सामविधान ब्राह्मण

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सामविधान ब्राह्मण / Samvidhan Brahman

सामविधान ब्राह्मण का वैशिष्टय-सामवेदीय ब्राह्मणों के मध्य इसका तृतीय स्थान है। ताण्ड्य ब्राह्मण और षडविंश ब्राह्मण शाखान्तरीय ब्राह्मणों के समान अपने को श्रौतयागों के विवेचन तक ही सीमित रखते हैं। इसके विपरीत सामविधान ब्राह्मण जादू-टोने से सम्बद्ध सामग्री का भी प्रस्तावक है। इसमें प्रतिपादित विषय अधिकांशतया धर्मशास्त्र के क्षेत्र में आ जाते हैं। तात्पर्य यह है कि सामविधान ब्राह्मण में श्रौतयागों के साथ ही प्रायश्चित्त-प्रयोग, कृच्छ्रादि व्रत, काम्ययाग तथा विभिन्न लौकिक प्रयोजनानुवर्तित अभिचार कर्मादि भी निरूपित हैं। इस प्रकार विषय-वस्तु की दृष्टि से इस ब्राह्मण का फलक बहुत व्यापक है। ब्राह्मणग्रन्थों के मध्य इसके वैशिष्ट्य के निम्नाङिकत प्रमुख कारण हैं-

का विधान किया गया है, अन्यत्र जिनके लिए बहुव्यय और दीर्घकालसाध्य याग विहित हैं।

विभाग, चयन, क्रम एवं प्रतिपाद्य विषय

सम्पूर्ण सामविधान ब्राह्मण तीन प्रपाठकों और 25 अनुवाकों में विभक्त है। प्रपाठक-क्रम से विषय-वस्तु का विवरण इस प्रकार है-

इस प्रकार श्रौत एवं तान्त्रिक विधि-विधानों के समन्वय के सन्दर्भ में सामवेदीय ब्राह्मणग्रन्थों के मध्य इसका स्वतन्त्र वैशिष्ट्य है। इस पर अब तक सायण तथा भरतस्वामी के भाष्य मुद्रित हुए हैं। 13वीं शती ई॰ के भरतस्वामी की व्याख्या में उन स्थलों पर भी प्रकाश डाला गया है, जिन्हें सायण ने अव्याख्यात रूप में छोड़ दिया था।

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