सौत्रान्तिक दर्शन

Nayati
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सौत्रान्तिक दर्शन

विषय सूची

उद्भव एवं विकास

समीक्षा

  1. निकायों के नामों और काल के विषय में जो मतभेद उपलब्ध होते हैं। उसका कारण देश भेद और आवागमन की सुविधा का अभाव भी प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ भारत के पश्चिमोत्तर में अर्थात कश्मीर, गान्धार आदि प्रदेशों में सौत्रान्तिक निकाय कश्मीर वैभाषिकों से पृथक् होकर विलम्ब से अस्तित्व में आया, अत: वसुमित्र उसका अद्भवकाल चतुर्थ बुद्ध शताब्दी निश्चित करते हैं। उस निकाय ने मध्य देश अर्थात मथुरा आदि स्थानों में पहले ही अपना स्वरूप प्राप्त कर लिया, अत: वसुमित्र से अन्य आचार्यों का मत भिन्न हो गया। इस प्रकार का मतभेद होने पर भी उनमें मौलिक एकरूपता दृष्टिगोचर होती है। उदाहरण के रूप में काश्यपीय निकाय के विभिन्न नाम विभिन्न प्रदेशों में थे।
  2. ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि सौत्रान्तिक निकाय के बीज बुद्ध काल में ही विद्यमान थे। पालि भाषा में उपनिबद्ध और उपलब्ध प्रामाणिक बुद्धवचनों में तथा भोट भाषा और चीनी भाषा में उपलब्ध एवं सुरक्षित उनके अनुवादों में 'सुत्तन्तिक', 'सुत्तधर' (सूत्रधर), 'सुत्तवादी' (सूत्रवादी) आदि शब्द बहुलतया उपलब्ध होते हैं। ज्ञात है कि उस काल में सिद्धान्त विशेष के लिए 'वाद' शब्द प्रयुक्त होता था। सूत्रों में 'सुत्तधर', 'सुत्तवादी', 'सुत्तन्तिक', 'सुत्तन्तवादी' आदि शब्द उन भिक्षुओं के लिए प्रयुक्त होता था, जो सूत्रपिटक के विशेषज्ञ होते थे, जिन्हें सूत्रपिटक कण्ठस्थ था और जो उसके व्याख्यान में निपुण थे।

सौत्रान्तिक की परिभाषा

अत्थानं सूचनतो सुवुत्ततो सवनतो थ सूदनतो।
सुत्ताणा सुत्तसभागतो च सुत्तं ति अक्खातं॥ -(अट्ठसालिनी, निदानकथावण्णना, पृ. 39)

त्रिपिटक

इस विंषय में किसी का कोई विवाद नहीं है कि महाकाश्यप आदि महास्थविरों ने बुद्ध वचनों का सकंलन करके उन्हें त्रिपिटक का स्वरूप प्रदान किया। काल क्रम में आगे चलकर बुद्धवचनों के सम्बन्ध में परस्पर विरुद्ध विविध मत-मतान्तर और विविध साम्प्रदायिक दृष्टियाँ प्रस्फुटिक हुई। इस विषय में सौत्रान्तिकों की विशेष दृष्टि है। इनके मतानुसार स्थविरवादियों का अभिधर्मपिटक, जिसमें धम्मसंगणि, विभंग आदि 7 ग्रन्थ संगृहीत हैं, वह (अभिधर्मपिटक) बुद्धवचन नहीं माना जा सकता। इनका कहना है कि इन ग्रन्थों में असंस्कृत धर्मों की द्रव्यसत्ता आदि अनेक युक्तिहीन सिद्धान्त प्रतिपादित हैं। भगवान बुद्ध कभी भी युक्तिहीन बातें नहीं बोलते, अत: इन्हें बुद्धवचन के रूप में स्वीकार करना असम्भव है। वस्तुत: ये (सातों) ग्रन्थ परवर्ती हैं और आभिधार्मिकों की कृति हैं। अत: ये शास्त्र हैं। उन्होंने इनके रचयिताओं के नामों का भी उल्लेख किया है, यथा-ज्ञानप्रस्थान के कर्ता आर्यकात्यायनीपुत्र, प्रकरणपाद के वसुमित्र, विज्ञानकाय के देवशर्मा, धर्मस्कन्ध के शारीपुत्र, प्रज्ञप्तिशास्त्र के मौद्गलयायन, धातुकाय के पूर्ण तथा संगीतिपर्याय के महाकौष्ठिल्ल कर्ता हैं। ये ग्रन्थ किसी प्रामाणिक पुरुष द्वारा रचित नहीं हैं और न प्रथम संगीति में इनका संगायन ही हुआ है, अत: पृथग्जनों द्वारा विरचचित होने से हम सौत्रान्तिक इन्हें बुद्धवचन नहीं मानते। इनका कहना है कि बुद्ध द्वारा उपदिष्ट सूत्र ही हमारे मत में प्रमाण हैं, न कि कोई अन्य शास्त्र।

