अमृतनादोपनिषद

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अमृतनादोपनिषद

विषय सूची

कृष्ण यजुर्वेद शाखा के इस उपनिषद में 'प्रणवोपासना' के साथ योग के छह अंगों- प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, प्राणायाम, तर्क और समाधि आदि- का वर्णन किया गया है। योग-साधना के अन्तर्गत 'प्राणायाम' विधि, ॐकार की मात्राओं का ध्यान, पंच प्राणों का स्वरूप, योग करने वाले साधक की प्रवृत्तियां तथा निर्वाण-प्राप्ति से ब्रह्मलोक तक जाने वाले मार्ग का दिग्दर्शन कराया गया है। इस उपनिषद में उन्तालीस मन्त्र हैं।

प्राणोपासना

योग-साधना (प्राणायाम)

  1. 'पूरक' का अर्थ है- वायु को नासिका द्वारा शरीर में भरना,
  2. 'कुम्भक' का अर्थ है- वायु को भीतर रोकना और
  3. 'रेचक' का अर्थ है- उसे नासिका छिद्रों द्वारा शरीर से बाहर निकालना।

सीधे हाथ के अंगूठे से नासिका के सीधे छिद्र को बन्द करें और बाएं छिद्र से श्वास खींचें, बायां छिद्र भी अंगुली से बन्द करके श्वास को रोकें, फिर दाहिने छिद्र से वायु को बाहर निकाल दें। इस बीच 'ओंकार' का स्मरण करते रहें। धीरे-धीरे अभ्यास से समय बढ़ाते जायें। इसी प्रकार बायां छिद्र बन्द करके दाहिने छिद्र से श्वास खींचें, रोकें और बाएं छिद्र से निकाल दें। अभ्यास द्वारा इसे घण्टों तक किया जा सकता है। शनै:-शनै: आत्मा में ध्यान केन्द्रित हो जाता है। नियमपूर्वक किये गये अभ्यास द्वारा तीन माह में ही 'आत्मज्ञान' की प्राप्ति सम्भव है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर 'मोक्ष' प्राप्त हो जाता है।

टीका टिप्पणी

  1. ओंकाररथमारूह्य विष्णुं कृत्वाथ सारथिम्।
    ब्रह्मलोकपदान्वेषी रुद्राराधनतत्पर:॥2॥


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