जैन दर्शन में अध्यात्म

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जैन दर्शन में अध्यात्म

विषय सूची

'अध्यात्म' शब्द अधि+आत्म –इन दो शब्दों से बना है, जिसका अर्थ है कि आत्मा को आधार बनाकर चिन्तन या कथन हो, वह अध्यात्म है। यह इसका व्युत्पत्ति अर्थ हे। यह जगत जैन दर्शन के अनुसार छह द्रव्यों के समुदायात्मक है। वे छह द्रव्य हैं-

  1. जीव,
  2. पुद्गल,
  3. धर्म,
  4. अधर्म,
  5. आकाश और
  6. काल।
  1. उपादान और
  2. निमित्त।

यं करोति भावमात्मा कर्त्ता सो भवति तस्य भावस्य।
ज्ञानिनस्तुज्ञानमयोऽज्ञानमयोऽज्ञानिन:॥ -संस्कृत छाया,126॥

अर्थात जो आत्मा जिस समय जिस भाव को करता है उस समय उस भाव का कर्त्ता वही है। ज्ञानी का भाव ज्ञानमय होता है और अज्ञानी का भाव अज्ञानमय होता है।

ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ता: सर्वे भावा भवन्ति हि।
सर्वेऽप्यज्ञाननिर्वृत्ता भवन्त्यज्ञानिनस्तु ते॥67॥

य: परिणमति स कर्ता य: परिणामो भवेत्तु तत् कर्म।
या परिणति: क्रिया सा त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया ॥51॥

एक: परिणमति सदा परिणामो जायते ते सदैकस्य।
एकस्य परिणति: स्यात् अनेकमप्येकमेव यत: ॥52॥

आसंसारत एव धावति परं कुर्वेऽहमित्युच्चकै:
दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहङ्काररूपं तम:।
तद्भूतार्थपरिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजेत्
तत् किं ज्ञानधनस्य बंधनमहो भूयो भवेदात्मन:॥55॥

आत्मभावान् करोत्यात्मा परभावान् सदा पर:।
आत्मैव ह्यात्मनो भावा: परस्य पर एव ते॥56॥

जैन कर्म सिद्धान्त : नामकर्म के विशेष सन्दर्भ में

जैन कर्म सिद्धान्त इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके माध्यम से ईश्वरादि परकर्तृत्व या सृष्टकिर्तृत्व के भ्रम को तोड़कर प्रत्येक प्राणी को अपने पुरुषार्थ द्वारा उस अनन्त चतुष्टय (अनन्त-दर्शन, अनन्त-ज्ञान, अनन्त-बल और अनन्त-वीर्य) की प्राप्ति का मार्ग सहज और प्रशस्त किया है। वस्तुत: प्रत्येक प्राणी अपने भाग्य का स्वयं सष्टा, स्वर्ग-नरक का निर्माता और स्वयं ही बंधन और मोक्ष को प्राप्त करने वाला है। इसमें ईश्वर आदि किसी अन्य माध्यम को बीच में लाकर उसे कर्तृत्व मानना घोर मिथ्यात्व बतलाया गया है। इसीलिए 'बुज्झिज्जत्ति उट्टिज्जा बंधणं परिजाणिया'- आगम का यह वाक्य स्मरणीय है जिसमें कहा गया है कि बंधन को समझो और तोड़ों, तुम्हारी अनन्तशक्ति के समक्ष बन्धन की कोई हस्ती नहीं है।

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् विमुज्यते॥

स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभम्।
परेणदत्तं यदि लभ्यते स्फुटं, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा॥
निजार्जितं कर्म विहाय देहिनो, न कोऽपि कस्यापि ददाति किंचन।
विचारयन्नेवमनन्य मानस: परो ददातीति विमुच्य शेमुषीम्॥

  1. कर्मों में ज्ञान आदि गुणों को घातने, सुख-दु:खादि देने का स्वभाव पड़ना प्रकृतिबंध है।
  2. कर्म बंधने पर जितने समय तक आत्मा के साथ बद्ध रहेंगे, उस समय की मर्यादा का नाम स्थितिबंध है।
  3. कर्म तीव्र या मन्द जैसा फल दे उस फलदान की शक्ति का पड़ना अनुभागबन्ध है।
  4. कर्म परमाणुओं की संख्या के परिणाम को प्रदेशबंध कहते हैं।

नामकर्म का स्वरूप

नामकर्म के विशेष विवेचन के पूर्व सर्वप्रथम उसका स्वरूप जान लेना भी आवश्यक है।

कम्मं णामसमक्खं सभावमध अप्पणो सहावेण।
अभिभूय णरं तिरियं णेरइयं वासुरं कुणदि ॥ प्रवचनसार 117॥

