मूर्ति कला 3

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मूर्ति कला 3 / संग्रहालय / Sculptures / Museum

कुषाण कला की प्रमुख देन— उपास्य मूर्तियों का निर्माण

मथुरा में इस समय तीन संप्रदाय प्रमुख थे- जैन, बौद्ध और ब्राह्मण। इनमें ब्राह्मण धर्म को छोड़कर किसी को भी मूलत: मूर्तिपूजा मान्य न थी, परन्तु मानव की दुर्बलता एवं अवलम्ब अथवा आश्रय खोजने की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण शनै:शनै: इन संप्रदायों के आचार्य स्वयं ही उपास्य देव बन गये। साथ ही साथ उपासना के प्रतीकों का भी प्रादुर्भाव हुआ। ई॰ पू॰ द्वितीय शताब्दी के पहले से ही बुद्ध के प्रतीक जैसे, स्तूप, भिक्षापात्र, उष्णीश, बोधिवृक्ष, आदि लोकप्रिय हो गये थे। जैने समाज में भी चैत्यस्तम्भ, चैत्य-वृक्ष, अष्ट मांगलिक चिह्न आदि प्रतीकों को मान्यता मिल रही थी। कुषाणकाल तक् पहुँचते पहुँचते इन प्रतीकों के स्थान पर प्रत्यक्ष मूर्ति की संस्थापना की इच्छा बल पकड़ने लगी और अल्प काल में ही माथुरी कला ने तीर्थंकर मूर्तियों और बौद्ध मूर्तियों को जन्म दिया। इसी के साथ विष्णु, दुर्गा, शिव, सूर्य, कुबेर आदि ब्राह्मण धर्म की उपास्य मूर्तियाँ भी इसी समय बनीं। भारतीय कला को मथुरा कला की यह सबसे बड़ी देन है। गुप्त और गुप्तोत्तर कला के विशाल प्रतिमा-संग्रह का आधार कुषाणकला में है।

तीर्थंकर- प्रतिमा का जन्म

जैनों की प्रारम्भिक पूजा पद्धति में निम्नांकित प्रतीकों का स्थान महत्त्वपूर्ण था- धर्मचक्र, स्तूप, त्रिरत्न, चैत्यस्तम्भ, चैत्य-वृक्ष, पूर्णघट, श्रीवत्स, शराव-संपुट, पुष्प-पात्र, पुष्प-पडलग, स्वस्तिक, मत्स्य-युग्म, व भद्रासन। इनके यहाँ अर्चा का एक दूसरा प्रतीक था आयागपट्ट। आयागपट्ट एक चौकोर शिलापट्ट होता था जिस पर या तो एकाधिक प्रतीक बने रहते थे या प्रतीकों के साथ तीर्थंकर की छोटी सी प्रतिमा भी बनी रहती थी। इनमें से कुछ लेखांकित हैं। जिनसे पता चलता है कि ये पूजन के उद्देश्य से स्थापित किये जाते थे। मथुरा के इस प्रकार के कुषाणकालीन कई सुन्दर आयागपट्ट मिले हैं। इनमें से एक समूचा आयागपट्ट तथा तीर्थंकर-प्रतिमा से शोभित दूसरा खंडित आयागपट्ट जो इस संग्रहालय में विद्यमान है, विशेष रूप से उल्लेखनीय है। समूचे वाले आयागपट्ट पर एक जैनस्पूप, उसका तोरण द्वार, सोपान मार्ग और दो चैत्यस्तंभ बने हैं जिन पर क्रमश: धर्मचक्र और सिंह की आकृतियाँ बनी हैं। सिंह का संबंध तीर्थंकर महावीर से है। तीर्थंकर प्रतिमा के सर्वप्रथम दर्शन हमें आयागपट्टों पर ही होते हैं। यह कहना कठिन है कि तीर्थंकर की प्रतिमा एवं बुद्ध की मूर्ति इन दोनों में प्रथम कौन बनी होगी। कदाचित यह दोनों कार्य साथ ही साथ हुए थे।

