गीता 12:2

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गीता अध्याय-12 श्लोक-2 / Gita Chapter-12 Verse-2

प्रसंग-


इस प्रकार <balloon link="index.php?title=अर्जुन" title="महाभारत के मुख्य पात्र है। पाण्डु एवं कुन्ती के वह तीसरे पुत्र थे । अर्जुन सबसे अच्छा धनुर्धर था। वो द्रोणाचार्य का शिष्य था। द्रौपदी को स्वयंवर मे जीतने वाला वो ही था। ¤¤¤ आगे पढ़ने के लिए लिंक पर ही क्लिक करें ¤¤¤">अर्जुन</balloon> के पूछने पर उसके उत्तर में भगवान् सगुण-साकार के उपासकों को उत्तम बतलाते हैं-


श्रीभगवानुवाच:
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता: ।।2।।



श्रीभगवान् बोले-


मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुण रूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझ को योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं ।।2।।

Shri Bhagavan said-


I consider them to be the best yogis, who endowed with supreme faith, and ever united through meditation with me, worship me with the mind centred on me. (2)


मयि = मेरेमें ; मन: = मनको ; आवेश्य = एकाग्र करके ; नित्ययुक्त: = निरन्तर मेरे भजन ध्यानमें लगे हुए ; ये = जो भक्तजन ; परया = अतिशय श्रेष्ठ ; श्रद्धया = श्रद्धासे ; उपेता: = युक्त हुए ; माम् = मुझ सगुणरूप परमेश्र्वरको ; उपासते = भजते हैं ; ते = वे ; मे = मेरेको ; युक्ततमा: = योगियोंमें भी अति अत्तम योगी ; मता: = मान्य हैं



अध्याय बारह श्लोक संख्या
Verses- Chapter-12

1 | 2 | 3,4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13, 14 | 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20

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