भारत छोड़ो आन्दोलन मथुरा

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भारत छोड़ो आन्दोलन मथुरा / Quit India movement Mathura

मथुरा में 'भारत छोडो’ आन्दोलन

विषय सूची

अगस्त सन् 1942 का अग्रेजों ‘भारत छोडो’ आन्दोलन का विस्फोट मथुरा नगर में 9 अगस्त को आरम्भ हुआ । पहले यमुना नदी पर नाव में दाल बाटी का कार्यक्रम रखा गया था । जिसका मूल उद्देश्य क्रान्ति में कार्यक्रम को निर्धारित करना था लेकिन इसका पता पुलिस को लग गया । दाल बाटी के कार्यक्रम में सर्वश्री हकीम ब्रजलाल वर्मन, रामजीदास गुप्त, भजनलाल, स्वामी रघुवीर शरण, देवनायक हटीला, रामस्वरूप वर्मा, मुकुन्द लाल वर्मन आदि प्रमुख थे । पुलिस ने जब नाव का पीछा किया तो देशभक्तों ने गिरफ़्तार होना सामयिक नहीं समझा । इनका इरादा दूसरी पार नाव से उतर कर ज़िले भर में फैलकर आन्दोलन को गतिवान करना था । ऐसा ही इन्होंने किया । 9 अगस्त, 1942 को मथुरा ज़िले में सर्वप्रथम गिरफ़्तारी जोशी राधेश्याम जी की हुई । इन्हें नज़रबन्द कर दिया गया । इसके उपरान्त केदारनाथ भार्गव भी नज़रबन्द कर लिये गये । 9 अगस्त को जब बाज़ार में हड़ताल कराने राधामोहन चतुर्वेदी निकले तो वे गिरफ़्तार कर लिये गये । डा. श्रीनाथ भार्गव भी बन्दी बना लिये गये । इन दोंनों को भी नज़रबन्द बना लिया गया । मथुरा के छात्रों में भी नेताओं की गिरफ़्तारी पर बड़ा क्षोभ व्याप्त था । उन्होंने भी शिक्षण संस्थाओं को बन्द कराने और सरकारी संस्थानों पर धरना देने का निश्चय किया । 10 अगस्त को चम्पा अग्रवाल इण्टर कालेज से छात्रों का जुलूस आरम्भ हुआ । यह किशोरीरमण इण्टर कालेज के छात्रों को लेते हुए गवर्नमेण्ट हाईस्कूल की तरफ बढा । इस जुलूस का आकार विशाल बन गया था । गवर्नमेण्ट हाईस्कूल को बन्द कराने के प्रयत्न में पुलिस ने छात्रों के जुलूस पर लाठी वर्षा प्रारम्भ कर दी । अनेक घायल हो गये । सतीशचन्द्र वाजपेयी छात्र बुरी तरह घायल हुआ । पुलिस ने सतीश, दीनानाथ चतुर्वेदी और द्वारिका नाथ को गिरफ़्तार कर लिया लौटने पर सायंकाल छात्रों ने गांधी पार्क में एक सभा आयोजित करने का प्रयत्न किया लेकिन पुलिस ने सभा स्थल को घेर लिया और निर्ममता से उन्हें पीटा । यह दृश्य बड़ा ह्रदय विदारक था । रामशरण दास जौहरी भी पुलिस की मार से बुरी तरह घायल हुए थे । छात्रों के आन्दोलन से सूत्रधारों में सर्वश्री कैलाश पुष्प, वासुदेव चतुर्वेदी, कुन्दनलाल चतुर्वेदी एवं राधेश्याम चतुर्वेदी आदि भी प्रमुख थे ।

