मृदगलोपनिषद

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मुदगलोपनिषद / Mrudgalopnishad

विषय सूची

इस उपनिषद में चार खण्ड हैं। प्रथम खण्ड में यजुर्वेदोक्त पुरुष सूक्त के सोलह मन्त्र हैं। दूसरे खण्ड में भगवान द्वारा शरणागत इन्द्र को दिये गये उपदेश हैं। इसी में उसके अनिरुद्ध पुरुष द्वारा ब्रह्माजी को अपनी काया को हव्य मानकर व्यक्त पुरुष को अग्नि में हवन करने का निर्देश है। तीसरे खण्ड में विभिन्न योनियों के साधकों द्वारा विभिन्न रूपों में उस पुरुष की उपासना की गयी है। चौथे खण्ड में उक्त पुरुष की विलक्षणता तथा उसके प्रकट होने के विविध घटकों का वर्णन करते हुए साधना द्वारा पुरुष-रूप हो जाने का कथन है। अन्त में इस गूढ़ ज्ञान को प्रकट करने के अनुशासन का उल्लेख है।

प्रथम खण्ड

'पुरुष सूक्त' के प्रथम मन्त्र में भगवान विष्णु की सर्वव्यापी विभूति का विशद वर्णन है। शेष मन्त्रों में भी लोकनायक विष्णु की शाश्वत उपस्थिति का उल्लेख मिलता है। उन्हें सर्वकालव्यापी कहा गया है। विष्णु मोक्ष के देने वाले हैं। उनका स्वरूप चतुर्व्यूह है। यह चराचर प्रकृति उनके अधीन है। जीवन के साथ प्रकृति (माया) का गहरा सम्बन्ध है। सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति श्रीहरि विष्णु द्वारा ही हुई है। जो साधक इस 'पुरुष सूक्त' को ज्ञान द्वारा आत्मसात करता है, वह निश्चित रूप से मुक्ति प्राप्त करता है।

दूसरा खण्ड

तीसरा खण्ड

इस खण्ड में परमात्मा के अजन्मे स्वरूप का वर्णन है, जो विभिन्न रूपों में अपने अंश को प्रकट करता रहता है। उस विराट पुरुष की उपासना सभी साधकों ने अग्निदेव के रूप में की है। यजुर्वेदीय याज्ञिक उसे 'यह यजु है' ऐसा मानते हैं और उसे सभी यज्ञीय कर्मों में नियोजित करते हैं। देवगण उसे 'अमृत' के रूप में ग्रहण करते हैं और असुर 'माया' के रूप में जानते हैं। जो भी जिस-जिस भावना से उसकी उपासना करता है, वह परमतत्त्व उसके लिए उसी भाव का हो जाता है। ब्रह्मज्ञानी उसे 'अहम् ब्रह्मास्मि' के रूप में स्वीकार करते हैं। इस भाव से वह उन्हीं के अनुरूप हो जाता है।

चौथा खण्ड



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