मथुरा में कंकाली टीले पर जैनों का बहुत बड़ा गढ़ था। यहाँ उनके विहार और स्तूप विद्यमान थे। यहीं से तीर्थंकरों की प्रारम्भिक प्रतिमाएं मिली हैं। इन मूर्तियों की मुख्य विशेषताएँ अधोलिखित हैं;

कुषाणकाल से ही तीर्थंकर प्रतिमा का एक और प्रकार चल पड़ा जो चौमुखी मूर्ति या सर्वतोभद्र-प्रतिमा के नाम से पहचाना जाता है। इस प्रकार की मूर्तियों में एक ही पाषाण के चारों ओर चार तीर्थंकर प्रतिमाएं बनी रहती हैं। इनमें बहुधा एक ऋषभनाथ व दूसरी पार्श्वनाथ की रहती हे। इस प्रकार की चतुर्मुख प्रतिमा बनाने की पद्धति परवर्तिकाल में ब्राह्मण धर्म द्वारी अपनायी गई।

जैनधर्म की देव और देवी प्रतिमाएं

हरिनैगमेश
Harinaigmesha
राजकीय संग्रहालय, मथुरा

मथुरा की कुषाणकला में अधोलिखित जैन प्रतिमाएं मिली हैं;

(1) नेगमेश या हरिनेगमेशी

बकरे के मुख वाले इस देवता का शिशु जगत से सम्बन्ध है। यह महत्त्व की बात है कि कुषाणकाल के बाद जैन मन्दिरों में इस देवता के स्वतंत्र रूप से स्थापित किये जाने के उदाहरण नहीं मिलते * और न उसकी प्रतिमाओं की बहुलता ही दिखलाई पड़ती है। कुषाण कालीन माथुरी प्रतिमाओं में हम उन्हें बहुधा बच्चों से घिरा हुआ पाते हैं।

(2) रेवती या षष्ठी

नेगमेश के समान इस देवी का सम्बन्ध बच्चों से है। इसका भी मुख बकरे का ही है। मथुरा संग्रहालय में कुछ ऐसी स्त्री मूर्तियाँ हैं जिनकी गोद में पालना है। इसमें एक शिशु भी दिखलाई पड़ता है (सं0 सं0 ई॰ 4)[2] इन्हें रेवती या षष्ठी की मूर्तियाँ माना गया है।*

(3) सरस्वती

यह जैनों की भी देवता है। जैन सरस्वती की प्राचीनतम मूर्ति मथुरा के कंकाली टीले से मिली है जो इस समय लक्षनऊ के संग्रहालय में है (लखनऊ सं0 सं0 जे0 24)।

(4) कृष्ण बलराम

तीर्थंकर नेमिनाथ के पार्श्ववर्ती देवताओं के रूप में इनका अंकन किया जाता है। कृष्ण चतुर्भुज हैं बलराम हाथ में मदिरा का चषक लिये हुए हैं, उनके मस्तक पर नागफण हैं।

बुद्ध प्रतिमा का निर्माण

सिर विहीन बुद्ध प्रतिमा
Headless Image of Buddha
राजकीय संग्रहालय, मथुरा

पश्चिम के विद्वानों ने भारतीय कला का जब अध्ययन किया तब उन्होंने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्ति कुषाणकाल में गांधार शैली के कलाकारों द्वारा बनाई गई। भारतीय विद्वानों ने इस सिद्धांत में कई त्रुटियां देखीं और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बुद्ध की प्रथम प्रतिमा गांधार में नहीं अपितु मथुरा में बनी। उनकी इस धारणा का प्रमुख आधार बुद्ध-बोधिसत्त्वों की वे लेखांकित प्रतिमाएं हैं जिन पर स्पष्टतया कनिष्क के राज्य संवत्सर का उल्लेख है। गांधार कला में इस प्रकार की सुनिश्चित तिथियों से युक्त लेखांकित प्रतिमाओं का सर्वथा अभाव हें इसके अतिरिक्त देश की तत्कालीन स्थिति व धार्मिक अवस्था भी इसी ओर संकेत करती है कि प्रथम बुद्ध मूर्ति मथुरा में ही बनी होगी न कि गांधार में। संक्षेप में उस समय की स्थिति को यों समझा जा सकता है।