आन्दोलन में तीव्रता

दिन-प्रतिदिन आन्दोलन में तीव्रता आने लगी । कराहरी गाँव में 20 अगस्त को हकीम ब्रजलाल वर्मन एवं बाद को स्वामी रधुवीर शरण, 25 अगस्त को भगवानदत्त जी चतुर्वेदी को गिरफ़्तार कर नजरबन्द कर लिया गया । इसके पश्चात सर्वश्री देवनायक हटीला, लक्ष्मीरमण आचार्य, जगदीश्वर उपाध्याय, पृथ्वीनाथ चतुर्वेदी, सरन गोपाल, रामस्वरूप वर्मा, गौरीदत्त चतुर्वेदी, हरदेव सिंह, गोपालदास सेठ, सुन्दरश्याम चतुर्वेदी गिरफ़्तार कर लिये गये और इन्हें नज़रबन्द घोषित कर दिया गया । सर्वश्री ब्रजगोपाल भाटिया एवं डा. प्रमोदनाथ गोस्वामी को कुछ दिन नजरबन्द रखने के बाद मुक्त कर दिया गया । वृन्दावन के सर्वश्री प्रो. कृष्णचन्द्र, पुरुषोत्तमलाल बोहरे, गणेशीलाल पांडे, नलिनीकान्त मुकर्जी, हरचरण लाल, रणधीर बंसल की भी यही दशा हुई । गोवर्धन के सर्वश्री रामरतन सिंह, देवकीनन्दन, ब्रजेन्द्र केशोरैया को भी नजरबन्द कर लिया गया । ग्रामीण क्षेत्र के जो देशभक्त नजरबन्द कर लिये गये उनमें सर्वश्री तारासिंह (महोली), शिवलाल सिंह (भदार), बसन्तलाल (राया), मिहीदत्त (इरौली जुनारदार), सुनहरी लाल आजाद (सहपऊ), गेंदासिंह (चंदवारा), बुद्वी बाबा (गोपी का नगला), टीकाराम पुजारी (ऊँचागाँव रसमई), चौधरी दिगम्बर सिंह (कुरसण्डा), वीरीसिंह (हथकोली), चकलेश्वर सिंह (धनगांव) थे । ये विभिन्न समय में गिरफ़्तार हुए थे । आचार्य जुगलकिशोर एवं उनकी पत्नी श्रीमती शक्तिदेवी को दिल्ली में गिरफ़्तार कर लिया गया । चिन्तामणि शुक्ल को अगस्त क्रान्ति के 2 मास पूर्व ही आपत्तिजनक भाषण देने के अपराध में बुलन्दशहर में गिरफ़्तार कर लिया गया था । सन् 1942 की क्रान्ति में मथुरा नगर से सर्वश्री कैलाश पुष्प, छैलबिहारी, महेन्द्रनाथ उर्फ कमल बाबू, दीनानाथ चतुर्वेदी, विरजो पानवाला, रणछोरलाल पाठक आदि ने भी बन्दी जीवन व्यतीत किया था । नगर में विभिन्न बम विस्फोट होने के सन्देह में सर्वश्री शंकरलाल यादव, वैद्य कृष्णदास, शिवहरि गौर, श्रीनिवास फोटोग्राफर, मिहीलाल को पुलिस ने बड़ा तंग किया था । इन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया था और लगभग 2 मास बन्दी जीवन व्यतीत करना पडा था । बम केस के दौरान में सर्वश्री त्रिलोकीनाथ शर्मा, डा. प्रमथनाथ गोस्वामी, बाबू केशवदेव वकील, विश्वपाल शर्मा ने ब्रिटिश शासन की चिन्ता न करते हुए सफ़ाई पक्ष में गवाही देकर अपनी देशभक्ति का परिचय दिया था ।


