बुद्ध की शिक्षा

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बुद्ध गुण

विषय सूची

बुद्ध में अनन्तानन्त गुण होते हैं। उन्हें चार भागों में वर्गीकृत किया जाता है, यथा-

  1. काय गुण,
  2. वाग-गुण,
  3. चित्त गुण एवं
  4. कर्म गुण।
  1. निराभोग कर्म और
  2. अविच्छिन्न कर्म।

भगवान बुद्ध की शिक्षा

मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं उन दु:खों का प्रहाण अपने सही ज्ञान द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता। सत्य या यथार्थता का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है। अत: सत्य की खोज दु:खमोक्ष के लिए परमावश्यक है। खोज अज्ञात सत्य की ही की जा सकती है। यदि सत्य किसी शास्त्र, आगम या उपदेशक द्वारा ज्ञात हो गया है तो उसकी खोज नहीं। अत: बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को नकार दिया और अपने लिए नए सिरे से उसकी खोज की। बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न तो अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा। उन्होंने कहा कि मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कही है। उस पर भी सन्देह करो और विविध परीक्षाओं द्वारा उसकी परीक्षा करो। जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो, यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो। यही कारण था कि उनका धर्म रहस्याडम्बरों से मुक्त, मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत एवं हृदय को सीधे स्पर्श करता था।

त्रिविध धर्मचक्र प्रवर्तन

भगवान बुद्ध प्रज्ञा व करुणा की मूर्ति थे। ये दोनों गुण उनमें उत्कर्ष की पराकाष्ठा प्राप्त कर समरस होकर स्थित थे। इतना ही नहीं, भगवान बुद्ध अत्यन्त उपायकुशल भी थे। उपाय कौशल बुद्ध का एक विशिष्ट गुण है अर्थात वे विविध प्रकार के विनेय जनों को विविध उपायों से सन्मार्ग पर आरूढ़ करने में अत्यन्त प्रवीण थे। वे यह भलीभाँति जानते थे कि किसे किस उपाय से सन्मार्ग पर आरूढ़ किया जा सकता है। फलत: वे विनेय जनों के विचार, रूचि, अध्याशय, स्वभाव, क्षमता और परिस्थिति के अनुरूप उपदेश दिया करते थे। भगवान बुद्ध की दूसरी विशेषता यह है कि वे सन्मार्ग के उपदेश द्वारा ही अपने जगत्कल्याण के कार्य का सम्पादन करते हैं, न कि वरदान या ऋद्धि के बल से, जैसे कि शिव या विष्णु आदि के बारे में अनेक कथाएं पुराणों में प्रचलित हैं। उनका कहना है कि तथागत तो मात्र उपदेष्टा हैं, कृत्यसम्पादन तो स्वयं साधक व्यक्ति को ही करना है। वे जिसका कल्याण करना चाहते हैं, उसे धर्मों (पदार्थों) की यथार्थता का उपदेश देते थे। भगवान बुद्ध ने भिन्न-भिन्न समय और भिन्न-भिन्न स्थानों में विनेय जनों को अनन्त उपदेश दिये थे। सबके विषय, प्रयोजन और पात्र भिन्न-भिन्न थे। ऐसा होने पर भी समस्त उपदेशों का अन्तिम लक्ष्य एक ही था और वह था विनेय जनों को दु:खों से मुक्ति की ओर ले जाना। मोक्ष या निर्वाण ही उनके समस्त उपदेशों का एकमात्र रस है।