ईसवी सन् की प्रथम शताब्दी के पूर्व मथुरा में वैष्णव धर्म व उससे सम्बन्धित भक्ति संप्रदाय जोर पकड़ चुका था। महाक्षत्रप शोडास के समय में ही यहाँ वासुदेव का मन्दिर था और बलराम अनिरुद्धादि पंचवीरों की प्रतिमाओं का पूजन समाज में प्रचलित था। दूसरी ओर जैन आचार्यों की मूर्तियां गढ़ी जा रही थीं और वहाँ भी भक्ति संप्रदाय बल पकड़ रहा था। रहा बौद्ध समाज, इनमें पुष्पदीपादि द्वारा बुद्ध के प्रतीकों का पूजन तो प्रचलित था ही, केवल निराकार तथागत की साकार प्रतिमा का अभाव था। इस अभाव को दूर करने में महासांघिक मत के बौद्धों ने बड़ी सहायता की।

बौद्धों के धार्मिक जगत में इस समय मतभेद चल रहा था। कुछ लोग प्राचीन बातों को अपरिवर्तित रूप में ही मानना उचित समझते थे, पर दूसरा संप्रदाय परिवर्तनवादी था जो महासांधिक नाम से प्रसिद्ध था। आगे चलकर यह दोनों मत हीनयान और महायान के नाम से पहिचाने जाने लगे। महासांघिक लोगों ने बुद्ध की निराकार मूर्ति व उसका पूजन उचित माना। उनका कहना था कि निर्वाण प्राप्ति के पूर्व बुद्ध बोधिसत्व के नाम से पहिचाने जाते हैं। निर्वाण के उपरान्त पुन: कोई इस लोक में नहीं आता। बुद्ध ने संबोधि या ज्ञान तो प्राप्त कर लिया था पर निर्वाण को पाना इसलिये अस्वीकार किया कि वे लोगों के कल्याण के लिए बार-बार पृथ्वी पर अवतीर्ण हो सकें। अत: निर्वाण-प्राप्त बुद्ध की तो नहीं, पर संबोधि-प्राप्त बोधिसत्त्व की प्रतिमा बनाना अवैध नहीं क्योंकि वे साकार रूप में मनुष्यों और देवों के द्वारा देखे और पूजे जाते हैं। कदाचित इसीलिये प्रारंभिक बुद्ध मूर्तियों पर अंकित लेखों में उन्हें बोधिसत्त्व ही कहा गया है। आगे चलकर महायानवादियों ने एक बुद्ध प्रतिमा ही नहीं अपितु शताधिक देवी देवताओं की मूर्तियों के निर्माण और पूजन की पद्धति को अपनाया।

कुषाण सम्राट कनिष्क का शासन काल भी बुद्ध की प्रतिमा निर्माण के लिए प्रेरक हुआ। इस शासक ने अपनी धार्मिक सहिष्णुता के प्रदर्शन के लिए अपनी मुद्राओं पर विभिन्न धर्म के देवी देवताओं को स्थान दिया। शैवों का शिव, ब्राह्मण धर्म के चन्द्र, सूर्य, वायु, आदि अन्य देव तथा ईरानी मत के देवगणों में एतशो, नाना आदि को इसके सिक्कों पर अंकित किया जा रहा था। इन्हीं के साथ उसने बुद्ध की मूर्ति से भी अपनी कुछ मुद्राएं सुशोभित कीं।

गांधार कला के बुद्ध मूर्तियों की तिथि विषयक अनिश्चितता की ओर हम पहले संकेत कर चुके हैं। मथुरा में कनिष्क के राज्यारोहण के दूसरे वर्ष से ही बुद्ध प्रतिमा का निर्माण प्रारम्भ हुआ, जो बाद तक चलता रहा।

बुद्ध प्रतिमा के निर्माण के आधार[3] बुद्ध की खड़ी मूर्ति की कल्पना यक्ष प्रतिमाओं के आधार पर की गई। इन यक्ष प्रतिमाओं का उल्लेख हम कर चुके हैं, जो इस समय के पहिले से ही लोककला में बन रही थीं बैठी हुई बुद्ध मूर्ति का आधार कदाचित भरहूत कला में दिखलाई पड़ने वाली दीर्घतापसी की मूर्ति है। कुछ विद्वान इसका आधार उन तीर्थंकर प्रतिमाओं को मानते हैं जिनका अंकन जैन आयागपट्टों पर हुआ है।*