जेल के विभिन्न भागों में तोड-फोड के कार्य सम्पन्न हुए । अनेक देशभक्तों की टोलियाँ इस कार्य में सचेष्ट हो गई थीं मांट क्षेत्र में इसी प्रकार की टोली के सदस्य पुलिस द्वारा गिरफ़्तार हुए । यह केस राया षडयंत्र केस के नाम से प्रसिद्व हुआ । इस टोली में प्रायः सभी विश्वविधालय के छात्र थे- सर्वश्री ओउम प्रकाश तिवारी, कुँअर बहादुर मिश्र, इन्द्र चन्द्र, नेकराम शर्मा, बंगाली मल अग्रवाल, रामबाबू, बाबूलाल आदि इसमें प्रमुख थे । इन सबको जेल का दण्ड मिला था । इन्द्रचन्द्र की मृत्यु तो जेल जीवन में ही हो गयी थी । कोसी कलां क्षेत्र में सरदार रणवीर सिंह ने तोड-फोड की योजना बनायी थी । इस योजना के अनुसार कोसी में थाना और बैंक पर अधिकार जमाना था । सर्वश्री भरत सिंह, हरिश्चन्द्र, बाबूलाल आदि इस योजना में सम्मिलित हुए थे लेकिन यह योजना सफल न हो सकी । मांट तहसील के क्षत्र में इरौली जुनारदार के देशभक्त सर्वश्री तुलसीराम, वेद राम, दुर्गा दत्त, घूरेलाल, चेतराम आदि ने क्रान्ति को गतिवान रखने का प्रयत्न किया । ये सब विभिन्न समय में गिरफ़्तार कर लिये गये और इन्हें जेल की सजा मिली । उन दिनों बाज़ार में हड़ताल करना भी अपराध था । हड़ताल करने के अपराध में सर्वश्री मदन गोपाल सौदागर, गोपाल प्रसाद सौदागर, छवीनाथ भार्गव आदि देशभक्तों को गिरफ़्तार किया गया और दण्डित किया गया । क्रान्तिकारी गतिविधियों का पता लगाने के सम्बन्ध में सर्वश्री गौरीदत्त चतुर्वेदी एवं हरदेव सिंह को पुलिस ने अमानुषिक एवं भीषण यंत्रणाएँ दी थी । 9 सितंबर को ‘क्रान्तिदिवस’ के जुलूस का नेतृत्व करते हुए श्री रामजी दास गुप्त, जो ज़िले के प्रथम डिक्टेटर थे, गिरफ़्तार हुए । उसी दिन सर्वश्री बलवीर सिंह बघेल और रामगोपाल शर्मा भी बन्दी बना लिए गये ।


14 अगस्त, 1942 को परखम में माल गाड़ी गिराने के अपराध में इस गांव में आतंक का राज्य स्थापित हो गया । पुलिस ने इस गांव पर मनमाने अत्याचार किये । गाड़ी गिरने की सूचना पाते ही ज़िला कलेक्टटर पुलिस और मिलिद्री लेकर आ गये । उनके पास बंदूक़ें ही नहीं अपितु मशीनगन भी थी । पूरा गांव उन्होंने घेर लिया और गांव की गलियों में फौजी जवान और पुलिस की गश्त होने लगी डर के कारण बच्चे और औरतें घरों में घुस गये । पुलिस वालों को जो कोई भी मिलता था उसे पकड लिया जाता था । उसे कलेक्टटर के सामने पेश कर दिया जाता था । वहाँ पर पुलिस के डंडों की मार और जूतों की मार से परखम के लोगों को निर्दयतापूर्वक सताया जाता था । भले-भले आदमियों की मूछें तक उखाडी गयीं इस प्रकार के अत्याचार कई दिन तक चलते रहे । लोग भूख के कारण व्याकुल हो रहे थे । वे गांव को छोडकर जंगलों में शरण लेने में ही कल्याण समझते थे । गांव सूना सा हो गया था । औरतों ने पुलिस से बचाने के लिए घर का सामान ज़मीन में गाड दिया था । इस प्रकार आतंक, लूट का दौर दौरा महीनों रहा । दो महीने बाद गांव वालों से 4000 रुपया लिया परखम के इस काण्ड के सम्बन्ध में जिन देशभक्तों को अनेक कष्टों का सामना करना पडा उनमें प्रमुख सर्वश्री मौजीराम, रूपराम, भूपालीराम, गोविन्दराम, गंजीराम, बतासीराम, हीरालाल, सुजानसिंह, कमलसिंह, भुल्लनसिंह, मिठ्ठनलाल, गंगाधर, ग्यासीराम, कुँजीलाल, देवपाल, होतीलाल, नानगराम, किशोरीलाल, श्रीपति, रामचरन, सूआसिंह, सुनपति आदि थे । इनमें से बहुतों को गिरफ़्तार किया गया था और अनेक दिन जेल में रहना पडा था । यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि सन् 1934 में प्रान्तीय हरिजन कार्यालय ग्राम परखम में खोला गया था जिसमें आचार्य जुगुल किशोर, स्वामी रघुवीर शरण, मास्टर रामसिंह ने खादी कार्य, सेवा समिति, औषधालय और पुस्तकालय की व्यवस्था भी थी और इस कार्य में अनेक सक्रिय कार्यकर्ता काम करते थे । इन्हीं कारणों से यह अधिकारियों की दृष्टि में खटकता था । तत्कालीन थानेदार फ़रह ने उक्त दफ़्तर में चोरी से आग लगवाई जिससे 10-15 हज़ार का सामान जल कर ख़ाक हो गया ।


