अठारह बौद्ध निकाय

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अठारह बौद्ध निकाय

विषय सूची

  1. एकव्यावहारिक और
  2. गोकुलिक।
  1. प्रज्ञप्तिवादी और
  2. बाहुलिक या बाहुश्रुतिक।
  1. धर्मोत्तरीय,
  2. भद्रयाणिक,
  3. छन्रागरिक (षाण्णागरिक) और
  4. सम्मितीय।
  1. धर्मगुप्तिक और
  2. सर्वास्तिवादी।

निकायों की परिभाषा

महासांघिक

स्थविरवाद

'स्थविरवाद' शब्द के अनेक अर्थ होते हैं। स्थविर का अर्थ 'वृद्ध' भी है और 'प्राचीन' भीं अत: वृद्धों का या प्राचीनों का जो वाद (मार्ग) है, वह 'स्थविरवाद' है। 'स्थविर' शब्द स्थिरता को भी सूचित करता है। विनय-परम्परा के अनुसार जिस भिक्षु के उपसम्पदा के अनन्तर दस वर्ष बीत गए हों तथा जो विनय के अङ्गों और उपाङ्गों को अच्छा ज्ञाता होता है, वह 'स्थविर' कहलाता है। इसके अलावा वह भी स्थविर कहलाता है जो स्थविरगोत्रीय होता है अर्थात जिसकी रुचि आदि स्थविरवादी सिद्धान्तों की ओर अधिक प्रवण होते हैं और जो उन सिद्धान्तों का श्रद्धा के साथ व्याख्यान करता है। ऐसे स्थविरों का वाद 'स्थविरवाद' है।

सर्वास्तिवाद

किसी समय (प्राचीन काल में) पश्चिमोत्तर भारत में विशेषत: मथुरा, कश्मीर और गान्धार आदि प्रदेशों में सर्वास्तिवादियों का बहुल प्रचार था। सर्वास्तिवादी सिद्धान्तों को मानने वाले बौद्ध आजकल विश्व में शायद ही कहीं हों। किन्तु भोटदेशीय भिक्षु-परम्परा सर्वास्तियावादी विनय का अवश्य अनुसरण करती है। कतिपय विशिष्ट सिद्धान्तों के आधार पर 'सर्वास्तिवाद' यह नामकरण हुआ है। इसमें प्रयुक्त 'सर्व' शब्द का तात्पर्य तीनों कालों अर्थात भूत, भविष्य और वर्तमान कालों से हैं। जो लोग वस्तुओं की तीनों कालों में सत्ता मानते हैं और जो तीनों का द्रव्यत: अस्तित्व स्वीकार करते हैं, वे 'सर्वास्तिवादी' कहलाते हैं।

एकव्यावहारिक

जो लोग एक क्षण में बुद्ध की सर्वज्ञता का उत्पाद मानते हैं, वे 'एकव्यावहारिक' कहलाते हैं। अर्थात इनके मतानुसार एक चित्तक्षण से सम्प्रयुक्त प्रज्ञा के द्वारा समस्त धर्मों का अवबोध हो जाता है। इस एकक्षणावबोध को स्वीकार करने के कारण इनका यह नामकरण हुआ है। महावंस टीका के अनुसार एकव्यावहारिक और गोकुलिक ये दोनों निकाय सभी कुशल-अकुशल संस्कारों को ज्वालारहित अङ्गार से मिश्रित भस्मनिरय के समान समझते हैं।

लोकोत्तरवाद

कुछ लोग बुद्ध के काय में सास्त्रव धर्मों का बिल्कुल अस्तित्व नहीं मानते और कुछ मानते हैं। ये लोकोत्तरवादी बुद्ध की सन्तति में सास्रव धर्मों का अस्तित्व सर्वथा नहीं मानते। इनके मतानुसार सम्यक सम्बोधि की प्राप्ति के अनन्तर बुद्ध के सभी आश्रय अर्थात चित्त, चैतसिक, रूप आदि परावृत्त होकर निरास्रव और लोकोत्तर हो जाते हैं। यहाँ 'लोकोत्तर' शब्द अनास्रव के अर्थ में प्रयुक्त है। जो इस अनास्रवत्व को स्वीकार करते हैं, वे लोकोत्तरवादी हैं। यहाँ 'लोकोत्तर' शब्द का अर्थ मानवोत्तर के अर्थ में नहीं हैं इनकी मान्यता के अनुसार क्षणभङ्गवाद की दृष्टि से पहले सभी धर्म सास्रव होते हैं। बोधिप्राप्ति के अनन्तर सास्रव धर्म विरुद्ध हो जाते हैं और अनास्रव धर्म उत्पन्न होते हैं। यह ज्ञात नहीं है कि ये लोग महायानियों की भाँति बुद्ध का अनास्राव ज्ञानधर्मकाय मानते हैं अथवा नहीं।

प्रज्ञप्तिवादी

कुछ वादी ऐसे होते हैं, जो परस्पर आश्रित सभी धर्मों को प्रज्ञप्त (कल्पित) मानकर उनके प्रति सत्यत: अभिनिवेश करते हैं, वे ही प्रज्ञप्तिवादी है। महावंशटीका के अनुसार 'रूप भी निर्वाण की भाँति परमार्थत: है' – ऐसा मानने वाले प्रज्ञप्तिवादी कहलाते हैं।