पारदर्शी चीवर धारण किए हुए बुद्ध
भिक्षु यशदिन्न द्वारा निर्मित स्थापित बुद्ध प्रतिमा, मथुरा
Buddha
राजकीय संग्रहालय, मथुरा

बुद्ध के बालों का अंकन निदान कथा के आधार पर हुआ। प्रारम्भिक अवस्था में बुद्ध का मस्तक मुण्डित होता है और केवल एक ही लट ऊपर दाहिनी ओर घूमती हुई दिखलाई पड़ती है। बाद में तो सारा मस्तक ही छोटे-छोटे घुंघरों से आवृत होने लगता है। उनके मस्तक के पीछे दिखलाई पड़ने वाले प्रभामण्डल का उद्भव कदाचित उन ईरानी देवी-देवताओं की मूर्तियों से हुआ जिन्हें वहाँ 'यजत' के नाम से पहिचाना जाता है। कुषाण मुद्राओं पर अंकित इन देवताओं की मूर्तियों में प्रभामण्डल विद्यमान है। चीवर, संघाटी आदि बुद्ध के वस्त्रों की कल्पना तो प्रत्यक्ष जगत से ही ली गई होगी। वैसे विनय पिटक में भी इसका विस्तृत विवरण मिलता है।* बुद्ध के पैरों के नीचे दिखलाई पड़ने वाला कमल कदाचित सांची की कलाकृतियों की देन है।

प्रारम्भिक बुद्ध प्रतिमाओं की विशेषताएं

[4]इस प्रकार धर्माचार्य, शासन, कलाकार व तत्कालीन जनता के सहयोग से जो प्रारम्भिक बुद्ध मूर्तियाँ कुषाण काल में बनीं उनमें निम्नांकित विशेषताएं देखी जा सकती हैं—

गांधार कला के संपर्क में आने के बाद कतिपय मूर्तियों के गढ़न में कुछ परिवर्तन हुये जिनका विवेचन पहले हो चुका है।

उत्तर कुषाणकाल में आसनस्थ मूर्ति के गढ़ने में शैली अधिक सुधरी हुई है। चीवर तथागत के दोनों कंधों पर पड़ा रहता है। साथ ही दोनों पैर भी वस्त्र में छिपे रहते हैं और वस्त्र का सामने वाला छोर चौकी पर लटकता दिखलाई पड़ता है। जैन तीर्थंकरों के समान बुद्ध की चरण चौकी के सामने वाले भाग पर दाताओं की मूर्तियों का अंकन अब प्रारम्भ हो जाता हैं शनै:-शनै: मुण्डित मस्तक लुप्त होकर घूँघरों का निर्माण साधारण परिपाटी बन जाती है। इस काल की बुद्धि व बोधिसत्त्व प्रतिमाओं के हाथ केवल चार मुद्राओं में- अभय, भूमिस्पर्श ध्यान तथा धर्म-चक्र-प्रवर्तन में दिखलाई पड़ते हैं। पाँचवीं मुद्रा वरद का यहाँ सर्वथा अभाव है।*