निष्कर्ष

प्रमुख सौत्रान्तिक सिद्धान्त

सौत्रान्तिकों की जो प्रमुख विशेषताएं हैं, जिनकी वजह से वे अन्य बौद्ध, अबौद्ध दार्शनिकों से भिन्न हो जाते हैं, अब हम उन विशेषताओं की ओर संकेत करना चाहते हैं। ज्ञात है कि बौद्ध धर्म में अनेक निकायों का विकास हुआ। यद्यपि उनकी दार्शनिक मान्यताओं में भेद हैं, फिर भी बुद्धवचनों के प्रति गौरव बुद्धि सभी में समान रूप से पाई जाती है। सभी निकायों के पास अपने-अपने त्रिपिटक थे। ऐतिहासिक क्रम में महायान का भी उदय हो गया। यह नि:सन्दिग्ध है। कि पुरुषार्थ-सिद्धि सभी भारतीय दर्शनों का परम लक्ष्य है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रख कर बौद्धों में यानों की व्यवस्था की गई है। उनके दर्शनों का गठन भी यानव्यवस्था पर आधारित है। इसके आधारभूत तत्त्व तीन होते हैं, यथा-

  1. आश्रय, वस्तु आलम्बन या पदार्थ,
  2. आश्रित मार्ग (शील, समाधि, प्रज्ञा),
  3. प्रयोजन या लक्ष्यभूत फल।

आश्रय, वस्तु या पदार्थ

मीमांसा के अवसर पर दो सत्यों अर्थात परमार्थ सत्य और संवृति सत्य की चर्चा की जाती है।

परमार्थ सत्य

संवृतिसत्य— इस मत में पाँच स्कन्ध संवृतिसत्य हैं परमार्थत: अर्थक्रियासमर्थ न होना संवृतिसत्य का लक्षण है। संवृतिसत्य, सामान्यलक्षण, नित्य, असंस्कृत एवं अकृतक धर्म पर्यायवाची हैं। संवृति का तात्पर्य विकल्प ज्ञान से है। उसके प्रतिभास स्थल में जो सत्य है, वह संवृतिसत्य है। विकल्प के संवृति इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह वस्तु की यथार्थ स्थिति के ग्रहण में आवरण करता है। आगमानुयायी सौत्रान्तिकों के अनुसार यन्त्र आदि उपकरणों द्वारा विघटन करने पर या बुद्धि द्वारा विश्लेषण करने पर जिन पदार्थों की पूर्वबुद्धि नष्ट हो जाती है, वे संवृतिसत्य हैं, यथा- घट, अम्बु आदि।

आश्रित मार्ग

जिस मार्ग की भावना की जाती है, वह मार्ग वस्तुत: सम्यक ज्ञान ही है।

  1. नैरात्म्य ज्ञान,
  2. चारों आर्यसत्यों के सोलह आकारों का ज्ञान,
  3. सैतीस बोधिपक्षीय धर्म,
  4. चार अप्रमाण,
  5. नौ अनुपूर्व समापत्तियाँ- ये धर्म यथायोग्य लौकिक और अलौकिक मार्गों में संगृहीत होत हैं।

