तीर्थंकर उपदेश

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विषय सूची

तीर्थंकर-उपदेश : द्वादशांगश्रुत

  1. आचारांग,
  2. सूत्रकृतांग,
  3. स्थानांग,
  4. समवायांग,
  5. व्याख्याप्रज्ञप्ति,
  6. ज्ञातृधर्मकथा,
  7. उपासकाध्ययन,
  8. अंत:कृत्दशांग,
  9. अनुत्तरौपपादिकदशांग,
  10. प्रश्नव्याकरण,
  11. विपाकसूत्र और
  12. दृष्टिवाद।
  1. परिकर्म,
  2. सूत्र,
  3. प्रथमानुयोग,
  4. पूर्वगत और
  5. चूलिका।
  1. चन्द्रप्रज्ञप्ति,
  2. सूर्यप्रज्ञप्ति,
  3. जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति,
  4. द्वीपसागरप्रज्ञप्ति, और
  5. व्याख्याप्रज्ञप्ति (यह 5वें अंग व्याख्याप्रज्ञप्ति से भिन्न है)।
  1. उत्पाद,
  2. आग्रायणीय,
  3. वीर्यानुवाद,
  4. अस्तिनास्तिप्रवाद,
  5. ज्ञानप्रवाद,
  6. सत्यप्रवाद,
  7. आत्मप्रवाद,
  8. कर्मप्रवाद,
  9. प्रत्याख्यान प्रवाद,
  10. विद्यानुवाद,
  11. कल्याणवाद,
  12. प्राणावाय,
  13. क्रियाविशाल और
  14. लोकबिन्दुसार।
  1. जलगता,
  2. स्थलगता,
  3. मायागता,
  4. रूपगता और
  5. आकाशगता।
  1. सामायिक,
  2. चतुर्विंशतिस्तव,
  3. वंदना,
  4. प्रतिक्रमण,
  5. वैनयिक,
  6. कृतिकर्म,
  7. दशवैकालिक,
  8. उत्तराध्ययन,
  9. कल्पव्यवहार,
  10. कल्पाकल्प्य,
  11. महाकल्प,
  12. पुण्डरीक,
  13. महापुण्डरीक और
  14. निषिद्धिका।

उपलब्ध श्रुत

धर्म, दर्शन और न्याय

इन तीनों के पार्थक्य को समझने के लिए हम यहाँ एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। सब जीवों पर दया करो, किसी जीव की हिंसा न करो अथवा सत्य बोलो, असत्य मत बोलो आदि विधि और निषेधरूप आचार का नाम धर्म है। जब इसमें क्यों का सवाल उठता है तो उसके समर्थन में कहा जाता है कि जीवों पर दया करना कर्तव्य है, गुण (अच्छ) है, पुण्य है और इससे सुख मिलता है। किन्तु जीवों की हिंसा करना अकर्तव्य है, दोष है, पाप है और उससे दु:ख मिलता है। इसी तरह सत्य बोलना कर्तव्य है, गुण है, पुण्य है और उससे सुख मिलता है।

टीका टिप्पणी

  1. ऋषभादिमहावीरान्तेभ्य: स्वात्मोपलब्धये।
    धर्मतीर्थंकरेभ्योऽस्तु स्याद्वादिभ्यो नमोनम:॥ अकलंक, लघीयस्त्रय, 1

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