ब्राह्मण धर्म की देव प्रतिमाओं का निर्माण

कुषाणकला के पुजारियों ने जैन तथा बौद्ध धर्मों के समान ही ब्राह्मण धर्म की भी सेवा की। वैष्णव, शाक्त व सौर संप्रदाय ब्राह्मण धर्म के प्रमुख अंग हैं। शैवों को उसी के अन्तर्गत माना जाता है। गुप्तकाल तक पहुँचते पहुँचते इसमें गणेश उपासकों का भी गाणपत्य के नाम से समावेश हुआ। इस प्रकार विष्णु, दुर्गा, शिव, सूर्य व गणपति की उपासना पंचदेवोपासना के नाम से प्रसिद्ध हुई। ललितविस्तर एवं अन्य ग्रन्थों में, जो कुषाणकाल में विद्यमान थे, ब्राह्मण धर्म के तत्कालीन देवी-देवताओं की मूर्तियों की एक तालिका मिलती है जसमें शिव, स्कन्द, सूर्य, चन्द्र, ब्रह्म, नारायण, वैश्रवण, कुबेर, शक व लोकपाल की प्रतिमाओं को प्रमुखता से गिनाया गया है [5]। इनमें लगभग सभी की मूर्तियाँ कुषाणकाल में उपलब्ध हैं। कुषाणकाल में गणपति की उपासना मूर्ति-रूप में कदाचित अधिक प्रचलित नहीं थी, पर इसके स्थान पर कार्तिकेय, व कुबेर ख़ूब पूजे जाते थे। ब्रह्मा की केवल इनी-गिनी मूर्तियाँ मिली हैं। इन सभी देवमूर्तियों की अपनी विशेषताएं हैं इनमें से अधिकतर प्रतिमाएं दोनों ओर (in round) उकेरी गई हैं। पीछे की ओर या तो मूर्ति का पृष्ठ भाग अंकित है अथवा वृक्ष बना हुआ है जिस पर गिलहरी, तोता आदि बैठे हुए दिखलाये गये हैं।

विष्णु मूर्ति

वैष्णव संप्रदाय की पंचवीर प्रतिमाओं का उल्लेख पहिले ही हो चुका है। दुर्भाग्य से ये प्रतिमाएं खण्डित अवस्था में मिली हैं। अत: उनके विषय में कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता। पर इस काल की बनी चतुर्भुज विष्णु की अखण्डित प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं जो अपनी अधोलिखित विशेषताओं के कारण महत्त्वपूर्ण हैं:

शिवमूर्ति

पूजन के लिए शिव की पुरुषाकार प्रतिमा तथा लिंग दोनों प्रचलित थे। शिवलिंग का पूजन विदेशी लोग भी करते थे और आज के समान कभी-कभी पीपल के पेड़ों के नीचे इन लिंगों की स्थापना की जाती थी। इस काल की कलाकृतियों में ये दृश्य विद्यमान हैं।* साधारण लिंगों के अतिरिक्त एकमुखी लिंग भी बनाये और पूजे जाते थे। [6]

शिवलिंग के समान शिव की पुरुषाकार प्रतिमाएं भी लोकप्रिय हो रही थीं। कुषाण सम्राट विम के समय से अन्तिम शासक वासुदेव तक कितने ही कुषाण सिक्के शिव की प्रतिमा से अंकित होते रहे। पाषाण कलाकृतियों में निम्नांकित विशेषताओं के साथ शिवमूर्ति के दर्शन होते हैं।

शक्ति प्रतिमाएं

देवी की मूर्तियों में लक्ष्मी, महिषमर्दिनी दुर्गा व मातृकाओं की मुख्यत: गणना की जा सकती हे। उनके अतिरिक्त हारीति व वसुधारा की प्रतिमाएं भी मिलती हैं। लक्ष्मी और गजलक्ष्मी की प्रतिमा तो भरहूत और सांची से ही चली आ रही थी* और ब्राह्मण धर्म के समान बौद्धों के यहाँ भी समादृत हो चुकी थी। मथुरा ने थोड़े परिवर्तनों के साथ उसे अपनाया। यहाँ हमें लक्ष्मी के तीन रूप मिलते हैं;

दुर्गा के रूपों में यहाँ केवल चतुर्भुज दुर्गा का रूप मिलता है। उसके ऊपरी हाथों में तलवार और ढाल है, निचले दाहिने हाथ में त्रिशूल है और निचले बांयें हाथ से वह महिष को दबा रही है। असुर भी पशु रूप में ही है, मानव-पशु के रूप में नहीं। दुर्गा के आठ हाथ, दस हाथ और अठारह हाथ वाले रूप बाद में बने, कुषाण काल में वे नहीं दिखलाई पड़ते। [8]

मातृकाओं का कुषाणकाल में पर्याप्त बोलबाला रहा। कुषाण कालीन जो मातृकापट्ट हमें मिला है, उस पर अंकित देवियां मानव मुखों से नहीं अपितु पशुपक्षियों के मुखों से युक्त हैं और प्रत्येक की गोद में एक शिशु है। उनकी संख्या भी अनिवार्यत: सात नहीं है।