नामकर्म और उसकी प्रकृतियाँ

  1. गति नामकर्म-गति, भव, संसार— ये पर्यायवाची शब्द है*। जिसके उदय से आत्मा भवान्तर को गमन करता है वह गति नामकर्म है। यदि वह कर्म न हो तो जीव गति रहित हो जायेगा। इसी गति नामकर्म के उदय से जीव में रहने से आयु कर्म की स्थिति रहती है और शरीर आदि कर्म उदय को प्राप्त होते हैं। नरक, तिर्यच, मनुष्य और देवगति – ये इसके चार भेद हैं। जिन कर्मस्कन्धों के उदय से आत्मा को नरक, तिर्यच आदि भव प्राप्त होते हैं, उनसे युक्त जीवों को उन-उन गतियों में नरक-गति, तिर्यकगति आदि संज्ञायें प्राप्त होती हैं।
  2. जाति नामकर्म— जिन कर्मस्कन्धों से सदृशता प्राप्त होती है, जीवां के उस सदृश परिणाम को जाति कहते हैं* अर्थात उन गतियों में अत्यभिचारी सादृश से एकीभूत स्वभाव (एकरूपका) का नाम जाति है। यदि जाति नामकर्म न हो तो खटमल-खटमल के समान, बिच्छू-बिच्छू के समान इसी प्रकार अन्य सभी सामान्यत: एक जैसे नहीं हो सकते। जाति के पांच भेद हैं- एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय। इनके लक्षण इस प्रकार हैं – जिसके उदय से जीव एकेन्द्रिय जाति में पैदा हो अर्थात एकेन्द्रिय शरीर धारण करे उसे एकेन्द्रिय जाति नामकर्म कहते हैं। इसी प्रकार द्वीन्द्रियादि का स्वरूप बनता है।
  3. शरीरनामकर्म— जिसके उदय से आत्मा के लिए शरीर की रचना होती है वह शरीर नामकर्म है। यह कर्म आत्मा को आधार या आश्रय प्रदान करता है। क्योंकि कहा है कि 'यदि शरीर-नामकर्म न स्यादात्मा विमुक्त: स्यात्* अर्थात यदि यह कर्म न हो तो आत्मा मुक्त हो जाय। इसके भी पांच भेद हैं – औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तेजस और कार्माण शरीर। जिसके उदय से जीव के द्वारा ग्रहण किये गये आहार वर्गणा रूप पुद्गलस्कन्ध रस, रुधिर, मांस, अस्थि, मज्जा और शुक्र स्वभाव से परिणत होकर औदारिक शरीर रूप हो जाते हैं उसका नाम औदारिक शरीर है। इसी प्रकार अन्य भेदों का स्वरूप बनता है*
  4. बन्धन नामकर्म— शरीर नामकर्म के उदय से जो आहार-वर्गणारूप पुद्गल-स्कन्ध ग्रहण किये उन पुद्गलस्कन्धों का परस्पर संश्लेष सम्बन्ध जिस कर्म के उदय से हो उसे बंधन-नामकर्म कहते हैं। यदि यह कर्म न हो तो यह शरीर बालू द्वारा बनाये हुए पुरुष के शरीर की तरह हो जाय। इसके भी औदारिक, वैक्रियिक शरीर, बन्धन आदि पांच भेद हैं*
  5. संघात नामकर्म— जिसके उदय से औदारिक शरीर, छिद्र रहित परस्पर प्रदेशों का एक क्षेत्रावगाह रूप एकत्व प्राप्त हो उसे संघात नामकर्म कहते हैं* इसके भी औदारिक-शरीर संघात आदि पांच भेद हैं।
  6. संस्थान नामकर्म— जिसके उदय से औदारिक आदि शरीर के आकार की रचना हो वह संस्थान नामकर्म है। इसके छह भेद हैं- समचतुरस्त्र, न्यग्रोधपरिमण्डल, स्वाति कुष्जक, वामन और हुंडक (विषम आकार) संस्थान।
  7. संहनन नामकर्म— जिसके उदय से हड्डियों की संधि में बंधन विशेष होता है वह संहनन नामकर्म है। इसके छह भेद हैं। 1.वज्रर्षभनाराच, 2.वज्रनाराच, 3. नाराच, 4.अर्द्धनाराच, 5.कीलक और 6. असंप्राप्तासृपाटिका संहनन*