वात्सीपुत्रीय

स्थविरवादी संघ से जो सर्वप्रथम निकाय भेद विकसित हुआ, वह वात्सीपुत्रीय निकाय ही है। स्थविरों से इनका सैद्धान्तिक मतभेद था। ये लोग पुद्गलास्तित्ववादी थे। अर्थात ये पुद्गल के द्रव्यत: अस्तित्व के पक्षपाती थे और उसे अनिर्वचनीय कहते थें यह निकाय स्थविरवादियों का प्रमुख प्रतिपक्ष रहा है। यही कारण है कि तृतीय संगीति के अवसर पर जो सम्राट् अशोक के काल में पाटलिपुत्र (पटना) में आयोजित हुई थी, उसमें मुद्गलीपुत्र तिष्य ने स्वविरवाद से भिन्न सत्रह निकायों का खण्डन करते हुए जिस 'कथावत्थु' नामक ग्रन्थ की रचना की थी, उस ग्रन्थ में उन्होंने सर्वप्रथम पुद्गलवादी वात्सीपुत्रीयों का ही खण्डन किया। इससे यह भी निष्कर्ष प्रतिफलित होता है कि तृतीय संगीति से पूर्व ही इनका अस्तित्व था। कौशाम्बी मथुरा तथा अवंती आदि इनके प्रमुख केन्द्र थे।

सम्मितीय

इस निकाय के प्रवर्तक आर्य महाकात्यायन माने जाते हैं। ये वे ही आचार्य हैं, जिन्होंने दक्षिणापथ (अवन्ती) में सर्वप्रथम सद्धर्म की स्थापना की। उस प्रदेश के निवासियों के आचार में बहुत भिन्नता देखकर विनय के नियमों में कुछ संशोधनों का भी इन्होंने सुझाव रखा था। इसी निकाय से आवन्तक और कुरुकुल्लक निकाय विकसित हुए। कभी-कभी सम्मितीयों का संग्रह वात्सीपुत्रीयों में और कभी वात्सीपुत्रीयों का संग्रह सम्मितीयों में भी देखा जाता है। इसका कारण उनके समान सिद्धान्त हो सकते हैं।

महीशासक

प्रिलुस्की महोदय के अनुसार ये लोग स्थविर पुराण के अनुयायी थे। ज्ञात है कि पुराण वही स्थविर है, जो राजगृह में जब प्रथम संगीति हो रही थी, तब दक्षिणगिरि से चारिका करते हुए पाँच सौ भिक्षुओं के साथ वहीं (राजगृह में) ठहरे हुए थे। संगीतिकारक भिक्षुओं ने उनसे संगीति में सम्मिलित होने क निवेदन किया, किन्तु उन्होंने उनके कार्य की प्रशंसा करते हुए भी उसमें भाग लेने से इन्कार कर दिया और कहा कि मैंने भगवान के मुंह से जैसा सुना है, उसी का अनुसरण करूंगा।

धर्मगुप्तक

परमार्थ के मतानुसार इस निकाय के प्रवर्तक महामौद्गलयायन के शिष्य स्थविर धर्मगुप्त थे। प्रिलस्की और फ्राउवाल्नर का कहना है कि ये धर्मगुप्त यौनक धर्मरक्षित से अभिन्न हैं।

काश्यपीय

पालि परम्परा और सांची के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि कश्यपगोत्रीय भिक्षु समस्त हिमवत्प्रदेश के निवासियों के आचार्य थे। चीनी भाषा में उपलब्ध 'विनयामातृका' नामक ग्रन्थ से भी उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है। इसीलिए काश्यपीय और हैमवत अभिन्न प्रतीत होते हैं। सुवर्षक और सद्धर्मवर्षक भी इन्हीं का नाम है। इस निकाय का हिमवत्प्रदेश में प्रचार सम्भवत: महाराज अशोक के काल में सम्पन्न हुआ, जब तृतीय संगीति के अनन्तर उन्होंने विभिन्न प्रदेशों में सद्धर्म के प्रचारार्थ धर्मदूतों को प्रेषित किया था।

विभज्यवाद

आचार्य वसुमित्र के मतानुसार यह निकाय सर्वास्तिवादी निकाय के अन्तर्गत गृहीत होता है। स्थविरवादी भी अपने को विभज्यवादी कहते हैं। आचार्य भव्य के अनुसार यह निकाय स्थविरवाद से भिन्न है। कुछ लोगों के अनुसार इन्हें हेतुवादी भी कहा जाता है। इस निकाय का यह विशिष्ट अभिमत है कि किये हुए कर्म का जब तक फल या विपाक उत्पन्न नहीं हो जाता, जब तक उस अतीत कर्म का द्रव्यत: अस्तित्व होता है। जिसने अभी फल नहीं दिया है, उस अतीत कर्म की और वर्तमान कर्म की द्रव्यसत्ता है तथा जिसने फल दे दिया है, उस अतीत कर्म की और अनागत कर्म की प्रज्ञप्तिसत्ता है- इस प्रकार कर्मों के बारे में इनकी व्यवस्था है। कर्मों के इस प्रकार के विभाजन के कारण ही इस निकाय का नाम 'विभज्यवाद' है। हेतुवादी भी इन्हीं का काम है। भूत, भौतिक समस्त वस्तुओं के हेतु होते हैं, यह इनका अभिमत है। कथावत्थु और उसकी अट्ठकथा में इस निकाय के बारे में पुष्कल चर्चा उपलब्ध होती है।