अन्य देवियों में देवी हारीति का स्थान मुख्य है। इनकी कुषाणकालीन प्रतिमाए अच्छी मात्रा में उपलब्ध हुई हैं जिनमें ये बच्चों से घिरी हुई अकेली अथवा कुबेर के साथ दिखलाई पड़ती हैं। वसुधारा संपन्नता और ऐश्वर्य की देवी मानी जाती है। पूर्णघट व मत्स्य-युग्म इसके मुख्य चिह्न हैं। मथुरा में इस देवी का पूजन भी पर्याप्त लोकप्रिय था। पाषाण के साथ-साथ मिट्टी की बनी हुई इसकी अनेक मूर्तियां यहाँ से मिली हैं।

सूर्य प्रतिमाएं

सूर्य का पूजन दो प्रकार से किया जाता हे। एक तो मण्डलाकार बिम्ब का पूजन और दूसरे मानवरूपिणी सूर्य-प्रतिमा का पूजन। सूर्य की भारतीय पद्धति की नराकार प्रतिमा, जिसे कुषाणकाल के पूर्व की माना जाता है, बुद्ध-गया से मिली है। वह रथारूढ़ है परन्तु यह रूप भारत में विशेषकर कुषाणकाल में लोकप्रिय न हो सका। इसका कदाचित यह भी कारण था कि मानवाकार सूर्य की उपासना हमारे यहाँ मुख्यत: ईरान से आई। ये विदेशी लोग, जिन्हें भारतीय साहित्य में मग नाम से पुकारा गया, अपने साथ सूर्योपासना की पद्धति ले आये। इन्हीं के वेश के समान इनके देवताओं की वेश-भूषा होना स्वाभाविक था। इसलिये कुषाणकाल की सूर्यमूर्तियां लम्बा कोट, चुस्त पाजामा और ऊंचे बूट पहले हुए दिखलाई पड़ती हैं। इस वेश को भारत में उदीच्य वेश के नाम से पुकारा गया। कुषाणकालीन माथुरी कला में रथारूढ़ एवं आसनारूढ़ सूर्य की लम्बा कोट, बूट, गोल टोपी तथा इने-गिने अलंकार धारण की हुई प्रतिमाएं मिली हैं। एक मूर्ति में उनके छोटे पंख भी दिखलाये गये हैं (सं0 सं0 डी0 46); दूसरी में उनके आसन पर ठीक वैसी ही अग्नि की वेदी बनी है जैसी कतिपय ईरानी सिक्कों पर पायी जाती है।

अन्य प्रतिमाएं

ऊपर गिनाई हुई मूर्तियों के अतिरिक्त कार्तिकेय, कुबेर, इन्द्रअग्नि की मूर्तियां भी कुषाणकाल में बनीं। अन्य देवताओं के समान इन देवताओं के ध्यान कुषाणकाल में बड़े ही सीधे सादे थे। कार्तिकेय का मुख्य चिह्न था शक्ति या भाला। एक मुख द्विभुजशक्तिधर कुमार कार्तिकेय की सुन्दर प्रतिमा इस संग्रहालय में है जो शक संवत 11 अर्थात ई॰ सन् 89 में बनी थी (सं0 सं0 42.2949)। कुबेर की मूर्तियों का मथुरा में वैपुल्य है। मोटे पेट वाले स्थूलकाय धन के देवता कुबेर देखते ही बनते हैं। कभी वे पालथी मार कर सुख से स्मित करते हुए बैठे दिखलाई पड़ते हैं, कभी मदिरा का चषक हाथ में लिये रहते हैं और कभी लक्ष्मी एवं हारीति के साथ एक ही शिलापट्ट पर शोभित रहते हैं। अग्नि की मुख्य पहिचान उनकी तुंदिल तनु, यज्ञोपवीत, जटाभार व पीछे दिखलाई पड़ने वाली ज्वालाएं हैं (सं0 सं0 40.2880, 40.2883)। इनके विशेष आयुध, वाहन मेष आदि बातें कुषाणकालीन मूर्तियों में नहीं दिखलाई पड़ती।