सन् 1942 में विदेशी शासन को अपंग बनाने हेतु ध्वंसात्मक कार्य करने वाले देशभक्तों के दलों में श्री जगन प्रसाद अड़ींगवालों के दल ने भी क्रान्ति को प्रज्जवलित करने की चेष्टा की थी । इस दल में प्रारम्भ में सर्वश्री राधेश्याम चौधरी, शिवलालसिंह (भदार), पीताम्बर सिंह (नगला मोरा), ललित बिहारी (अड़ींग) किशनलाल (जखनगाँव) चौधरी भुल्लनसिंह (शाहपुर) प्रमुख थे । भरतपुर की मेनलाइन के तारों को काटने में दल सफल रहा । इस दल में आगे चलकर जैत के डा. श्यामलाल और डा. रामसिंह और उनके अन्य साथी भी सम्मिलित हो गये । इस दल की छटीकरा स्टेशन को अग्नि के भेंट करने की योजना क्रियान्वित न हो सकी । इस दल में सौंख स्थान नन्नू पट्टी में 300 के लगभग संख्या हो गई थी लेकिन वहां कोई क्रान्तिकारी घटना घटित नहीं हुइ । केवल तार काटने की घटनाएं अधिकांश में नहर और रेल की पटरियों पर इन लोगों के द्वारा होती रही । कोसी में इस दल के लोगों ने वहाँ के कुछ स्थानीय लोगों से सम्पर्क स्थापित किया । इनमें सर्वश्री रामस्वरूप वकील, लालाराम एवं बिहारीलाल जी से सहयोग प्राप्त हुआ । कोसी के थाने और स्टेशन को नष्ट करने की योजना इस दल ने बनायी थी । इस हेतु पास ही के गांव खटावटे में इस दल के लोग एकत्रित भी हुए थे जिनमें सरदार रणवीर सिंह, सर्वश्री जगन प्रसाद, रामस्वरूप वकील, ललित बिहारी, चौधरी शिवलाल, हरनरायण, कुन्दनसिंह, श्यामलाल पहलवान, डा. रामसिंह आदि प्रमुख थे । यहाँ पर सर्वश्री भरतसिंह (जाव), राधेलाल (सांचोली) भी सम्मिलित हो गये थे । अन्त में योजना सफल न हो सकी । श्री जगनप्रसाद जी के मकान को पुलिस ने दो तीन बार घेरा लेकिन आप बच गये । इन्हें कई बार खेतों पर सोना पडा । अन्त में मथुरा में साईकिल ठीक कराते समय गिरफ़्तार कर लिया गया और दण्डित किया गया ।