निकाय-परम्परा

आचार्य विनीतदेव आदि प्रमुख आचार्यों की मान्यता है कि चार ही मूल निकाय हैं, जिनसे आगे चल कर सभी अठारह निकाय विकसित हुए। वे हैं-

  1. आर्य सर्वास्तिवादी,
  2. आर्य महासांघिक,
  3. आर्यस्थविर एवं
  4. आर्य सम्मितीय।

मूलसंघ से जो यह विभाजन हुआ या अठारह या उससे अधिक निकायों का जो जन्म हुआ, वह किसी गतिशील श्रेष्ठ धर्म का लक्षण है, न कि ह्रास का। भगवान बुद्ध ने स्वयं ही किसी भी शास्ता के वचन या किसी पवित्र ग्रन्थ के वचन को अन्तिम प्रमाण मानने से अपने अनुयायी भिक्षुओं को मना कर दिया था। उन्होंने स्वतन्त्र चिन्तन, अपने अनुभव की प्रामाणिकता, वस्तुसङ्गत दृष्टि और उदार विचारों के जो बीज भिक्षुसंघ में निक्षिप्त (स्थापित0 किये थे, उन्हीं बीजों से कालान्तर में विभिन्न शाखाओं वाला सद्धर्म रूपी महावृक्ष विकसित हुआ, जिसने भारत सहित विश्व के कोटि-कोटि विनेय जनों की आकांक्षाएं अपने पुष्प, फल, पत्र और छाया के द्वारा पूर्ण कीं और आज भी कर रहा है।

अठारह निकायों के सामान्य सिद्धान्त

आचार्य वसुमित्र, भावविवेक आदि महापण्डितों के ग्रन्थों के दार्शनिक सिद्धान्तों से सभी अठारह निकाय प्राय: सहमत हैं-

ज्ञान में ग्राह्य (विषय) के आकार का अभाव

बौद्ध दार्शनिकों में इस विषय पर पर्याप्त चर्चा उपलब्ध होती है कि ज्ञान जब अपने विषय में प्रवृत्त होता है, तब विषय के आकार को ग्रहण करके अर्थात विषय के आकार से आकारित (साकार) होकर विषय ग्रहण करता है या निराकार रहते हुए। सौत्रान्तिकों का मानना है कि चक्षुर्विज्ञान नीलाकार होकर नील विषय में प्रवृत्त होता है। उनका कहना है कि जिस समय चक्षुर्विज्ञान उत्पन्न होता है, उस समय उसका ग्राह्य (नील आलम्बन) निरुद्ध रहता है। क्योंकि नील आलम्बन कारण है और चक्षुर्विज्ञान उसका कार्य। कारण को कार्य से नियत पूर्ववर्तों होना चाहिएं इसलिए नील आलम्बन चक्षुर्विज्ञान से एक क्षण पूर्व निरुद्ध हो जाता है। किन्तु ज्ञान में विषय का आकार विद्यमान होने से वह ज्ञान 'नीलज्ञ' कहा जाता है।

ज्ञान में स्वसंवेदनत्व का अभाव

वैभाषिक प्रमुख सभी अठारह निकायों में ज्ञान में जैसे ज्ञेय (विषय) का आकार नहीं माता जाता अर्थात जैसे उसे निराकार माना जाता है, उसी प्रकार ज्ञान में ग्राहक-आकार अर्थात अपने स्वरूप (स्वयं) को ग्रहण करने वाला आकार भी नहीं माना जाता। स्वयं (अपने स्वरूप) को ग्रहण करने वाला ज्ञान 'स्वसंवेदन' कहलाता है। आशय यह कि वे (वैभाषिक आदि) स्वसंवेदन नहीं मानते। ज्ञात है कि बौद्ध नैयायिक सौत्रान्तिक आदि चार प्रत्यक्ष मानते हैं-

  1. इन्द्रिय प्रत्यक्ष,
  2. मानस प्रत्यक्ष,
  3. स्वसंवेदन प्रत्यक्ष और
  4. योगी-प्रत्यक्ष।

इनमें से वैभाषिक आदि क्योंकि स्वसंवेदन नहीं मानते, इसलिए इनके मत में शेष तीन प्रत्यक्ष ही माने जाते हैं।