फल

फलस्थ पुद्गल

जैसे श्रावकयान में चार मार्गस्थ और चार फलस्थ आठ आर्यपुद्गल माने जाते हैं, वैसे ही इस मत के अनुसार प्रत्येक बुद्धयान में भी आर्य पुद्गलों की व्यवस्था की जाती है। किन्तु खङृगोपम प्रत्येक बुद्ध निश्चय ही अर्हत से भिन्न होता है। वह बुद्ध आदि के उपदेशों की बिना अपेक्षा किये आन्तरिक स्वत: स्फूर्त ज्ञान द्वारा निर्वाण का अधिगम करता है। उसका निरुपधिशेष निर्वाण बुद्ध से शून्य देश और काल में होता है। मार्गस्थ और फलस्थ आर्य पुद्गलों के पारमार्थिक संघ में बीस प्रकार के पुद्गल होते हैं। इनका विस्तृत विवेचना अभिसमयालङ्कार और अभिधर्मकोश आदि ग्रन्थों में उपलब्ध है।

सौत्रान्तिक दर्शन की दस विशेषताएं

क्षणभङ्ग सिद्धि
बौद्ध लोग, जो प्रत्येक वस्तु के उत्पाद, स्थिति और भङ्य ये तीन लक्षण मानते हैं, उनको लेकर बौद्धेतर दार्शनिकों के साथ उनके बहुत व्यापक, गम्भीर और दीर्घकालीन विवाद हैं। सौत्रान्तिकों के अनुसार उत्पाद के अनन्तर विनष्ट होनेवाली वस्तु ही क्षण है। उनके अनुसार उत्पाद मात्र ही वस्तु होती है। वस्तु की त्रैकालिक सत्ता नहीं होती। कारण-सामग्री के जुट जाने पर कार्य का निष्पन्न होना ही उत्पाद है। उत्पन्न की भी स्थिति नहीं होती, अपितु उत्पाद के अनन्तर वस्तु नहीं रहती, यही उसकी भङ्गावस्था है।

सूत्रप्रामाण्य
सौत्रान्तिकों के मतानुसार ज्ञानप्रस्थान आदि सात अभिधर्मशास्त्र बुद्ध वचन नहीं हैं, अपितु वे आचार्यों की कृति हैं। वसुमित्र आदि आचार्य उन ग्रन्थों के प्रणेता हैं, अत: वे शास्त्र हैं, न कि बुद्धवचन या आगम। ऐसा मानने पर भी अर्थात सूत्रपिटक मात्र को प्रमाण मानने परी इनके मत में अभिधर्म का आभाव या त्रिपिटक का अभाव नहीं हैं। जिन सूत्रों में वस्तु के स्वलक्षण और सामान्य लक्षण आदि की विवेचना की गई है, वे सूत्र ही अभिधर्म हैं, जैसे अर्थविनिश्चयसूत्र आदि। बुद्धवचन 84,000 धर्मस्कन्ध, 12 अंग एवं तीन पिटकों में संगृहीत होते हैं। परवर्ती सौत्रान्तिक सूत्रों का नेयार्थ और नीतार्थ में विभाजन भी करते हैं।

परमाणुवाद
सौत्रान्तिक मत में परमाणु निरवयव एवं द्रव्यसत् माने जाते हैं। ये परमाणु ही स्थूल रूपों के आरम्भक होते हैं। जब परमाणुओं से स्थूल रूपों का आरम्भ होता है, तब एक संस्थान में विद्यमान होते हुए भी इनमें परस्पर स्पर्श नहीं होता। सौत्रान्तिक मत में ऐसा कोई रूप नहीं होता, जो अनिदर्शन और अप्रतिघ होता हो, जैसा कि अविज्ञप्ति नामक रूप की सत्ता वैभाषिक मानते हैं। इनके अनुसार अविज्ञप्तिरूप की स्वलक्षणसत्ता नहीं है, उसकी मात्र प्रज्ञप्तिसत्ता है।

