शांखायन आरण्यक

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शांखायन आरण्यक

शांखायन आराण्यक में पन्द्रह अध्याय हैं।

'स्थाणुरथं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं विजानाति योऽर्थम्।
योऽर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा।।'


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. शांखायन आराण्यक 10.1

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