बाह्यार्थ का अस्तित्व

वैभाषिक आदि के मत में ज्ञान में अतिरिक्त बाह्य वस्तुओं की सत्ता मानी जाती है। वे रूप, शब्द आदि बाह्य वस्तुएं परमाणुओं से आरब्ध (निर्मित) होती हैं, न कि विज्ञान के परिणाम के रूप में मानी जाती हैं- जैसा कि योगाचार विज्ञानवादी मानते हैं। योगाचार मतानुसार समस्त बाह्यार्थ आलयविज्ञान या मनोविज्ञान में स्थित वासना के परिणाम होते हैं। वैभाषिक ऐसा नहीं मानते। वैभाषिक मतानुसार घट आदि पदार्थों में स्थित परमाणु चक्षुरिन्द्रिय के विषय होते हैं तथा चक्षुरिन्द्रिय में स्थित परमाणु चक्षुर्विज्ञान के आश्रय होते हैं। इसलिए इनके मत में परमाणु से निर्मित ष्ट आदि स्थूल वस्तुओं की वस्तुसत्ता नहीं मानी जाती। सौत्रान्तिकों के मतानुसार घट आदि में स्थित प्रत्येक परमाणु चक्षुर्विज्ञान का विषय नहीं होता, अत: चक्षुर्विज्ञान में भासित होने वाले घट आदि स्थूल वस्तुओं की वस्तुसत्ता मानी जाती है। जैसे वैशेषिक दार्शनिक अवयवों से अतिरिक्त एक अवयवी द्रव्य की सत्ता स्वीकार करते हैं, वैसे वैभाषिक नहीं मानते, इसलिए घट आदि के अन्तर्गत विद्यमान परमाणु ही इन्द्रिय के विषय होते हैं।

तीनों कालों की सत्ता

जो सभी अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न कालों का अस्तित्व मानते हैं, वे सर्वास्तिवादी चार प्रकार के हैं, यथा-

  1. भावान्यथिक। इस मत के प्रमुख आचार्य भदन्त धर्मत्रात हैं। इनके अनुसार अध्वों (कालों) में प्रवर्तमान (गतिशील) धर्मों की द्रव्यता में अन्यथात्व नहीं होता। केवल भाव में अन्यथात्व होता है।
  2. लक्षणान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त घोषक हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान अतीत धर्म यद्यपि अतीत-लक्षण से युक्त होता है, फिर भी वह प्रत्युत्पन्न और अनागत लक्षण से भी अवियुक्त होता है।
  3. अवस्थान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त वसुमित्र हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान धर्म भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त कर अवस्था की दृष्टि से भिन्न-भिन्न निर्दिष्ट किया जाता है, न कि भिन्न-भिन्न द्रव्य की दृष्टि से भिन्न-भिन्न निर्दिष्ट होता है।
  4. अन्यथान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त बुद्धदेव हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान धर्म पूर्व, अपर की अपेक्षा से भिन्न-भिन्न कहा जाता है।

निरुपधिशेष निर्वाण

वैभाषिक आदि निकायों के मत में निरुपधिशेष निर्वाण की अवस्था में व्यक्तित्व की सर्वथा निवृत्ति (परिसमाप्ति) मानी जाती है। इस अवस्था में अनादि काल में चली आ रही व्यक्ति की नाम-रूप सन्तति सर्वथा शान्त हो जाती है, जैसे दीपक के बुझ जाने पर उसकी किसी भी प्रकार की सन्तति अवशिष्ट नहीं रहती।

बोधि से पूर्व गौतम बुद्ध का पृथग्जन होना

इन निकायों के मतानुसार जन्म ग्रहण करते समय राजकुमार सिद्धार्थ पृथग्जन ही थे। वह बोधिसत्त्व अवश्य थे और मार्ग की दृष्टि से सम्भारमार्ग की अवस्था में विद्यमान थे। घर से बाहर होकर प्रव्रज्या ग्रहण करने के अनन्तर जिस समय बोधिवृक्ष के मूल में समाधि में स्थित थे, तब उन्होंने क्रमश: प्रयोगमार्ग, दर्शनमार्ग और भावनामार्ग को प्राप्त किया। अन्त में उन्होंने उसी आसन पर सम्यक् संबुद्धत्व की प्राप्ति की।

स्थविरवाद

परमार्थ धर्म विचार

अठारह निकायों में स्थविरवाद भी एक है। इन दिनों विश्व में दो ही निकाय जीवित हैं-

  1. स्थविरवाद और
  2. सर्वास्तिवाद की विनय-परम्परा।

परमार्थ

जो अपने स्वभाव को कभी भी नहीं छोड़ता तथा जिसके स्वभाव से कभी परिवर्तन नहीं होता ऐसा तत्त्व 'परमार्थ' कहा जाता है। जैसे लोभ का स्वभाव (लक्षण) आसक्ति या लालच है। यह चाहे मनुष्य में हो अथवा पशु में हो अपने आसक्ति या लालची स्वभाव को कभी भी नहीं छोड़ता। भौतिक (रूप) वस्तुओं में भी पृथ्वी का स्वभाव 'कठोर' होना है। यह पृथ्व कहीं भी किसी भी अवस्था में अपने कठोर स्वभाव को नहीं छोड़ती। इसलिए चित्त, स्पर्शवेदना आदि चैतसिक, पृथ्वी अप् आदि महाभूत और भौतिक वस्तु (रूप) तथा निर्वाण परमार्थ कहे जाते हैं।