धर्मचक्रों की नेयनीतार्थता

विज्ञानवाद और स्वातन्त्रिक माध्यमिकों के अनुसार नीतार्थसूत्र वे हैं, जिनका अभिप्राय यथारुत (शब्द के अनुसार) ग्रहण किया जा सकता है तथा नेयार्थ सूत्र वे हैं, जिनका अभिप्राय शब्दश: ग्रहण नहीं किया जा सकता, अपितु उनका अभिप्राय खोजना पड़ता है, जैसे- माता और पिता की हत्या करने से व्यक्ति निष्पाप होकर निर्वाण प्राप्त करता है। मातर पितरं हत्वा....अनीघो याति ब्राह्मणो* इस वचन का अर्थ शब्दश: ग्रहण नहीं किया जा सकता, अपितु यहाँ पिता का अभिप्राय कर्मभव और माता का अभिप्राय तृष्णा से है। इस प्रकार की देशना आभिप्रायिकी या नेयार्था कहलाती है। प्रासंगिक माध्यमिकों के मत में नेयार्थ और नीतार्थ की व्याख्या उपर्युक्त व्याख्या से किञ्चित भिन्न है। उनके अनुसार जिन सूत्रों का प्रतिपाद्य विषय परमार्थ सत्य अर्थात शून्यता, अनिमित्तता, अनुत्पाद, अनिरोध आदि हैं, वे नीतार्थ सूत्र हैं तथा जिन सूत्रों का प्रतिपाद्य विषय संवृति सत्य है, वे नेयार्थ सूत्र हैं। नेयार्थता और नीतार्थता की व्यवस्था वे आर्य –अक्षयमतिनिर्देशसूत्र के अनुसार करते हैं।

प्रथम धर्मचक्रप्रवर्तन

काल की दृष्टि से यह प्रथम है। वाराणसी का ऋषिपतन मृगदाव इसका स्थान है। इसके विनेय जन (पात्र) श्रावकवर्गीय वे लोग हैं, जो स्वलक्षण और बाह्यार्थ की सत्ता पर आधृत चतुर्विध आर्य सत्यों की देशना के पात्र (भव्य) हैं स्वलक्षण सत्ता एवं बाह्य सत्ता के आधार पर चार आर्यसत्यों की स्थापना इस प्रथम धर्मचक्र की विषयवस्तु है। श्रावकवर्गीय लोगों की दृष्टि से यह नीतार्थ देशना है। योगाचार और माध्यमिक इसे नेयार्थ देशना मानते हैं।

द्वितीय धर्मचक्र प्रवर्तन

काल की दृष्टि से यह मध्यम है। इसका स्थान प्रमुखत: गृध्रकूट पर्वत है। इसके विनेय जन महायानी पुद्गल हैं। शून्यता, अनिमित्तता, अनुत्पाद, अनिरोध आदि उसके प्रमुख प्रतिपाद्य विषय हैं। इस देशना के द्वारा समस्त धर्म नि:स्वभाव प्रतिपादित किये गये हैं। विज्ञानवादी इसे नेयार्थ देशना मानते हैं। आचार्य भावविवेक, ज्ञानगर्भ, शान्तरक्षित, कमलशील आदि स्वातन्त्रिक माध्यमिकों का इस देशना की नेयार्थता और नीतार्थता के बारे में प्रासङ्गिक माध्यमिकों से मतभेद हैं। उनके अनुसार आर्य शतसाहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता आदि कुछ सूत्र नीतार्थ सूत्र हैं, क्योंकि इनमें समस्त धर्मों की परमार्थत: नि:स्वभावता निर्दिष्ट है। भगवती प्रज्ञापारमिता हृदयसूत्र आदि कुछ सूत्र यद्यपि द्वितीय धर्मचक्र के अन्तर्गत संगृहीत हैं, तथापि वे नीतार्थ नहीं माने जाते, क्योंकि इनके द्वारा जिस प्रकार की सर्वधर्मनि:स्वभावना प्रतिपादित की गई है, उस प्रकार की नि:स्वभावता स्वातन्त्रिक माध्यमिकों को मान्य नहीं है। यद्यपि इन सूत्रों का अभिप्राय भी परमार्थत: नि:स्वभावता है, तथापि उनमें 'परमार्थत:' यह विशेषण स्पष्टतया उल्लिखित नहीं है, जो कि उनके मतानुसार नीतार्थ सूत्र होने के लिए परमावश्यक है।