तरौली गोलीकाण्ड

तरौली के प्रमुख राष्द्रीय कार्यकर्ता मोहरसिंह सन् 1942 में बडे सक्रिय रहे थे । इन्हें गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस कटिबद्व थी । पुलिस ने श्री मोहर सिंह को गिरफ़्तार करने हेतु गांव वालों को बड़ा उत्पीडित किया था । श्री सालिगराम शर्मा अफसर दोयम पुलिस स्टेशन छाता जब इस गांव को आतंकित करने के लिए गये तब उसने अन्त में गोली चला दी जिससे खचेरा के गोली लगी जो बाद में अस्पताल में यह निकाली गयी पुलिस ने तरौली गांव के जिन लोगों गिरफ़्तार किया उनमें इस गांव के सर्वश्री हरिश्चन्द्र, सूरजसिंह, गिर्राज वैश्य, ओंकार वैश्य, कन्हैयालाल सुनार, रामजीत ठाकुर, घूरे जोगी, खचेरा सिंह, गनपत सिंह, ग्यासिया (पुत्र श्री निर्मल), और पसौली गांव के विरजू, अजय चन्द, सूखाराम, ग्यासिया आदि प्रमुख थे । इन सबों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया और उन्हें कई मास जेल में रहना पडा । घूरे जोगी की मृत्यु जेल में ही हुई थी । स्मरण रहे कि उन दिनों तरौली गांव में पुलिस द्वारा 50 हज़ार रुपये की लूट हुई और यहाँ के लोगों को अनेक प्रकार के कष्ट भोगने पडे । गोली काण्ड की घटना के कुछ दिनों पश्चात श्री मोहरसिंह की भी गिरफ़्तार कर लिया गया और 1 वर्ष की जेल और 50 रुपये जुर्माना का दण्ड मिला । मांट तहसील के अन्तर्गत कराहरी गांव के सर्वश्री सांमल सिंह, छिद्दालाल, बिहारीलाल सिंह और कुज्जीलाल को भी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण गिरफ़्तार किया गया था । इन्हें 18 फरवरी, 1943 को 2 वर्ष का जेल दण्ड दिया गया लेकिन कई दिन हवालात में रहने के बाद मुकद्दमा जीतने पर इन्हें मुक्त कर दिया गया । इस प्रकार मथुरा जनपद का ग्रामीण क्षेत्र एवं नगर ‘करो या मरो’ के क्रियान्वय में संलग्न रहा । मथुरा नगर के चम्पा अग्रवाल कालेज, किशोरीरमण इण्टरमीडिएट कालेज, पुरानी कोतवाली में बम विस्फोट की जो घटनाएं हुई थीं उनमें श्री गुरुदयाल सिंह (आगरा), श्री भगवत सिंह उर्फ चकलेश्वर (धनगांव), श्री टी.पी. नारायण पेशारोडी (एक केरल निवासी देशभक्त जो मथुरा रहते थे) एवं राम स्वरूप और पुरुषोत्तम आदि देशभक्त व्यक्तियों का विशेष सम्बन्ध था इन्होंने क्रान्ति को गतिवान रखने का प्रशंसनीय प्रयत्न किया था ।