चित्त-चैतसिक

चैतसिक

जब कोई चित्त उत्पन्न होता है, तब स्पर्श वेदना आदि चैतसिक भी उत्पन्न होते हैं। चित्त से सम्बद्ध होकर उत्पन्न होने के कारण, चित्त में होने वाले उन स्पर्श वेदना आदि धर्मों को, 'चैतसिक' कहते हैं। यहाँ 'चित्त' आधार है तथा चैतसिक उसमें होने वाले आधेय हैं- ऐसा नहीं समझना चाहिए। हाँ, यह ठीक है कि पूर्वगामी चित्त के अभाव में चैतसिक नहीं हो सकते, इस स्थिति में चित्त के न होने पर चैतसिकों के कृत्य नहीं होंगे, चित्त से सम्बद्ध होने पर ही वे सम्भव हैं, अत: चित्त में होने वाले स्पर्श वेदना आदि धर्म चैतसिक है- ऐसा भी कहा जाता है। यह ठीक भी है, क्योंकि स्पर्श वेदना आदि सदा सर्वथा चित्त में सम्प्रयुक्त होते हैं। चित्त के बिना चैतसिक अपने आलम्बनों को ग्रहण करने में असमर्थ रहते हैं। इसीलिए चित्त-चैतसिकों का साथ-सा उत्पाद निरोध माना जाता है तथा साथ ही समान आलम्बन का ग्रहण एवं समान वस्तु (इन्द्रिय) का आश्रय करना माना जाता है।

रूप

चित्त चैतसिक मनुष्य के चेतन (अभौतिक) पदार्थ (धर्म) हैं, इन्हें बौद्ध परिभाषा में 'अरूप धर्म' या 'नाम धर्म' कहा जाता है। ये नाम धर्म यद्यपि भौतिक (रूप) धर्मों का आश्रय करके ही उत्पन्न होते हैं। तथापि वे भौतिक (रूप) धर्मों का संचालन भी करते रहते हैं। उसका अभिप्राय यह है कि यदि रूप धर्म नहीं होते हैं तो अरूप (नाम)¬ धर्म भी नहीं होते। यदि अरूप (नाम) धर्म नहीं है तो रूप धर्म निष्प्रयोजन हो जाते हैं। यद्यपि भगवान बुद्ध का प्रधान प्रतिपाद्य निर्वाण था और निर्वाण प्राप्ति के लिए कुशल, अकुशल अरूपधर्मों का विवेचन करना भी आवश्यक था, तथापि रूप धर्मों के विवेचन के बिना अरूपधर्मों का विवेचन सम्भव नहीं था, फलत: उन्होंने 28 प्रकार के भौतिक धर्मों का विवेचन किया। इस प्रकार मनुष्य जीवन में यद्यपि अरूपधर्म प्रधान है, तथापि रूपधर्मों की भी अनिवार्यता है। अत: सभी अभिधर्मशास्त्र रूपों का भी विश्लेषण करते हैं।

पृथ्वी अप् आदि 28 रूपों में से पृथ्वी अप्, तेजस, वायु वर्ण, गन्ध, रस और ओजस् ये आठ रूप सदा एक साथ रहते हें। परमाणु, जो सूक्ष्म पदार्थ माना जाता है, उसमें भी ये आठ रूप रहते हैं। इनमें से पृथ्वी, अप् तेजस् और वायु को 'महाभूत' कहते हैं। क्योंकि इन चार रूपों का स्वभाव और द्रव्य अन्य रूपों से महान होते हैं तथा ये ही मूलभूत होते हैं इन चार महाभूतों का आश्रय लेकर ही वर्ण आदि अन्य रूपों की अभिव्यक्ति होती है। वर्ण, गन्ध आदि रूपों का हमें तभी प्रत्यक्ष हो सकता है, जबकि इनके मूल में संघातरूप महाभूत हों। जब महाभूतों का संघात रहेगा तब वर्ण गन्ध आदि का भी प्रत्यक्ष हो सकेगा।

मनुष्य के शरीर में विद्यमान चार महाभूतों के स्वभाव को समझने के लिए मृत्तिका से बनी हुई मुर्ति को उपमा से विचार किया जाता हे। एक-एक रूप-समुदाय (कलाप) में विद्यमान इन चार महाभूतों को प्राकृत चक्षु द्वारा नहीं देखा जा सकता, वे परमाणु नामक अत्यन्त सूक्ष्म रूप-समुदाय (कलाप) होते हैं अनेक रूपों (कलापों-रूप-समुदायों) का संघात होने पर ही उन्हें प्राकृत चक्षु द्वारा देखा जा सकता है। इस प्रकार अनेक रूप-समुदायों (कलापों) का संघात होने पर मनुष्य का भौतिक शरीर बन जाता है। भौतिक शरीर होने में मनुष्य के पूर्वकृत कर्म (चेतना) मुख्य कारण होते हैं।