तृतीय धर्मचक्रप्रवर्तन

काल की दृष्टि से यह अन्तिम है। इसका स्थान वैशाली आदि प्रमुख हैं। श्रावक एवं महायानी दोनों प्रकार के पुद्गल इसके विनेय जन हैं। शून्यता, अनुत्पाद, अनिरोध आदि इसके विषयवस्तु हैं। विज्ञानवादियों के अनुसार यह नीतार्थ देशना है। यद्यपि द्वितीय और तृतीय दोनों धर्मचक्रो में शून्यता प्रतिपादित की गई है, तथापि द्वितीय धर्मचक्र में समस्त धर्मों को समान रूप से नि:स्वभाव कहा गया है, जबकि इस तृतीय धर्मचक्र में यह भेद किया गया है कि अमुक धर्म अमुक दृष्टि से नि:स्वभाव है और अमुक धर्म नि:स्वभाव नहीं, अपितु सस्वभाव है। इसी के आधार पर विज्ञानवादी दर्शन प्रतिष्ठित है। इस कारण विज्ञानवादी समस्त धर्मों को समानरूप से नि:स्वभाव नहीं मानते। उनके अनुसार धर्मों में से कुछ नि:स्वभाव हैं और कुछ सस्वभाव हैं। अत: वे समान रूप से सर्वधर्मनि:स्वभावता प्रतिपादक द्वितीय धर्मचक्र को नीतार्थ नहीं मानते। उनके मतानुसार जो सूत्र धर्मों की नि:स्वभावता और सस्वभावता का सम्यक विभाजन करते हैं, वे ही नीतार्थ माने जाते हैं। इनमें आर्यसन्धिनिर्मोचनसूत्र प्रमुख है।

  1. वैभाषिक,
  2. सौत्रान्तिक,
  3. योगाचार (विज्ञानवाद) और
  4. माध्यमिक (शून्यवाद)।

दार्शनिक मन्तव्यों को समझने से पहले भगवान बुद्ध की उन सामान्य शिक्षाओं की चर्चा करना चाहते हैं, जो सभी चारों दार्शनिक प्रस्थानों में समानरूप से मान्य हैं, यद्यपि उनकी व्याख्या में मतभेद हैं।

बुद्ध की शिक्षा की सार्वभौमिकता

भाषा

भगवान बुद्ध ने किस भाषा में उपदेश दिए, इसे जानने के लिए हमारे पास पुष्कल प्रामाणिक सामग्री का अभाव है, फिर भी इतना निश्चित है कि उनके उपदेशों की भाषा कोई लोकभाषा ही थी। इसके अनेक कारण हैं।

  1. पहला यह कि वह अपना सन्देश जन-जन तक पहुँचाना चाहते थे, न कि विशिष्ट जनों तक ही। इसके लिए आवश्यक था कि वे जनभाषा में ही उपदेश देते।
  2. दूसरा यह कि भाषा विशेष की पवित्रता पर उनका विश्वास न था। वे यह नहीं मानते थे कि शुद्ध भाषा के उच्चारण से पुण्य होता है। बुद्ध ने कहा कि मैं अपनी-अपनी भाषा में उन्हें संगृहीत करने की अनुमति प्रदान करता हूँ- 'अनुजानामि भिक्खवे, सकाय निरुत्तिया बुद्धवचनं परियापुणितुं ति*'। फलत: उनके उपदेश पैशाची, संस्कृत, अपभ्रंश, मागधी आदि अनेक भाषाओं में संकलित हुए।

मानव-समता

भगवान बुद्ध के अनुसार धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में सभी स्त्री एवं पुरुषों में समान योग्यता एवं अधिकार हैं। इतना ही नहीं, शिक्षा, चिकित्सा और आजीविका के क्षेत्र में भी वे समानता के पक्षधर थे। उनके अनुसार एक मानव का दूसरे मानव के साथ व्यवहार मानवता के आधार पर होना चाहिए, न कि जाति, वर्ण, लिङ्ग आदि के आधार पर। क्योंकि सभी प्राणी समानरूप से दु:खी हैं, अत: सब समान हैं। दु:ख प्रहाण ही उनके धर्म का प्रयोजन है। अत: संवेदना और सहानुभूति ही इस समता के आधारभूत तत्त्व हैं। उन्होंने कहा कि जैसे सभी नदियाँ समुद्र में मिलकर अपना नाम, रूप और विशेषताएं खो देती हैं, उसी प्रकार मानवमात्र उनके संघ में प्रविष्ट होकर जाति, वर्ण आदि विशेषताओं को खो देते हैं और समान हो जाते हैं। निर्वाण ही उनके धर्म का एकमात्र रस है।

