सौत्रान्तिक आचार्य और कृतियाँ

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सौत्रान्तिक आचार्य और कृतियाँ

विषय सूची

सभी बौद्ध दार्शनिक प्रस्थान बुद्ध वचनों को ही अपने-अपने प्रस्थान के आरम्भ का मूल मानते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि विश्व के चिन्तन क्षेत्र में बुद्ध के विचारों का अपूर्व और मौलिक योगदान है। बुद्ध की परम्परा के पोषक, उन-उन दर्शन-सम्प्रदायों के प्रवर्तक आचार्यों और परवर्ती उनके अनुयायियों का महत्व भी विद्वानों से छिपा नहीं है। सौत्रान्तिक दर्शन के प्रवर्तक और प्रमुख आचार्यों का परिचय इस प्रकार हैं- बुद्ध ने अपने अनुयायियों को जो विचारों की स्वतन्त्रता प्रदान की, स्वानुभव की प्रामाणिकता पर बल दिया और किसी भी शास्त्र, शास्त्रों के वचनों को बिना परीक्षा किये ग्रहण न करने का जो उपदेश दिया, उसकी वजह से उनका शासन उनके निर्वाण के कुछ ही वर्षों के भीतर अनेक धाराओं में विकसित हो गया। अनेक प्रकार की हीनयानी और महायानी संगीतियों का आयोजन इसका प्रमाण है। दो सौ वर्षों के भीतर 18 निकाय विकसित हो गये। इस क्रम में यद्यपि सूत्रवादियों का मत प्रभावशाली और व्यापक रहा है, फिर भी जब उन्होंने देखा कि दूसरे नैकायिकों के मत बुद्ध के द्वारा साक्षात उपदेशों से दूर होते जा रहे हैं तो उन्होंने शास्त्र प्रामाण्य का निराकरण करते हुए बुद्ध के द्वारा साक्षात उपदिष्ट सूत्रों के आधार पर स्वतन्त्र निकाय के रूप में अपने मत की स्थापना की। इस प्रकार उन्होंने सूत्रों में अनेक प्रकार के प्रक्षेपों से बुद्धवचनों की रक्षा की और लोगों का ध्यान मूल बुद्ध वचनों की ओर आकृष्ट किया। प्रथम और तृतीय संगीतियों के मध्यवर्ती काल में रचित 'धम्मसंगणि', 'कथावस्थु', 'ज्ञानप्रस्थान' आदि ग्रन्थों की बुद्ध वचन के रूप में प्रामाणिकता का उन्होंने जम कर खण्डन किया। उन्होंने कहा कि ये ग्रन्थ आचार्यों द्वारा रचित शास्त्र हैं, न कि बुद्ध वचन। जबकि सर्वास्तिवादी और स्थविरवादी उन्हें बुद्धवचन मानने के पक्ष में थे।

आचार्य परम्परा

  1. आगमानुयायी और
  2. युक्ति-अनुयायी।

अन्य प्राचीन आचार्य

किसी जीवित निकाय का यही लक्षण है कि उसकी अविच्छिन्न आचार्य परम्परा विद्यमान रहे। यदि वह बीच में टूट जाती है तो वह निकाय समाप्त हो जाता है। यही स्थिति प्राय: सौत्रान्तिक निकाय की है। भदन्त, कुमारलात के अनन्तर उस निकाय में कौन आचार्य हुए, यह अत्यन्त स्पष्ट नहीं है। यद्यपि छिटपुट रूप में कुछ आचार्यों के नाम ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं, यथा-भदन्त रत (लात), राम, वसुवर्मा आदि, किन्तु इतने मात्र से कोई अविच्छिन्न परम्परा सिद्ध नहीं होती और न तो उनके काल और कृतियों के बारे में ही कोई स्पष्ट संकेत उपलब्ध होते हैं। ये सभी सौत्रान्तिक निकाय के प्राचीन आचार्य 'आगमानुयायी सौत्रान्तिक' थे, वह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है, क्योंकि नागार्जुन कालीन ग्रन्थों में इनके नाम की चर्चा नहीं है। यद्यपि अभिधर्मकोश आदि वैभाषिक या सर्वास्तिवादी ग्रन्थों में इनके नाम यत्र तत्र यदा कदा दिखलाई पड़ते हैं। वसुबन्धु के बाद यशोमित्र भी आगमानुयायी सौत्रान्तिक परम्परा के आचार्य माने जाते हैं। उन्होंने अपनी स्फुटार्था टीका में अपनी सैत्रान्तिकप्रियता प्रकट की है, यह अन्त:साक्ष्य के आधार पर विज्ञ विद्वानों द्वारा स्वीकार किया जाता है।