निर्वाण

चित्त, चैतसिक और रूप धर्मों का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर निर्वाण का साक्षात्कार किया जा सकता है। यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति करने के लिए साधना (विपश्यना) करना चाहिए। साधना (विपश्यना) के द्वारा जो ज्ञान को प्राप्त करता है, वह आर्यपुद्गल है, आर्यपुद्गल ही निर्वाण का साक्षात्कार कर सकते हैं। जिसके दु:ख और दु:ख के कारण (तृष्णा-समुदय) निवृत्त हो जाते हैं, वही निर्वाण का साक्षात्कार कर सकता है, अत: दु:ख तथा तृष्णा से आत्यन्तिकी निवृत्ति ही 'निर्वाण' कहलाता है। यद्यपि निर्वाण दु:खों से आत्यन्तिकी निवृत्ति मात्र का निरोध मात्र को कहते हैं, तथापि वह अभाव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह आर्यजनों के द्वारा साक्षात करने योग्य है अर्थात निर्वाण ज्ञानप्राप्त आर्यजनों का विषय (आलम्बन) होने से अभाव नहीं कहा जा सकता। वस्तुत: वह अत्यन्त सूक्ष्म धर्म होने से साधारण जनों के द्वारा जानने एवं कहने योग्य नहीं होने पर भी वह आर्यजनों का विषय होता है। इसलिए निर्वाण को एक परमार्थ धर्म कहते हैं।

निर्वाण शान्ति सुख लक्षण वाला है। यहाँ सुख दो प्रकार का होता है-

  1. शान्ति सुख एवं
  2. वेदयितसुख।

शान्तिसुख वेदयितसुख की तरह अनुभूतियोग्य सुख नहीं है। किसी एक विशेष वस्तु का अनुभव न होकर वह उपशमसुख मात्र है अर्थात दु:खों से उपशम होना ही है। निर्वाण के स्वरूप के विषय में आजकल नाना प्रकार की विप्रतिपत्तियाँ हैं। कुछ लोग निर्वाण को रूप विशेष एवं नाम विशेष कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं। कि नाम-रूपात्मक स्कन्ध के भीतर अमृत की तरह एक नित्यधर्म विद्यमान है, जो नामरूपों के निरुद्ध होने पर भी अवशिष्ट रहता है, उस नित्य, अजर, अमर, अविनाशी के रूप में विद्यमान रहना ही निर्वाण है, जैसे- अन्य भारतीय दार्शनिकों के मत में आत्मा। कुछ लोगों का मत है कि निर्वाण की अवस्था में यदि नामरूप धर्म न रहेंगे तो उस अवस्था में सुख का अनुभव भी कैसे होगा इत्यादि।

शील-विमर्श

जिन आचरणों के पालन से चित्त में शान्ति का अनुभव होता है, ऐसे सदाचरणों को सदाचार (शील) कहते हैं सामान्यतया आचरणमात्र को शील कहते हैं। चाहे वे अच्छे हों, चाहे बुरे, फिर भी रूढ़ि से सदाचार ही शील कहे जाते हैं किन्तु केवल सदाचार का पालन करना ही शील नहीं है, अपितु बुरे आचरण भी 'शील' (दु:शील) हैं अच्छे और बुरे आचरण करने के मूल में जो उन आचरणों को करने को प्रेरणा देने वाली एक प्रकार की भीतरी शक्ति होती है, उसे चेतना कहते हैं। वह चेतना ही वस्तुत: 'शील' है। इसके अतिरिक्त चैतसिक 'शील' संवरशील और अव्यतिक्रम शील- ये तीन शील और होते हैं-

चेतनाशील जीव हिंसा से विरत रहने वाले या गुरु, उपाध्याय आदि की सेवा सुश्रुषा करने वाले पुरुष की चेतना (चेतना शील) है। अर्थात जितने भी अच्छे कर्म (सुचरित) हैं, उनका सम्पादन करने की प्रेरिका चेतना 'चेतना शील' है। जब तक चेतना न होगी तक पुरुष शरीर या वाणी से अच्छे या बुरे कर्म नहीं कर सकता। अत: अच्छे कर्म को सदाचार (शील) कहना तथा बुरे कर्म को दुराचार कहना, उन (सदाचार, दुराचार) का स्थूल रूप से कथन है। वस्तुत: उनके मूल में रहने वाली चेतना ही महत्त्वपूर्ण है, इसीलिए भगवान बुद्ध ने 'चेतनाहं भिक्खवे, कम्मं वदामि*' कहा है।

चैतसिक शील

जीवहिंसा आदि दुष्टकर्मों से विरत रहने वाले पुरुष की वह विरति 'चैतसिक शील' है अर्थात दुष्कर्मों के करने से रोकने वाली शक्त्ति 'विरति है। यह विरति भी एक प्रकार का 'शील' है, अत: इसे 'विरति शील' भी कहते हैं। अथवा लोभ, द्वेष मोह आदि का प्रहाण करने वाले पुरुष के जो अलोभ, अद्वेष, अमोह हैं, वे 'चैतसिक शील' हैं अर्थात जिस पुरुष की सन्तान में लोभ, मोह न होंगे वह काय दुच्चरित आदि दुष्कर्मों सें विरत रहेगा। अत: इन्हें (अलोभ आदि को) 'विरति शील' कहते हैं।

संवरशील

बुरे विषयों की ओर प्रवृत्त इन्द्रियों की उन विषयों से रक्षा करना अर्थात अपनी इन्द्रियों को बुरे विषयों में न लगने देना, इस प्रकार अपने द्वारा स्वीकृत आचरणों की रक्षा करना, ज्ञान के द्वारा क्लेश (नीवरण) धर्मों को उत्पन्न होने से रोकना, विपरीत धर्मों से समागम होने पर उन्हें सहन करना तथा उत्पन्न हो गये काम-वितर्क आदि को उत्पन्न न होने देने के लिए प्रयास करना 'संवर शील' है।