मानवश्रेष्ठता

बुद्ध के अनुसार मानवजन्म अत्यन्त दुर्लभ है। मनुष्य में वह बीज निहित है, जिसकी वजह से यदि वह चाहे तो अभ्युदय एवं नि:श्रेयस अर्थात् निर्वाण और बुद्धत्व जैसे परम पुरुषार्थ भी सिद्ध कर सकता है। देवता श्रेष्ठ नहीं हैं, क्योंकि वे व्यापक तृष्णा के क्षेत्र के बाहर नहीं हैं। अत: मनुष्य उनका दास नहीं है, अपितु उनके उद्धार का भार भी मनुष्य के ऊपर ही हैं। इसीलिए उन्होंने कहा कि भिक्षुओं, बहुजन के हित और सुख के लिए तथा देव और मनुष्यों के कल्ण के लिए लोक में विचरण करो। ऋषिपतन मृगदाव (सारनाथ) में अपने प्रथम वर्षावास के अनन्तर भिक्षुओं को उनका यह उपदेश मानवीय स्वतन्त्रता और मानवश्रेष्ठता का अप्रतिम उद्षोष है।

व्यावहारिकता

बुद्ध की शिक्षा अत्यन्त व्यावहारिक थी। उसमें किसी भी तरह के रहस्यों और आडम्बरों के लिए कोई स्थान न थां उनका चिन्तन प्राणियों के व्यापक दु:खों के कारण की खोज से प्रारम्भ होता है, न कि किसी अत्यन्त निगूढ, गुहाप्रविष्ट तत्त्व की खोज से। वे यावज्जीवन दु:खों के अत्यन्त निरोध का उपाय ही बताते रहे। उन्होंने ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने से इन्कार कर दिया और उन्हें अव्याकरणीय (अव्याख्येय) करार दिया, जिनके द्वारा यह पूछा जाता था कि यह लोक शाश्वत है कि अशाश्वत; यह लोक अनन्त है कि सान्त अथवा तथागत मरण के पश्चात होते हैं या नहीं- इत्यादि। उनका कहना था कि ऐसे प्रश्न और उनका उत्तर न अर्थसंहित है और न धर्मसंहित।

मध्यमा प्रतिपदा

भगवान बुद्ध ने जिस धर्मचक्र का प्रवर्तन किया अथवा जिस मार्ग का उन्होंने उपदेश किया, उसे 'मध्यमा प्रतिपदा' कहा जाता है। परस्पर-विरोधी दो अन्तों या अतियों का निषेध कर भगवान ने मध्यम मार्ग प्रकाशित किया है। मनुष्य का स्वभाव है कि वह बड़ी आसानी से किसी अन्त में पतित हो जाता है और उस अन्त को अपना पक्ष बनाकर उसके प्रति आग्रहशील हो जाता है। यह आग्रहशीलता ही सारे मानवीय विभेदों, संघर्षों और दु:खों का मूल है। मध्यमा प्रतिपद् अनाग्रहशीलता है और समस्याओं से मुक्ति का सर्वोत्तम राजपथ हैं इसका क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है और इसमें अनन्त सम्भावनाएं निहित है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं के समाधान में भी इसकी उपयोगिता सम्भावित हैं, किन्तु अभी तक उन दिशाओं में इसका अध्ययन और प्रयोग नहीं किया जा सका। शील, समाधि और प्रज्ञा या दर्शन के क्षेत्र में ही उसकी प्राचीन व्याख्याएं उपलब्ध होती हैं। लीनता और उद्धव (औद्धत्व) ये दोनों दोष हैं, जो समाधि के बाधक हैं। समाधि चित्त का समप्रवाह है। यह समाधि की दृष्टि से मध्यमप्रतिपदा है। प्रज्ञा की दृष्टि से शाशवतवाद (नित्यता के प्रति आग्रह) एक अन्त है और उच्छेदवाद (ऐहिकवाद) दूसरा अन्त है। इन दोनों अन्तों का निरास मध्यमा प्रतिपद् है। यही सम्यग् दृष्टि है। इसके बिना अभ्युदय और नि:श्रेयस कोई भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं किया जा सकता। सभी बौद्ध दार्शनिक मध्यम-प्रतिपदा स्वीकार करते हैं, किन्तु वे शाश्वत और उच्छेद अन्त की भिन्न-भिन्न व्याख्याएं करते हैं।

