केनोपनिषद

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केनोपनिषद

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सामवेदीय 'तलवकार ब्राह्मण' के नौवें अध्याय में इस उपनिषद का उल्लेख है। यह एक महत्त्वपूर्ण उपनिषद है। इसमें 'केन' (किसके द्वारा) का विवेचन होने से इसे 'केनोपनिषद' कहा गया है। इसके चार खण्ड हैं।

प्रथम खण्ड

वह कौन है?

दूसरा खण्ड

वह सर्वज्ञ है

तीसरा खण्ड

वह अहंकार से परे है

चौथा खण्ड

वही ब्रह्म है

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ॐ केनिषितं पतति प्रेषितं मन: केन प्राण: प्रथम प्रैति युक्त:।
    केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षु: श्रोतं क: उ देवो युनक्ति॥1॥
  2. तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्तेन ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति॥2॥


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