अव्यतिक्रम शील

गृहीत व्रतों (शिक्षाप्रदों) का काय और वाक् के द्वारा उल्लघंन न करना (अनुल्लंघन) अव्यतिक्रम शील कहलाता है। अर्थात जिस पुरुष ने यह प्रतिज्ञा की है कि मैं प्राणी-हिंसा न करूँगा- ऐसे पुरुष का किसी भी परिस्थिति में शरीर या वाणी द्वारा अपनी प्रतिज्ञा का उल्लंघन न करना 'अव्यतिक्रम शील' है।

चारित्त शील, वारित्त शील

यद्यपि शील अनेकों प्रकार के हैं, तथापि उनका चारित्त शील व वारित्त शील इन दो में संग्रह हो जाता है। जिन कर्मों का सम्पादन करना चाहिए, उनका सम्पादन करना 'चारित्त शील' है तथा जिन्हें नहीं करना चाहिए, उन्हें न करना 'वारित्त शील' है। भगवान बुद्ध ने विनय पिटक में भिक्षुओं के लिए जो करणीय आचरण कहे हैं, उनके करने से यद्यपि 'चारित्त्व शील' पूरा हो जाता हे, और निषिद्ध कर्मों के न करने से 'वारित्त शील' पूरा हो जाता है, तथापि उन्होंने निर्वाण प्राप्ति के लिए जो मार्ग प्रदर्शित किया है, उसे अपने जीवन में उतारने से ही चरित्त शील, भलीभांति पूरा होता है।

नित्यशील

  1. प्राणातिपात से विरत रहना,
  2. चोरी से विरत रहना,
  3. मृषावाद से विरत रहना,
  4. काम मिथ्याचार से विरत रहना, तथा
  5. शराब आद मादक द्रव्यों के पीने से विरत रहना-

ये पाँच नित्य शील हैं। अर्थात इनके पालन से कोई पुण्य नहीं होता, किन्तु इनका पालन न करने से दोष (आपत्ति) होता है। ये 5 शील सभी लोगों के लिए अनिवार्य हैं। गृहस्थ, प्रव्रजित (श्रामणेर), भिक्षु-भिक्षुणी सभी को इनका पालन करना चाहिए। यदि गृहस्थ श्रद्धा और उत्साह से सम्पन्न हो तो वह अष्टमी, पूर्णिमा अमावस्या (उपोसथ) के दिन 8 या 10 शीलों का भी पालन कर सकता है। इन्हें अष्टाङ्गशील या दशशील कहते हैं।

अष्टाङ्गशील

  1. प्राणि-हिंसा से विरत रहना,
  2. चोरी न करना,
  3. ब्रह्मचर्य का पालन करना,
  4. झूठ बोलने से विरत रहना,
  5. शराब आदि मादक द्रव्यों के सेवन से विरत रहना,
  6. दोपहर 12 बजे के बाद (विकाल में) भोजन न करना,
  7. नृत्य, गीत आदि न देखना, न सुनना तथा माला, सुगन्ध आदि का इस्तेमाल न करना तथा
  8. ऊँचे और श्रेष्ठ आसनों का त्याग करना।

दश शील

अष्टाङ्ग शील के 7वें शील को दो भागों में विभक्त कर दिया जाता है, इस तरह 8वें के स्थान पर 9 हो जाते हैं तथा उसमें स्वर्ण, चाँदी आदि का ग्रहण न करना एक शील को और जोड़ दिया जाता है, इस तरह कुल 10 शील हो जाते हैं।

चातुपरिशुद्धि शील

ऊपर जो शील कहे गये हैं, वे सामान्यतया गृहस्थ आदि की दृष्टि से प्रहाण करने योग्य शील हैं। योगी भिक्षुओं के लिए विशेषत: क्लेशों के प्रहाण के लिए 4 प्रकार के परिशुद्धिशीलों का पालन करना आवश्यक होता है और सभी शील इनके अन्तर्गत आ जाते हैं। अत: इनका यहाँ प्रतिपादन किया जा रहा है।