प्रतीत्यसमुत्पाद

प्रतीत्यसमुत्पाद सारे बुद्ध विचारों की रीढ़ है। बुद्ध पूर्णिमा की रात्रि में इसी के अनुलोम-प्रतिलोम अवगाहन से बुद्ध ने बुद्धत्व का अधिगत किया। प्रतीत्यसमुत्पाद का ज्ञान ही बोधि है। यही प्रज्ञाभूमि है। अनेक गुणों के विद्यमान होते हुए भी आचार्यों ने बड़ी श्रद्धा और भक्तिभाव से ऐसे भगवान बुद्ध का स्तवन किया है, जिन्होंने अनुपम और अनुत्तर प्रतीत्यसमुत्पाद की देशना की है। चार आर्यसत्य, अनित्यता, दु:खता, अनात्मता क्षणभङ्गवाद, अनात्मवाद, अनीश्वरवाद आदि बौद्धों के प्रसिद्ध दार्शनिक सिद्धान्त इसी प्रतीत्यसमुत्पाद के प्रतिफलन हैं।

कर्मस्वातन्त्र्य

बौद्धों का कर्म-सिद्धान्त भारतीय परम्परा में ही नहीं, अपितु विश्व की धार्मिक परम्परा में बेजोड़ एवं सबसे भिन्न है। प्राय: सभी लोग कर्म को जड़ मानते हैं, अत: कर्मों के कर्ता को उन कर्मों के फल से अन्वित करने के लिए एक अतिरिक्त चेतन या ईश्वर के अस्तित्व की आवश्यकता महसूस करते हैं। उनके अनुसार ऐसे अतिरिक्त चेतन के अभाव में कर्म-कर्मफल व्यवस्था बन नहीं सकेगी और सारी व्यवस्था अस्तव्यस्त हो जाएगी। जबकि बौद्ध लोग कर्म को जड़ ही नहीं मानते। भगवान बुद्ध ने कर्म को 'चेतना' कहा है* कर्म क्योंकि चेतना है, अत: वह अपने फल को स्वयं अंगीकार या आकृष्ट कर लेती है। चेतना-प्रवाह में कर्म-कर्मफल की सारी व्यवस्था सुचारुतया सम्पन्न हो जाती है। इसलिए फल देने के लिए एक अतिरिक्त चेतन या ईश्वर को मानने की उन्हें कतई आवश्यकता नहीं हैं इसीलिए विश्व के सारे आध्यात्मिक धर्मों के बीच में बौद्ध एकमात्र अनीश्वरवादियों में प्रमुख हैं।

अपने सुख-दु:खों के लिए प्राणी स्वयं ही उत्तरदायी हैं। अपने अज्ञान और मिथ्यादृष्टियों से ही उन्होंने स्वयं अपने लिए दु:खों का उत्पाद किया है, अत: कोई दूसरी शक्ति ईश्वर या महेश्वर उन्हें मुक्त नहीं कर सकता। इसके लिए उन्हें स्वयं प्रयास करना होगा। किसी के वरदान या कृपा से दु:खमुक्ति असम्भव है। कोई महापुरुष, जिसने अपने दु:खों का प्रहाण कर लिया हो, अपने अनुभव के आधार पर दु:खमुक्ति का मार्ग अवश्य बता सकता है, किन्तु उसकी बातों की परीक्षा कर, सही प्रतीत होने पर उस मार्ग पर प्राणी को स्वयं चलना होगा। इस कर्म सिद्धान्त के द्वारा मानव-स्वतन्त्रता और आत्म-उत्तरदायित्व का विशिष्ट बोध प्रतिफलित होता है। यह भारतीय संस्कृति में बौद्धों का अनुपम योगदान है।

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