वृन्दावन में 28 अगस्त का गोलीकाण्ड

सन् 1942 के अग्रेजों ‘भारत छाडो’ आन्दोलन के प्रारम्भ होने के साथ ही वृन्दावन में ‘करो मा मरो’ की उदात्त भावना से प्रेरित होकर यहाँ के युवक एवं देशभक्त मातृभूमि की स्वतंत्रता पर सर्वस्व अर्पण करने के लिए बेचैन हो गये अंगेज़ों के विदेशी शासन का उन्मूलन करने का जोश 28 अगस्त को चरम सीमा पर पहुँच गया । 27 अगस्त की रात्रि को यमुना के पुनीत जल के ऊपर नाव में 28 अगस्त की कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की हुई थी । इसी प्रकार की एक और कार्यकर्ताओं की गुप्त बैठक प्रो. कृष्णचन्द्र के तत्वावधान में हैजा अस्पताल में हुई थी । पूर्व निश्चित कार्यक्रम के अनुसार सर्वश्री अद्वैत कुमार गोस्वामी, हेमन्त कुमार, प्रकाशचन्द्र भार्गव, रमेशचन्द्र शर्मा आदि लड़कियों के सरकारी स्कूल में 28 अगस्त को हड़ताल कराने के लिए रवाना हो गये । यहाँ की प्रधानाध्यापिका ने हड़ताल करना स्वीकार नहीं किया तब उपस्थित जनता में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और वह स्कूल बन्द करने के लिए कटिबद्व हो गयी । इतने में ही श्री लाल सिंह दरोगा सदल बल वहाँ पहँच गया और उसने सर्वश्री अद्वैतकुमार गोस्वामी, हेमन्त कुमार प्रकाशचन्द्र एवं नन्द कुमार जैसे जोशीले युवको को गिरफ़्तार कर लिया । इन्हें हवालात में बन्द कर दिया गया ।इस घटना से वृन्दावन में रोष का वातावरण व्याप्त हो गया । श्री राधो गोस्वामी ने अपने घर से झंडा और घंटा लिया, साथ में लक्ष्मण युवक को भी ले लिया और अब ये दोनों बाज़ार में हड़ताल करने निकल पडे । इनके प्रयत्न से बाज़ार शीघ्रता से बन्द हो गया । बाज़ार में हड़ताल करके जनता सहस्त्रों की संख्या में चुंगी के चौराहे पर पहँच गयी । मथुरा से वृन्दावन का सम्बन्ध विच्छेद कर उत्तेजित देशभक्तों का इरादा थाने पर अधिकार कर गिरफ़्तार युवकों को मुक्त करना था अतएव तत्कालीन ई.ओ. श्री रणधीर सिंह बंसल से उन्होंने कुदाल, फावडे लिये और मथुरा रोड वाली पुलिया को कुछ नष्ट कर दिया और सडक भी खोद डाली । इस कार्य में श्री कृष्णचरण उर्फ कल्लो गोस्वामी ने प्रमुख भाग लिया । सर्वश्री रामू गैस वाले, शिवचरण एवं सुवराती मिस्त्री ने हैजा अस्पताल के पास टेलीफ़ोन वाला तार भी काट डाला । इस दिन तोड-फोड के कार्यो में विशेष योगदान देने वाले अन्य युवकों में सर्वश्री मदनमोहन भटनागर, मेंडूलाल, रामकुमार शर्मा, लक्ष्मणदत्त दुबे, बांकेलाल टालवाला, किशनलाल गुप्त, मदनमोहन गुप्त, जगदीशचन्द्र उपाध्याय, चीर बिहारी, नारायण प्रसाद शर्मा, खेमचन्द स्वामी, ललित कुमार शर्मा, दानबिहारी शुक्ल, राजबिहारी कुलश्रेष्ठ, श्यामबिहारी लाल, लक्ष्मण प्रसाद, गोविन्द बल्लभ गोस्वामी राधामोहनदास, अतुल कृष्ण गोस्वामी, विश्वम्भरदयाल गोस्वामी, चैतन्य कुमार गोस्वामी, नीलमणि गोस्वामी, चीर बिहारी, परमानन्द, रमेशचन्द्र शर्मा के नाम विशेष उल्लखनीय है । क्रांन्ति के प्रारम्भ से ही ये युवक सक्रिय हो गये थे । अंत में वीर युवक लक्ष्मण के नेतृत्व, में जिसके हाथ में, तिरंगा झंडा था जन समुदाय थाने की ओर बढा ।