द्रव्यसत्त्व-प्रज्ञप्तिसत्त्व
सौत्रान्तिकों के अनुसार वे ही पदार्थ द्रव्यसत माने जाते हैं, जो अपने स्वरूप को स्वयं अभिव्यक्त करते हैं तथा जिनमें अध्यारोपित स्वरूप का लेशमात्र भी नहीं होता। उदाहरणस्वरूप रूप्, वेदना आदि धर्म वैसे ही हैं। जब रूप आदि धर्म अपने स्वरूप का या अपने आकार का अपने ग्राहक ज्ञानों में, ज्ञानेद्रियों अथवा आर्य ज्ञानों में आधान (अर्पण) करते हैं, तब वे किसी की अपेक्षा नहीं करते, अपितु स्वत: अपने बल से करते हैं। अपि च, चक्षुरादि प्रत्यक्ष ज्ञान अथवा योगिज्ञान जब रूप आदि का साक्षात्कार करते हैं, तब वे भी उसमें किसी कल्पित आकार का आरोपण नहीं करते। इसलिए रूप, वेदना आदि इनके मत में द्रव्यसत या परमार्थसत माने जाते हैं। पुद्गल आदि धर्म वैसे नहीं हैं। वे अपने स्वरूप का स्वत: ज्ञान में आधान नहीं करते। न तो ज्ञान में पुद्गल आदि का आभास होता है। जब यथार्थ की परीक्षा की जाती है, तब उनका स्वरूप विदीर्ण होने लगता है। केवल उनके अधिष्ठान नाम-रूप आदि धर्म ही उपलब्ध होते हैं। पुद्गल कहीं उपलब्ध नहीं होता। अत: ऐसे धर्म प्रज्ञप्तिसत माने जाते हैं।

ज्ञान की साकारता
वैभाषिक आदि दर्शन के अनुसार रूप आदि विषयों का ग्रहण चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा होता है, ज्ञान द्वारा नहीं। इन्द्रियों के द्वारा गृहीत नील, पीत आदि विषयों का चक्षुर्विज्ञान आदि इन्द्रिय-विज्ञान अनुभव करते हैं अर्थात इन्द्रियों में प्रतिबिम्बित आकार ही इन्द्रियविज्ञानों का विषय हुआ करता है, अन्यथा विज्ञान बिना आकार के ही होता है। सौत्रान्तिक दर्शन के अनुसार नील, पीत आदि विषय अपना आकार स्वग्राहक ज्ञान में अर्पित करते हैं, फलत: विज्ञान विषयों के आकार से आकरित हो जाते हैं। ज्ञानगत आकार के द्वारा ही विषय अपने को प्रकाशित करते हैं। यदि ऐसा नहीं माना जाएगा तो विज्ञान की बिना अपेक्षा किये ही विषय का प्रकाश होने लगेगा। अत: जहाँ विषय का अवभास होता है, वह ज्ञान ही है। फलत: ज्ञान में प्रतिभासित नील, पीत आदि विषयों की बाह्यसत्ता सिद्ध होती है।

साकार ज्ञानों के भेद
ज्ञानगत आकार के बारे में तीन प्रकार के मत पाये जाते हैं, यथा- ग्राह्य-ग्रहक समसंख्या वाद, नाना अद्वैत वाद तथा नाना अनुपूर्वग्रहण वाद, इसे अर्धाण्डाकार वाद भी कहते हैं।

कार्य और कारण की भिन्नकालिकता
कारण हमेशा कार्य से पूर्ववर्ती होता है, इस पर सौत्रान्तिकों का बड़ा आग्रह है। कार्य सर्वदा कारण के होने पर होता है (अन्वय) और न होने पर नहीं होता है (व्यतिरेक)। यदि कार्य और कारण दोनों समान काल में होंगे तो कारण में कार्य को उत्पन्न करने के स्वभाव की हानि का दोष होगा, क्योंकि कारण के काल में कार्य विद्यमान ही है। इस स्थिति में कारण की निरर्थकता का भी प्रसंग (दोष) होगा। इसलिए वैभाषिकों को छोड़कर सौत्रान्तिक आदि सभी बौद्ध दार्शनिक परम्पराएं कारण को कार्य से पूर्ववर्ती ही मानती हैं। वैभाषिक कारण को कार्य का समकालिक तो मानते ही हैं, कभी-कभी तो कार्य से पश्चात्कालिक कारण भी मानते हैं। स्थविरवादी भी सहभू हेतु, पश्चाज्जात हेतु आदि मानते हैं।