  8. अंगोपांग नामकर्म— जिस कर्म के उदय से अंग और उपांगों की स्पष्ट रचना हो वह अंगोपांग नामकर्म हैं इसके तीन भेद हैं- औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर, अंगोपांग*
  9. वर्ण नामकर्म— जिस कर्म के उदय से शरीर में कृष्ण, नील, रक्त, हरित और शुक्ल – ये वर्ण (रंग या रूप) उत्पन्न हों वह वर्ण नामकर्म है। इन 5 वर्णों से ही इसके पांच भेद बनते हैं। जिस कर्म के उदय से शरीर के पुद्गलों में कृष्णता प्राप्त होती है वह कृष्णवर्ण नामकर्म है। इसी तरह अन्य हैं*
  10. रस नामकर्म— इसके उदय से शरीर में जाति के अनुसार जैसे नीबू, नीम आदि में प्रतिनियत तिक्त, कटुक, कषाय, अम्ल और मधुर रस उत्पन्न होते हैं। यही इस नामकर्म के पांच भेद हैं।
  11. गन्ध नामकर्म— जिसके उदय से जीव के शरीर में उसकी जाति के अनुसार गन्ध उत्पन्न हो वह गन्ध नामकर्म है। इसके दो भेद हैं- सुगन्ध और दुर्गन्ध।
  12. स्पर्श नामकर्म— जिस कर्मस्कन्ध के उदय से जीव के शरीर में उसकी जाति के अनुरूप स्पर्श उत्पन्न हो। जैसे सभी उत्पल, कमल आदि में प्रतिनियत स्पर्श देखा जाता है। इसके आठ भेद हैं- कर्कश, मृदु, गुरु, लघु, स्निग्ध, सूक्ष, शीत और उष्ण।
  13. आनुपूर्वी नामकर्म— जिस कर्म के उदय से विग्रहगति में पूर्वशरीर (मरण से पहले के शरीर) का आकार रहे उसका नाम आनुपूर्वी है। इस कर्म का अभाव नहीं कहा जा सकता क्योंकि विग्रहगति में उस अवस्था के लिए निश्चित आकार उपलब्ध होता है और उत्तम शरीर ग्रहण करने के प्रति गमन की उपलब्धि भी पायी जाती है। इसके चार भेद हैं- नरकगति प्रायोग्यानुपूर्व्य, तिर्यग्गति., मनुष्यगति., देवगतिंप्रायोग्यानुपूर्व।
  14. अगुरुलघु नामकर्म— जिसके उदय से यह जीव अनन्तानन्त पुद्गलों से पूर्ण होकर भी लोहपिण्ड की तरह गुरु (भारी) होकर न तो नीचे गिरे और रुई के समान हल्का होकर ऊपर भी न जाय उसे अगुरुलघु नामकर्म कहते हैं।
  15. उपघात नामकर्म— 'उपेत्य घात: उपघात:' अर्थात पास आकर घात होना उपघात है। जिस कर्म के उदय से अपने द्वारा ही किये गये गलपाश आदि बंधन और पर्वत से गिराना आदि निमित्तों से अपना घात हो जाता है वह उपघात नामकर्म है। अथवा जो कर्म जीवको अपने ही पीड़ा में कारणभूत बड़े-बड़े सींग, उदर आदि अवयवों को रचना है वह उपघात है।
  16. परघात नामकर्म— जिसके उदय से दूसरे का घात करने वाले अंगोपांग हो उसे परघात नामकर्म कहते हैं। जैसे बिच्छू की पूंछ आदि।
  17. उच्छ्रवास— जिसके उदय से जीव को श्वासोच्छवास हो।
  18. आतप— जिसके उदय से जीव का शरीर आतप अर्थात् उसमें अन्य को संतप्त करने वाला प्रकाश उत्पन्न होता है वह आतप है। जैसे सूर्य आदि में होने वाले पृथ्वी कायिक आदि में ऐसा तापकारी प्रकाश दिखता है।
  19. उद्योत— जिसके उदय से जीव के शरीर में उद्योत (शीतलता देने वाला प्रकाश) उत्पन्न होता है वह उद्योत नामकर्म है। जैसे चन्द्रमा, नक्षत्र, विमानों और जुगनू आदि जीवों के शरीरों में उद्योत होता है।
  20. विहायोगति— जिसके उदय से आकाश में गमन हो उसे विहायोगति नामकर्म कहते हैं। इसके प्रशस्त और अप्रशस्त ये दो भेद हैं।
  21. त्रस नामकर्म— जिसके उदय से द्वीन्द्रियादिक जीवों में उत्पन्न हो, उसे त्रस नामकर्म कहते हैं।
