन्ध जुर्माना वसूल करना, युद्व के लिए निर्ममता से चन्दा वसूल करना और मलेरिया की भयंकरता आदि से वृन्दावन का नागरिक जीवन ग्रस्त हो उठा था । वृन्दावन की जनता से मनमाना वसूल किया हुआ । धन जिसका लेखा मिलता है 30 हज़ार रुपया आंका गया है लेकिन जनता का अनुमान है कि लगभग 1 लाख रुपया वसूल किया गया था । भयभीत जनता को रसीद तक नहीं दी जाती थी । अनेको वृन्दावन वासियों को उन दिनों वृन्दावन छोडना पडा था । पुलिस ने जबर्दस्ती सभ्रान्त लोगों तक से पहरा लगवाया था । बहुतों के नाम वारण्ट थे । वे फरारी अवस्था में भारत के विभिन्न भागों में पहँचे थे । इन नागरिकों को बाहर अनेक कष्टों के दिन व्यतीत करने पडे । गोलीकाण्ड के सम्बन्ध में केवल सन् 1942 में ही गिरफ़्तारियाँ नहीं हुई लेकिन सन् 1945 तक यह सिलसिला चलता रहा । सन् 1945 में वृन्दावन गोलीकाण्ड के द्वितीय केस के संदर्भ में सर्वश्री गिर्राजप्रसाद धवल, नरसिंहाचार्य, धरनीधर, यशोदानंदन, गंगाविष्णु, कन्हैयालाल और बोहरे गोपालप्रसाद को गिरफ़्तार किया गया । 13 अगस्त, 1945 को इन्हें 3 वर्ष की जेल का श्रीनियाज अहमद सेशन जज द्वारा दण्ड मिला था । ये देशभक्त 28 अप्रैल, 1946 में जेल से मुक्त हुए । इन्हें 147, 149, 332 आदि धाराओं के अन्तर्गत सजा मिली थी । सन् 1942 की क्रान्ति के दिनों में अनेक देशभक्त फरार क्रान्तिकारी देशभक्त जैसे बाबा राघवदास श्रीमती अरुणा, आसफ अली, श्रीमती सुचेता कृपलानी आदि ने मथुरा और वृन्दावन में भूमिगत रहकर क्रान्ति का संचालन किया था । सन् 1942 का ‘भारत छोडो’ आन्दोलन या क्रान्ति मथुरा ज़िले का अन्तिम स्वातन्त्र्य युद्व था और यह सन् 1945 तक चलता रहा । मथुरा ज़िला इनकी सेवाओं को कभी भूल नहीं सकता । इसके उपरान्त मथुरा ज़िले ने 15 अगस्त 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्ति के स्वर्णिम दिवस को बडे उल्लास और प्रसन्नता से मनाया । यहाँ के स्वातन्त्र्य युद्वों के सेनानियों ने अपने जीवनकाल में ही सहस्त्रों वर्षो की मातृभूमि की दासता का अन्त देखकर अपने जीवन को सार्थक समझा।

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