प्रहाण और प्रतिपत्ति
वैभाषिक आदि जैसे अर्हत के द्वारा प्राप्त क्लेशप्रहाण और प्राप्त आर्यज्ञान की हानि (पतन) मानते है, वैसे सौत्रान्तिक नहीं मानते। सौत्रान्तिकों का कहना है कि क्लेशप्रहाण और आर्यज्ञान का अधिगम चित्त के धर्म हैं और चित्त के दृढ़ होने से उनके भी दृढ़ होने के कारण उनकी हानि की सम्भावना नहीं है। इस विषय का विस्तृत विवरण प्रमाणवार्तिक* style=color:blue>*</balloon> और उसके अलंकारभाष्य में अवलोकनीय है।

ध्यानाङ्गों की विशेषता
नौ समापत्तियाँ (4 रूपी, 4 अरूपी और निरोधसमापत्ति) होती हैं। इसमें सौत्रान्तिकों और वैभाषिकों में मतभेद नहीं है। किन्तु निरोधसमापत्ति के बारे में सौत्रान्तिकों की कुछ विशेषता है। वैभाषिकों के अनुसार निरोधसमापत्ति अवस्था में चित्त और चैतसिकों का सर्वथा निरोध हो जाता है, यहाँ तक कि उनकी वासनाएं भी अवशिष्ट नहीं रहतीं। क्योंकि वासनाओं की आधार चित्तसन्तति का सर्वथा निरोध हो चुका है। हाँ, उनकी प्राप्ति आदि विप्रयुक्त संस्कार अवशिष्ट रह सकती हैं।

प्रमाण आदि सम्यग्ज्ञान
विज्ञान की साकारता के आधार पर सौत्रान्तिक प्रमाणों की व्यवस्था करते हैं। विज्ञान की साकारता का प्रतिपादन पहले किया जा चुका है। प्रमाणों में स्वसंवेदन प्रत्यक्ष की स्थापना सौत्रान्तिकों की विशेषता है। सौत्रान्तिकों की ज्ञानमीमांसा में ज्ञान और उनके भेदों की चर्चा है।

बुद्ध, बोधिसत्त्व और बुद्धकाय
पारमिताओं की साधना के आधार पर बोधिसत्त्वों की चर्या का वर्णन सूत्रपिटक में प्राय: जातकों में उपलब्ध होता हैं। बुद्धत्व ही बोधिसत्त्वों का अन्तिम पुरुषार्थ है क्योंकि उसके द्वारा ही वे बहुजन का हित सम्पादन करने में पूर्ण समर्थ होते हैं। इसके लिए वे तीन असंख्येय कल्प पर्यन्त ज्ञानसम्भार का अर्जन करते हैं। जम्बूद्वीप का आर्य बोधिसत्त्व बुद्धत्व के सर्वथा योग्य होता है। कामधातु के अन्य द्वीपों में तथा अन्य धातु और योनियों में उत्पन्न काय से बुद्धत्व की प्राप्ति सम्भव नहीं है।

काय

महायान से अतिरिक्त अन्य बौद्ध निकायों की इस विषय में प्राय: समान मान्यता है कि भगवान बुद्ध के दो काय होते हैं, यथा- रूपकाय और धर्मकाय। वैभाषिकों की यह मान्यता है कि *भगवान बुद्ध का रूपकाय, जो बत्तीस लक्षणों और अस्सी अनुव्यजंनों से प्रतिमण्डित है, वह सास्रव होता है तथा माता-पिता के शुक्र-शोणित से उत्पन्न 'करज काय' होता है।

ज्ञानमीमांसा

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