थानेदार लालसिंह ने स्थिति को गंभीर समझ कर देशभक्तों की भीड़पर गोली चलाने का आख़िर आदेश दे दिया । पहले तो उत्तेजित जनता को भयभीत करने के लिए हवाई फायर किये गये लेकिन जब इसका कोई परिणाम न निकला तो मथुरा से आई हुई पुलिस की गारद के ईट और पत्थरों से रक्तरंजित अब्दुल रज़्ज़ाक़ नामक सिपाही ने फायरिंग करने का आदेश मांगा । आदेश मिलने पर उसने घातक फायरिंग करना आरम्भ कर दिया । थाने की ओर से आने वाली गोलियों और छर्रो की बौछार से कई लोग घायल हुए लेकिन पिस्तौल की एक गोली जो वीर युवक लक्ष्मण पेट के में लगी और दूसरे सीधे पैर की जांघ में लगी । वीर लक्ष्मण मातृभूमि की स्वतंत्रता हेतु शहीद हो गया । श्री बुद्वूलाल उर्फ बुद्वू साहस करके लक्ष्मण को अस्पताल ले जाने के लिए एक खाट भी लाये और अस्पताल पहँचाया लेकिन वह तो अमरता प्राप्त कर चुका था । शहीद लक्ष्मण राजस्थान की वीरभूमि से प्रारम्भ में गोवर्धन आकर रहे थे । वहीं पर स्वतंत्रता युद्वों की गतिविधियों में भाग लेना उसने प्रारंभ किया था । सन् 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उसने प्रारंभ किया था । सन् 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उसे जेल का दण्ड भी मिला था । जेल से मुक्त होने पर वृन्दावन में राष्द्रीय हलचलों में भाग लेते हुए 28 अगस्त को वह शहीद हो गया । पुलिस की गोली और छर्रो से अनेक लोग घायल हुए । इनमें सर्वश्री गोपीनाथ शर्मा, नारायण प्रसाद शर्मा, राधामोहनदास और नन्द कुमार शुक्ल प्रमुख थे । श्री नन्दकुमार शुक्ल टखने में गोली लगने के कारण सदैव के लिए लंगडे हो गये । सर्वश्री नारायण प्रसाद शर्मा और राधामोहनदास के शरीर के छर्रो को बडी कठिनाई से बाद में निकाला गया । उसी दिन पुलिस की भयानक मार से मूला नामक धोबी सदैव के लिए अपंग हो गया । अत्याचारी पुलिस ने उसी दिन छोटे नत्थो सर्राफ को भी बडी निर्ममता के साथ मारा था । श्री दाऊदयाल पंडा के हस्तक्षेप के कारण इनकी जान बची थी । गोलीकाण्ड के पश्चात वृन्दावन में पुलिस का आतंक छा गया । सम्पूर्ण नगर में सत्राटा था । सब लोग भयभीत थे । पुलिस ने अनेक लोगों को गिरफ़्तार भी किया । इनमें सर्वश्री फ़तेहबहादुर, मूलचन्द, सच्चिदानन्द, राधो गोस्वामी, नारायण लाल, परमानन्द, गोपीनाथ शर्मा, छोटे नत्थो सर्राफ, बिहारीलाल उर्फ बिहारी, श्रीगोविंद, रामजी लाल, प्यारेलाल, लक्ष्मीनारायण, शिवचरण, प्रभातीलाल, श्यामसुन्दर, राधारमण, श्रीनाथ उर्फ सीनो, गेंदालाल, दम्भो सरदार, सीताराम, नन्दकुमार शुक्ल एवं हरिशंकर प्रमुख थे । इन पर 147, 215 और 436 दफायें लगायी गयी थी । इण्डियन टेलीग्राफ एक्ट की धारा 352 (आई.पी.सी.) के अन्तर्गत 25 वीं उपधारा और डिफेन्स आँफ इण्डिया एक्ट की 141 वीं ( आई.पी.सी.) की 35वीं और 36वीं धारायें भी इन पर लगायी गयी थी । इन देशभक्तों का मुक़दमा श्री पद्मादत्त पांडे की अदालत में हुआ । 14 दिसम्बर सन् 1942 को इस मुकदमे का निर्णय हुआ । सर्वश्री मूलचन्द, सच्चिदानन्द, नारायणलाल, परमानन्द, गोपीनाथ, नत्थोमल, गोविन्द, रामजीलाल, शिवचरण, श्यामसुन्दर, राधारमण,गेंदालाल, सीताराम, नन्दकुमार शुक्ल, हरीशंकर मुक्त कर दिये गये । शेष को लगभग 3 वर्ष की जेल की सजा दी गयी । मुकदमे के दौरान राधारमण के श्री गोपीलाल गोस्वामी वकील ने निर्भीक होकर अदालत में शहादत दी थी । गोलीकाण्ड के सन्दर्भ में गुलाब ठाकुर और श्रीसुमन (गोस्वामी संकर्षण) को भी गिरफ़्तार किया गया था लेकिन कुछ दिनों बाद छोड दिया गया ।