  22. स्थावर (स्थूल)- जिसके उदय से एकेन्द्रिय जीवों (स्थावर कायों) में उत्पन्न हो वह स्थावर नामकर्म है।
  23. बादर (स्थूल)— जिसके उदय से दूसरे को रोकने वाला तथा दूसरे से रुकने वाला स्थूल शरीर प्राप्त हो उसे बादर शरीर नामकर्म कहते हैं।
  24. सूक्ष्म नामकर्म— जिसके उदय से ऐसा शरीर प्राप्त हो, जो न किसी को रोक सकता हो और न किसी से रोका जा सकता हो, उसे सूक्ष्म शरीर नामकर्म कहते हैं।
  25. पर्याप्ति— जिसके उदय से आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन-इन छह पर्याप्तियों की रचना होती है वह पर्याप्ति नामकर्म है। ये ही इसके छह भेद हैं।
  26. अपर्याप्ति— उपर्युक्त पर्याप्तियों की पूर्णता का न होना अपर्याप्ति है।
  27. प्रत्येक शरीर नामकर्म— जिसके उदय से एक शरीर का एक ही जीव स्वामी हो उसे प्रत्येक शरीर नामकर्म कहते हैं।
  28. साधारण शरीर नामकर्म— जिसके उदय से एक शरीर के अनेक जीव स्वामी हों, उसे साधारण-शरीर नामकर्म कहते हैं।
  29. स्थिर नामकर्म— जिस कर्म के उदय से शरीर की धातुएं (रस, रुधिर, मांस, मेद, मज्जा, हड्डी और शुक्र) इन सात धातुओं की स्थिरता होती है वह स्थिर नामकर्म है।
  30. अस्थिर— जिसके उदय से इन धातुओं में उत्तरोत्तर अस्थिर रूप परिणमन होता जाता है वह अस्थिर नामकर्म है।
  31. शुभनामकर्म— जिसके उदय से शरीर के अंगों और उपांगों में रमणीयता (सुन्दरता) आती है वह शुभ नामकर्म है।
  32. अशुभनामकर्म— जिसके उदय से शरीर के अवयव अमनोज्ञ हों उसे अशुभनाम कर्म कहते हैं।
  33. सुभग,
  34. दुर्भगनामकर्म— जिसके उदय से स्त्री-पुरुष या अन्य जीवों में परस्पर प्रीति उत्पन्न हो उसे सुभग नामकर्म तथा रूपादि गुणों से युक्त होते हुए भी लोगों के जिसके उदय से अप्रीतिकार प्रतीत होता है उसे दुर्भग नामकर्म कहते हैं।
  35. आदेय,
  36. अनादेय नामकर्म— जिसके उदय से आदेय-प्रभा सहित शरीर हो वह आदेय तथा निष्प्रभ शरीर हो वह अनादेय नामकर्म है।
  37. सुस्वर,
  38. दुस्वर नामकर्म- जिसके उदय से शोभन (मधुर) स्वर हो वह सुस्वर तथा अमनोज्ञ स्वर होता है वह दु:स्वर नामकर्म है।
  39. यश:कीर्ति,
  40. अयश:कीर्ति नामकर्म— जिसके उदय से जीव की प्रशंसा हो वह यश:कीर्ति तथा निप्दा हो वह अयश: कीर्ति नामकर्म है।
  41. निमान (निर्माण) नामकर्म— निश्चित मान (माप) को निमान कहते हैं। इसके दो भेद हैं – प्रमाण और स्थान। जिस कर्म के उदय से अंगोपांगों की रचना यथाप्रमाण और यथास्थान हो उसे निमान या निर्माण नामकर्म कहते हैं।
  42. तीर्थंकर नामकर्म— जिस कर्म के उदय से तीन लोकों में पूज्य परम आर्हन्त्य पद प्राप्त होता है वह परमोत्कृष्ट तीर्थंकर नामकर्म है।

इस प्रकार ये नामकर्म की 42 पिण्ड प्रकृतियाँ हैं। इन्हीं में एक-एक की अपेक्षा इनके 93 भेद हैं। इनमें अन्तिम तीर्थंकर नामकर्म का आस्त्रव दर्शनविशुद्धि आदि सोलहकारण भावनाओं का विधान है। यद्यपि ये एक साथ सभी सोलह भावनायें आवश्यक नहीं है। किन्तु एक दर्शनविशुद्धि अति आवश्यक होती है। दो से लेकर सोलह कारणों के विकास से भी तीर्थंकर नामकर्म का बंध होता है।

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