इन प्रमुख देवी-देवताओं के अतिरिक्त माथुरी कला में नाग, व नाग-स्त्रियों की प्रतिमाएं भी अच्छी मात्रा में मिलती हैं कुषाणकाल में यहाँ पर दधिकर्ण नाग का मन्दिर विद्यमान थां इस नाग की लेखांकित प्रतिमा यहाँ से मिली है। नाग प्रतिमाओं में अन्य नागों के अतिरिक्त बलराम की मूर्तियों को भी गिनना होगा। पुराणों के अनुसार बलराम शेषावतार थे। उनकी हल और मूसल को धारण करने वाली एक शुंगकालीन मूर्ति यहाँ से मिली है। यह इस समय लखनऊ के संग्रहालय में है। कुषाणकालीन बलराम की मूर्तियों में वे हाथ में मद्य का प्याला लिये दिखलाई पड़ते हैं, गले में वनमाला पड़ी रहती है, पीछे सर्प की फणा बनी रहती है। इस पर कभी-कभी स्वस्तिक, मत्स्ययुग्म, पूर्णघट आदि अष्टमांगलिक चिह्न भी बने होते हैं।* साधारणतया यहाँ नाग की प्रतिमाएं मनूष्याकार ही होती हैं, केवल मस्तक के ऊपर सर्पफणा बनी रहती है। हाथ में बहुधा छोटा सा जल कुंभ रहता है। नाग-स्त्रियों की मूर्तियों भी लगभग ऐसी ही होती हैं। एक विशेष मूर्ति ऐसी भी मिली है जिसमें एक नागरानी के कंधों से पांच अन्य नाग शक्तियां उद्भूत होती हुई दिखलाई गई हैं। इस प्रकार धर्म निरपेक्ष भाव से नास्तिक एवं आस्तिक दोनों प्रकार के संप्रदायों की सेवा करते हुए कला के एक ऊंचे आदर्श की स्थापना करना माथुरी कला का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. नीलकंठ पुरुषोत्तम जोशी, मथुरा कला में मांगलिक चिह्न, आज, वाराणसी, 16 फ़रवरी, 1964।
  2. वासुदेवशरण अग्रवाल, The Presiding Deity of Child Birth etc., Jain Antiquary, मार्च 1937, पृ0 75-79।
  3. प्रस्तुत विवेचन के आधार निम्नांकित हैं—
    (क) आनन्द कुमारस्वामी HIIA., पृ0 52,53,62।
    (ख) डा॰ वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखाई गई टिप्पणियां
  4. देखिये- आनन्द कुमारस्वामी, HIIA., पृ0 57, Age of the Imperial Unity, खण्ड 2, पृ0 522-23 वासुदेवशरण अग्रवाल, Buddha and Bodhisatta Images, JUPHS., खण्ड 21, पृ0 77।
  5. ललितविस्तर, 8, पृ0 84। दिव्यावदान, 27, 38; पृ0 493-94।
  6. राज्य संग्रहालय, भरतपुर (राजस्थान) में उत्तर शुंग या प्रारम्भिक कुषाण-काल का एक बड़ा-सा एक मुख शिवलिंग है। लखनऊ संग्रहालय में भी एक ऐसा ही सुन्दर लिंग है। (संख्या एच. 2)। हाल ही में एक कुषाण कालीन चतुर्मुख लिंग का पता लगा है, जिस पर ऊर्ध्व-मेढ्र लकुलीश और विष्णु बने हैं – रत्नचन्द्र अग्रवाल, Interesting Terracottas and Sculptures, Indian Historical Quarterly. दिसम्बर 1962, पृ0 262-63।
  7. यह मूर्ति कौशाम्बी से मिली है-ASIR., 1913-14, फलक 70 बी; गांधार कला में भी शिव प्रतिमाएं मिली हैं- वी. नटेश ऐयर, Trimurti Image, ASIR., 1913-14, पृ0 276-80, फलक 72 ए।
  8. अधिक अध्ययन के लिए देखिये, रत्नचन्द्र अग्रवाल, The Goddess Mahishasura- mardini in Kushana Art. Artibus Asiae, खण्ड 19, 3-4 अस्कोना, स्विट्जरलैण्ड, पृ0 368-73।
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