सन् 1942 में क्रान्ति के दिनो में वृन्दावन वासियों को ओर कष्ट के दिन व्यतीत करने पडे । पुलिस के द्वारा अन्धाधुन्ध जुर्माना वसूल करना, युद्व के लिए निर्ममता से चन्दा वसूल करना और मलेरिया की भयंकरता आदि से वृन्दावन का नागरिक जीवन ग्रस्त हो उठा था । वृन्दावन की जनता से मनमाना वसूल किया हुआ । धन जिसका लेखा मिलता है 30 हज़ार रुपया आंका गया है लेकिन जनता का अनुमान है कि लगभग 1 लाख रुपया वसूल किया गया था । भयभीत जनता को रसीद तक नहीं दी जाती थी । अनेको वृन्दावन वासियों को उन दिनों वृन्दावन छोडना पडा था । पुलिस ने जबर्दस्ती सभ्रान्त लोगों तक से पहरा लगवाया था । बहुतों के नाम वारण्ट थे । वे फरारी अवस्था में भारत के विभिन्न भागों में पहँचे थे । इन नागरिकों को बाहर अनेक कष्टों के दिन व्यतीत करने पडे । गोलीकाण्ड के सम्बन्ध में केवल सन् 1942 में ही गिरफ़्तारियाँ नहीं हुई लेकिन सन् 1945 तक यह सिलसिला चलता रहा । सन् 1945 में वृन्दावन गोलीकाण्ड के द्वितीय केस के संदर्भ में सर्वश्री गिर्राजप्रसाद धवल, नरसिंहाचार्य, धरनीधर, यशोदानंदन, गंगाविष्णु, कन्हैयालाल और बोहरे गोपालप्रसाद को गिरफ़्तार किया गया । 13 अगस्त, 1945 को इन्हें 3 वर्ष की जेल का श्रीनियाज अहमद सेशन जज द्वारा दण्ड मिला था । ये देशभक्त 28 अप्रैल, 1946 में जेल से मुक्त हुए । इन्हें 147, 149, 332 आदि धाराओं के अन्तर्गत सजा मिली थी । सन् 1942 की क्रान्ति के दिनों में अनेक देशभक्त फरार क्रान्तिकारी देशभक्त जैसे बाबा राघवदास श्रीमती अरुणा, आसफ अली, श्रीमती सुचेता कृपलानी आदि ने मथुरा और वृन्दावन में भूमिगत रहकर क्रान्ति का संचालन किया था । सन् 1942 का ‘भारत छोडो’ आन्दोलन या क्रान्ति मथुरा ज़िले का अन्तिम स्वातन्त्र्य युद्व था और यह सन् 1945 तक चलता रहा । मथुरा ज़िला इनकी सेवाओं को कभी भूल नहीं सकता । इसके उपरान्त मथुरा ज़िले ने 15 अगस्त 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्ति के स्वर्णिम दिवस को बडे उल्लास और प्रसन्नता से मनाया । यहाँ के स्वातन्त्र्य युद्वों के सेनानियों ने अपने जीवनकाल में ही सहस्त्रों वर्षो की मातृभूमि की दासता का अन्त देखकर अपने जीवन को सार्थक समझा।

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