  1. प्रातिमोक्ष संवरशील— जिनके पालन से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसे आचरणों (शिक्षापदों) को 'प्रातिमोक्ष' कहते हैं। उन आचरणों की रक्षा करना ही 'प्रातिमोक्ष संवरशील' है। इनके पालन के लिए श्रद्धा का होना परम आवश्यक है। बुद्ध शासन के प्रति श्रद्धा होने पर ही बुद्ध के द्वारा उपदिष्ट आचरणों (शिक्षापदों) का पालन किया जा सकता है। भिक्षु में जब श्रद्धा का आधिक्य होता है, तो वह बुद्ध द्वारा उपदिष्ट अपने शीलों का उसी प्रकार सावधानी के साथ आचरण करता है, जिस प्रकार चामरी गाय अपनी पूँछ की, माता अपने एकमात्र प्रिय पुत्र की तथा काणा व्यक्ति अपनी एक आँख की सावधानी के साथ आचरण करता है।
  2. इन्द्रिय संवरशील— चक्षु आदि इन्द्रियों की रक्षा करना 'इन्द्रिय संवरशील' है। जब भिक्षु उपर्युक्त प्रातिमोक्ष संवरशील से सम्पन्न हो जाता है, तब वह इन्द्रिय संवरशील का भी पालन करने में समर्थ हो जाता है। ये दोनों शील वस्तुत: परस्पराश्रित होते हैं। जो प्रातिमोक्षसंवर शील से सम्पन्न होता है, वह इन्द्रिय संवरशील का भी पालन करता है तथा जो इन्द्रिय संवरशील से सम्पन्न होता है, वह प्रातिमोक्ष संवरशील का भी पालन करता है। इन्द्रिय संवरशील से सम्पन्न होने के लिए अपने चक्षु आदि इन्द्रियों की रक्षा की जाती है। जैसे- जब चक्षु के सम्मुख वर्ण (रूप) उपस्थित होता है तो उस रूप के प्रति राग आदि का उत्पाद नहीं होने देना चाहिए।
  3. आजीव पारिशुद्धिशील— अपनी जीविका चलाने के लिए ग़लत (पापमूलक) साधनों का प्रयोग न करना 'आजीव पारिशुद्धिशील' है। जब कोई व्यक्ति भिक्षु-दीक्षा ग्रहण करता है, तो उसे दीक्षा के साथ ही भिक्षापात्र भी मिल जाता हा, जिसे लेकर वह गाँव-नगर में घूमता है और श्रद्धालु लोगों द्वारा श्रद्धापूर्वक जो भी भोजन, वस्त्र आदि दिये जाते हैं, उनसे अपनी जीविका चलाता है।

प्रत्ययसन्निश्रित शील— वस्त्र, (चीवर), भोजन (पिण्डपात), शयनासन (विहार) तथा औषधि (ग्लानप्रत्ययभैषज्य)- इन चार वस्तुओं का प्रत्यय कहते हैं। जो भिक्षु इन चार वस्तुओं को ही अपने जीवन का साधन बनाता है, उस भिक्षु का यह आचरण ही 'प्रत्ययसन्निश्रित शील' कहलाता है। इस शील की सम्पन्नता के लिए 'प्रज्ञा' की परम आवश्यकता है। यद्यपि भगवान बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को तीन वस्त्र और भोजन आदि का आश्रय लेकर जीवन चलाने के लिए कहा है, तथापि इनका इस्तेमाल ख़ूब सोच-विचार करके किया जाता है।

  1. धुतांग— शीलों के पालन से यद्यपि भिक्षु परिशुद्धशील हो जाता है, तथापि जो भिक्षु अल्पेच्छता, अल्पसन्तुष्टि आदि गुणों से युक्त होते हैं, वे यदि अपने शीलों को और पवित्र करना चाहते हैं, तो भगवान बुद्ध ने उनके लिए 13 प्रकार के परिशुद्ध शीलों अर्थात धुतांगों का उपदेश किया है।

समाधि— विमर्श

समाधि

कर्मस्थान

कर्मस्थान दो प्रकार के होते हैं, यथा- शमथ कर्मस्थान और विपश्यना कर्मस्थान। योगी जिन आलम्बनों को अपने भावनाकृत्य की सम्पन्नता के लिए साधन बनाता है, उन्हें 'कर्मस्थान' कहते हैं। पृथ्वी, अप् आदि चालीस प्रकार के साधन 'समाधि' के आलम्बन' (शमथ कर्मस्थान) हैं। तथा पंचस्कन्धात्मक नाम-रूप आदि साधन प्रज्ञा के विषय (विपश्यना कर्मस्थान) हैं। आनापानस्मृति – बौद्ध साधना में श्वास और प्रश्वास को 'आनापान' कहते हैं। इसे ही पातंजल योग-दर्शन में 'प्राणायाम' कहा गया है। यह श्वास-प्रश्वास (आनापान) समाधिलाभ के लिए एक उत्कृष्ट साधन है। यह ठीक भी है, क्योंकि प्राण ही जीवन है। प्राण ही समस्त संसार का मूल कारण है। प्राण के बिना प्राणी का जीवित रहना असम्भव है। सभी जीवों के लिए प्राण अनिवार्य अंग है। जब से जीव जन्म लेता है, तभी से श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इसलिए बौद्ध और बौद्धेतर भारतीय योगशास्त्र में प्राणायाम या आनापान का अत्यधिक महत्त्व प्रतिपादित किया गया है।

विशुद्धि और ज्ञान

यहाँ योगी नाम-रूप संस्कार धर्मों के प्रति केवल अनित्य या दु:ख या अनात्म की भावनामात्र से मार्ग एवं फल ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, अपितु उसे संस्कार धर्मों की अनित्य, दु:ख एवं अनात्म-इन तीन स्वभावों (लक्षणो) से विपश्यना-भावना करनी पड़ती है। मार्ग प्राप्ति के पूर्व-क्षण में यदि संस्कार धर्मों के अनित्य स्वभाव को देखता है तो वह मार्ग एवं फल अनिमित्तविमोक्ष कहलाता है। यदि मार्ग प्राप्ति के पूर्व-क्षण में संस्कार धर्मों को दु:ख स्वभाव अथवा अनात्म स्वभाव देखता है तो वह मार्ग एवं फल अप्रणिहित अथवा शून्यताविमोक्ष कहलाता है।

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