परवर्ती परम्परा

आचार्य वसुबन्धु के बाद सभी अठारह बौद्ध निकायों में तत्त्वमीमांसा की प्रणाली में कुछ नया परिवर्तन दिखाई देता है। तत्त्वचिन्तन के विषय में यद्यपि इसके पहले भी तर्क प्रधान विचारपद्धति सौत्रान्तिकों द्वारा आरम्भ की गई थी और आचार्य नागार्जुन ने इसी तर्कपद्धति का आश्रय लेकर महायान दर्शन प्रस्थान को प्रतिष्ठित किया था, स्वयं आचार्य वसुबन्धु भी प्रमाणमीमांसा, ज्ञानमीमांसा और वादविधि के प्रकाण्ड पण्डित थे, फिर भी वसुबन्धु के बाद ज्ञानमीमांसा के क्षेत्र में कुछ इस प्रकार का विकास दृष्टिगोचर होता है, जिससे सौत्रान्तिकों की वह प्राचीन प्रणाली अपने स्थान से किंचित परिवर्तित सी दिखाई देती है। उनके सिद्धान्तों और पूर्व मान्यताओं में भी परिवर्तन दिखलाई पड़ता है। अपनी तर्कप्रियता, विकासोन्मुख प्रकृति एवं मुक्तचिन्तन की पक्षपातिनी दृष्टि के कारण वे अन्य दर्शनों की समकक्षता मे आ गये। ज्ञात है कि प्राचीन सौत्रान्तिक 'आगमानुयायी' कहलाते थे। उनका साम्प्रदायिक परिवेश अब बदलने लगा। यह परिवर्तन सौत्रान्तिकों में विचारों की दृष्टि से संक्रमण काल कहा जा सकता है। इसी काल में आचार्य दिङ्नाग का प्रादुर्भाव होता है। उन्होंने प्रमाणमीमांसा के आधार पर सौत्रान्तिक दर्शन की पुन: परीक्षा की और उसे नए तरीक़े से प्रतिष्ठापित किया। दिङ्नाग के बाद सौत्रान्तिकों को प्राचीन आगमानुयायी परम्परा प्राय: नामशेष हो गई। उस परम्परा में कोई प्रतिभासम्पन्न आचार्य उत्पन्न होते दिखलाई नहीं देता।

आचार्य शुभगुप्त

इतिहास में इनके नाम की बहुत कम चर्चा हुई। 'कल्याणरक्षित' नाम भी ग्रन्थों में उपलब्ध होता है। वस्तुत: भोट भाषा में इनके नाम का अनुवाद 'दगे-सुङ्' हुआ है। 'शुभ' शब्द का अर्थ 'कल्याण' तथा 'गुप्त' शब्द का अर्थ 'रक्षित' भी होता है। अत: नाम के ये दो पर्याय उपलब्ध होते हैं। शान्तरक्षित के तत्त्वसंग्रह की 'पंजिका' टीका में कमलशील ने 'शुभगुप्त' इस नाम का अनेकधा व्यवहार किया है। अत: यही नाम प्रामाणिक प्रतीत होता है, फिर भी इस विषय में विद्वान ही प्रमाण हैं। शुभगुप्त कहाँ उत्पन्न हुए थे, इसकी प्रामाणिक सूचना नहीं है, फिर भी इनका कश्मीर-निवासी होना अधिक संभावित है। भोटदेशीय परम्परा इस सम्भावना की पुष्टि करती है। धर्मोत्तर इनके साक्षात शिष्य थे, अत: तक्षशिला इनकी विद्याभूमि रही है। आचार्य धर्मोत्तर की कर्मभूमि कश्मीर-प्रदेश थी, ऐसा डॉ॰ विद्याभूषण का मत है।

समय

कृतियाँ

भदन्त शुभगुप्त युक्ति-अनुयायी सौत्रान्तिकों के अन्तिम और लब्धप्रतिष्ठ आचार्य थे। उनके बाद ऐसा कोई आचार्य ज्ञात नहीं है, जिसने सौत्रान्तिक दर्शन पर स्वतन्त्र और मौलिक रचना की हो। यद्यपि धर्मोत्तर आदि भारतीय तथा जमयङ्-जद्-पई, तक्-छङ्-पा आदि भोट आचार्यों ने बहुत कुछ लिखा है, किन्तु वह पूर्व आचार्यों की व्याख्यामात्र है, नूतन और मौलिक नहीं है। आज भी दिङ्नागीय परम्परा के सौत्रान्तिक दर्शन के विद्वान् थोड़े-बहुत हो सकते हैं, किन्तु मौलिक शास्त्रों के रचयिता नहीं हैं। आचार्य शुभगुप्त ने कुल कितने ग्रन्थों की रचना की, इसकी प्रामाणिक जानकारी नहीं है। उनका कोई भी ग्रन्थ मूल संस्कृत में उपलब्ध नहीं है। भोट भाषा और चीनी भाषा में उनके पाँच ग्रन्थों के अनुवाद सुरक्षित हैं, यथा

  1. सर्वज्ञसिद्धिकारिका,
  2. वाह्यार्थसिद्धिकारिका,
  3. श्रुतिपरीक्षा,
  4. अपोहविचारकारिका एवं
  5. ईश्वरभङ्गकारिका।

ये सभी ग्रन्थ लघुकाय हैं, किन्तु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इनका प्रतिपाद्य विषय इनके नाम से ही स्पष्ट है, यथा-

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